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ग़ुरूर-ओ-नख़वत का अंजाम

(इतनी फ़हमाइश के बावजूद) ना इस ने तसदीक़ की और ना नमाज़ पढ़ी, बल्कि इस ने (हक़ को) झुटलाया और इस से मुँह फेर लिया। फिर गया घर की तरफ़ नख़रे करता हुआ। (सूरतुल क़ियामा ३१ता३३)

(इतनी फ़हमाइश के बावजूद) ना इस ने तसदीक़ की और ना नमाज़ पढ़ी, बल्कि इस ने (हक़ को) झुटलाया और इस से मुँह फेर लिया। फिर गया घर की तरफ़ नख़रे करता हुआ। (सूरतुल क़ियामा ३१ता३३)
अबु जहल जो मुनकरीन नबुव्वत और मुनकरीन क़यामत का सरबराह और नुमाइंदा था, इसका ज़िक्र हो रहा है और इसके हम मसलक जो इन उयूब में इस के बराबर के शरीक हैं, उन के किरदार पर भी रौशनी पड़ती है। फ़रमाया ना इस ने क़ुरआन की तसदीक़ की और ना इस ने अपने परवरदिगार के हुज़ूर कभी नमाज़ अदा की, बल्कि इसका हर रोज़ का ये मामूल बन गया है कि जब रसूलुल्लाह ( स०अ०व०) क़ुरआन ए करीम की तिलावत फ़रमा रहे होते हैं तो ये दूसरे कुफ़्फ़ार की तरह उस मजलिस में आ बैठता है और अल्लाह तआला की आयतों को झुटलाता है। फिर बड़े हक़ारत आमेज़ अंदाज़ से मुँह मोड़ने लगता है और कहता है कि हम तो ख़्याल कर रहे थे कि बड़ी हकीमाना बातें होंगी, यहां आकर वक़्त ही बरबाद किया। सिवाए मन घड़त किस्सों के उन के कलाम में और क्या रखा है। चलो चलें, वक़्त ज़ाए ना करें।

वहां से बड़बड़ाता उठता है और घर रवाना होता है, लेकिन उसकी रफ़्तार आम किस्म की रफ़्तार नहीं होती, इस में गुरूर-ओ-नख़वत और बेपरवाही है। ग़ुरूर इस बात पर कि इस ने आज महफ़िल में ख़ूब बातें कीं, उन के कलाम के ख़ूब बख़ीए उधेड़े। इबारत आराई का असर जो सामईन को मस्हूर कर रहा था, उस को तोड़कर रख दिया और बेपरवाही इसलिए कि इसके होते हुए उनकी दाल नहीं गलेगी।

लिहाज़ा चंद रोज़ तक अगर वो उन की महफ़िल में हाज़िर होता रहा तो कोई भी उनके नज़दीक नहीं आएगा, उनकी महफ़िल सूनी हो जाएगी।

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