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GST की मार से बंद होने की कगार पर अलीगढ़ का ताला कारोबार,कारीगरों के सामने रोज़ी रोटी की मुश्किल

मुगलकाल से ही अपने फौलादी उत्पादों के लिये दुनिया में मशहूर अलीगढ़ का ताला उद्योग नोटबंदी और जीएसटी के बाद लगभग बंदी की कगार पर है । ताला उद्योग से जुड़े एक लाख से ज्यादा कारीगरों के सामने रोजीरोटी का संकट खड़ा हो गया है।

तालों पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगने के बाद अलीगढ़ का ताला बनाने वाली फैक्ट्रियों में सन्नाटा है । मंदी का सबसे ज्यादा असर ताला बनाने वाले कामगारों पर पड़ रहा है । ताला बनाने वाले कारीगारों का कहना है कि ठेकेदारों को ताले के ऑर्डर ही नहीं मिल रहे हैं तो वो भी ताले नहीं बनवा रह हैं ।

कारीगारों की हालत इतनी खस्ता है कि उन्हें 15 दिन में 2 या 3 दिन काम मिलता है जिससे उनके सामने रोज़ी रोजी का संकट पैदा हो गया है ।

लॉक व ऑटो लॉक उद्योग से ढाई लाख लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिल रहा है । सेंट्रल एक्साइज विभाग में पंजीकृत छह फैक्ट्रियों को छोड़ दिया जाए तो बाकी मध्यम, लघु व कुटीर उद्योग की श्रेणी में हैं। कई ताला उद्योग संचालकों का कहना है कि जीएसटी की नई दरों से कारोबार तबाह होने की कगार पर है । ये दरें बड़ी इंडस्ट्रीज को ध्यान में रखकर तय की गई हैं।

पहले सभी तरह के ताले पर पांच फीसद वैट लगता था। माल आयात व दूसरे राज्यों में भेजने की सुविधा के लिए फार्मो की व्यवस्था थी। संबंधित राज्य कर वसूलता था। सेंट्रल एक्साइज को छोड़कर कुल पांच प्रतिशत से अधिक टैक्स नहीं बनता था।

तालों को भी अलग-अलग श्रेणी में रखकर जीएसटी की दरें घोषित की गई हैं। ऑटो लॉक, साइकिल लॉक, फर्नीचर लॉक, शटर लॉक पर 28 फीसद व पैड लॉक पर 18 फीसद की दरें घोषित की गई हैं। पहले आठ फर्म सेंट्रल एक्साइज में पंजीकृत थीं। अब सभी का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है।

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