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फ़न ख़त्ताती के फ़रोग़ के लिए हुकूमत की सरपरस्ती नागुज़ीर

ख़त्ताती को तालीमी निसाब में जगह मिलना चाहीए और अहल ख़त्ताती के इसातदा का तक़र्रुर रियासती हुकूमतें और मर्कज़ी हुकूमत की तरफ से किया जाता है तो फ़न ख़त्ताती को फ़रोग़ हासिल होगा।

ख़त्ताती को तालीमी निसाब में जगह मिलना चाहीए और अहल ख़त्ताती के इसातदा का तक़र्रुर रियासती हुकूमतें और मर्कज़ी हुकूमत की तरफ से किया जाता है तो फ़न ख़त्ताती को फ़रोग़ हासिल होगा।

फ़न ख़त्ताती बस्री दावत है, यहां तक कि तहरीरी तौर पर समझ में नहीं आता उन लोगों को जो उस की कम अज़ कम नज़र से लुतफ़ अंदोज़ होते हैं।

हर नुक़्ता, लाईन और दायरों को ख़त्तात को सोच-ओ-फ़िक्र किस तरह बस्री लम्हा फ़िक्र देती है, इस तरफ हुकूमतों की भी ज़िम्मेदारी है कि जिस तरह आसारे क़दीमा की तरफ से तारीख़ी इमारतों की हिफ़ाज़त होती है, इसी तरह फ़न ख़त्ताती का तहफ़्फ़ुज़ और फ़रोग़ पर भी दिलचस्पी हो।

इन ख़्यालात का इज़हार एडीटर सियासत जनाब ज़ाहिद अली ख़ां ने बीदर में मुनाक़िदा शाहीन तालीमीइदारा जात और रोज़नामा सियासत के इश्तिराक से ख़त्ताती नुमाइश की इफ़्तिताही तक़रीब को मुख़ातब करते हुए किया।

उन्होंने बताया कि इस नुमाइश में 600 से ज़ाइद फ़न ख़त्ताती हैं। इस फ़न की सेहत-ओ-ख़ूबसूरती के लिए ख़त्तात ने जिस तरह मेहनत की है, उनकी हौसलाअफ़्ज़ाई होती है तो यक़ीनन इस हौसलाअफ़्ज़ाई से फ़नकार के अंदर का फ़न और ज़्यादा निखरता है।

इस नुमाइश के इनइक़ाद का मक़सद इस्लामी कल्चर को हमारी नसलों से मुतआरिफ़ कराना और फ़न ख़त्ताती के ज़रीये क़ुरआन मजीद का पैग़ाम सारी इंसानियत तक पहुंचाना है।

उन्होंने इस मौके पर हैदराबाद के इन ख़त्तातों का नाम लिया, जिन्हों ने इस नुमाइश में अपने फ़न पारों को ख़ाहिशमंद अफ़राद के लिए दीदा जे़ब बनाया। इन में अब्दुल नईम साबरी, शेख़ मुहम्मद अबद लतीफ़ फ़ारूक़ी, मुहम्मद रज़ी उद्दीन इक़बाल, अब्दुल नासिर और सय्यद नसीर उद्दीन वक़ार ने इस फ़न ख़त्ताती को ज़िंदा रखने के लिए अपनी उमरें सिर्फ़ की हैं।

उन लोगों ने इस्लामी कल्चर-ओ-फ़न ख़त्ताती को प्रवान चढ़ाने में अपना वक़्त सिर्फ़ किया है। इस मौके पर क़ैसर रहमान नुमाइंदा सियासत बीदर, डॉक्टर पी सी जाफ़र डिप्टी कमिशनर बीदर और बहादुर देसाई नुमाइंदा दी हिंदू ने भी मुख़ातिब किया।

इस फ़न ख़त्ताती की नुमाइश में ख़त नस्ख़ और ख़त-ए-नसतालीक़ के फ़न पारे ज़्यादा देखने में आए और ख़ुसूसी तौर पर कबूतर के पर पर खुशनवेसी का मुज़ाहरा भी दिलचस्प रहा।

अबदुल क़दीर सेक्रेटरी शाहीन इदारा जात ने तमाम मेहमानों का इस्तिक़बाल करते हुए इस नुमाइश से मुताल्लिक़ बताया कि इस्लामी कल्चर से वाबस्ता इस नुमाइश को बीदर में मुनाक़िद करने का मक़सद ये है कि बीदर शहर को शहर उर्दू होने का शरफ़ हासिल है, जो माज़ी में भी उर्दू का गहवारा रहा है।

उन्होंने शहरयान बीदर और महबान उर्दू से ख़ाहिश की है के इस चार रोज़ा फ़न ख़त्ताती की नुमाइश का मुशाहिदा करें। नुमाइश का वक़्त सुबह दस् ता शाम पाँच बजे मुक़र्रर है।

इस मौके पर बीदर शहर के इन ख़त्तातों की जिन्हों ने बीदर शहर में इस फ़न को जारी रखा, मुहम्मद मुईन यार ख़ां, मुहम्मद अबदुर्रहीम, मुहम्मद ख़्वाजा भाई (जो इस तक़रीब में नहीं आसके), मुहम्मद शजीउ उलरहमन सदर अंजुमन ख़ोशनवीसियान बीदर, सय्यद शाह हुसैन मुहम्मद मुहम्मद उल-हुसैनी असलम (जो इस तक़रीब में नहीं आसके) और अबद उल-मुक़तदिर ताज को रोज़नामा सियासत और शाहीन इदाराजात की तरफ से शाल पोशी-ओ-गलपोशी करते हुए तहनियत पेश की गई।

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