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99 प्रतिशत मुस्लिम महिलायें शरीयत के पक्ष में

औरंगाबाद: इस्लाम धर्म ने महिलाओं को जो अधिकार प्रदान किए हैं, इसका उदाहरण दुनिया के किसी धर्म में नहीं मिलता. जो लोग शरीयत के कानून को टकसाली कानून कह रहे हैं, वह इस्लाम की सत्यता से परिचित नहीं. लेकिन उन्हें यह जान लेना चाहिये कि मुसलमान किसी भी कीमत पर शरीयत में हस्तक्षेप को कतई बर्दाश्त नहीं करेगा। साथ ही कहा, 99 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं शरीयत के पक्ष में हैं.

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नेटवर्क 18 के अनुसार, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव एडवोकेट जफरयाब जिलानी ने इन विचारों को इजहार किया. वह औरंगाबाद में मीडिया प्रतिनिधियों से मुखातिब थे. उन्होंने कानून शरिया के हवाले से कहा कि इस्लाम ने महिलाओं को जो अधिकार प्रदान किए हैं. दुनिया के किसी भी धर्म में इसकी मिसाल नहीं मिलती. उन्होंने तलाक, गैर नुफ़्क़ा, विरासत में बेटियों का हिस्सा जैसे विषयों पर विस्तृत प्रकाश डाला और कहा कि शरीयत में बदलाव की कल्पना भी असंभव है.

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से आयोजित दो दिवसीय समझ-ए-शरीयत कार्यशाला में भाग लेने के क्रम में औरंगाबाद पहुंचे एडवोकेट जफरयाब जिलानी ने मीडिया प्रतिनिधियों को संबोधित किया. इस अवसर पर उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुस्लिम महिलाओं के संबंध में बयान को एक सोची समझी साजिश करार दिया. जफरयाब जिलानी ने कहा कि इसका मतलब यह कभी नहीं हो सकता कि प्रधानमंत्री को मुस्लिम महिलाओं से कोई हमदर्दी है. समान नागरिक संहिता के मामले में पर्सनल ला बोर्ड का हवाला देते हुए ज़फरयाब जिलानी ने स्पष्ट किया कि दो करोड़ हस्ताक्षरों के दस्तावेज इस बात का सबूत हैं कि 99 प्रतिशत महिलायें व्यवस्था को बनाए रखने के पक्ष में हैं. इलेक्ट्रोनिक मीडिया में मुस्लिम महिलाओं की समस्याओं को लेकर जारी अभियान पर मुस्लिम पर्सनल ला के सदस्य ने नपे तुले अंदाज में टिप्पणी की. उनका कहना है कि मीडिया का एक बड़ा वर्ग आज भी तथ्यों को प्राथमिकता देता है और जो लोग जानबूझ कर प्रचार कर रहे हैं, ऐसे लोग मुट्ठी भर ही हैं. हालांकि उनकी गलतफहमी भी दूर करने की कोशिश जारी है.

उन्होंने कार्यशाला को धर्मनिरपेक्ष जनता के मन को साफ करने का स्रोत बताया. उनका कहना था कि देश के बहुसंख्यक लोग धर्मनिरपेक्ष स्वभाव के है और बोर्ड उनकी गलतफहमी को दूर करना चाहता है.

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