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अमर उजाला की फ़र्ज़ी ख़बर के निशाने पर ‘अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और अमन’ दोनों है!

हिंदी पत्रकारिता को तमाम लोग ‘सवर्ण हिंदू पत्रकारिता’ समझते हैं लेकिन हालत कहीं ज़्यादा गंभीर है। अब यह सीधे-सीधे सांप्रदायिक ज़हर फैलाने का अभियान हो गई है। क्या टीवी और क्या अख़बार…कुछ अपवादों को छोड़ दें तो ज़्यादातर इसी ज़हरीले पानी से धंधे की फ़सल लहलहाने का फ़ार्मूला इस्तेमाल कर रहे हैं।

ताज़ा मामला अमर उजाला का है जो कुछ समय पहले तक थोड़ा ‘संतुलित’ माना जाता था। लेकिन मोदी-योगी राज में वह भी किसी से पीछे नहीं रहना चाहता। इस ख़बर के ऊपर आप जो तस्वीर देख रहे हैं वह 19 जून के अमर उजाला के अलीगढ़ संस्करण की है।

हेडलाइन है-

भारत-पाक मैच की कड़ी पहरेदारी, फिर भी ‘तरफदारी’

सबहेडिंग है- भारत की हार पर दिल टूटा, एएमयू से सटे मोहल्ले में हुई आतिशबाज़ी, मुस्लिम आबादी वाले इलाकों में तैनात रही फ़ोर्स

एक और सब हेडिंग बताती है- भारत का विकेट गिरते ही छूटते पटाखे

ख़बर पढ़ते ही आप पर यह प्रभाव पड़ता है कि अलीगढ़ में मुसलमानों ने पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाया, आतिशाबाज़ी की, इससे तनाव हुआ और पुलिस फोर्स तैनात की गई..!

लेकिन ‘अमर उजाला ब्यूरो’ की ओर से फ़ाइल की गई इस ख़बर को पढ़ते हुए आप नहीं जान सकते कि किसने और क्या ‘तरफदारी’ की। पटाखे ठीक-ठीक कहाँ छूटे…’एमयू से सटे इलाक़े’ पर ज़ोर है..पर वह कौन सा इलाक़ा है, उसका ज़िक्र नहीं है। ‘एमएमयू से सटे इलाके’ में आतिशबाज़ी लिखने से इतना तो साफ़ है कि अख़बार को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से काफ़ी प्रेम है और वह किसी ना किसी बहाने एएमयू को ख़बर में डालना चाहता था। लेकिन वह सटा इलाका कौन सा है, इसकी कोई जानकारी ख़बर में नहीं है।

ख़बर के साथ जो तस्वीर है वह भारत-पाक मैच वाले दिन की नहीं है। वह रमज़ान की शुरुआत में किसी और दिन की तस्वीर है जिसमें सीओ सिटी राजकुमार सिंह, सिटी मजिस्ट्रेट, पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स के लोग शहर में मार्च करते दिख रहे हैं।

ज़ाहिर है, इस ख़बर से लोगों में बेचैनी हुई।

इस संबंध में अलीगढ़ के शरजील उस्मानी ने  पता करने की कोशिश की कि रिपोर्टर ने किस सटे इलाके की बात की है। फ़ेसबुक पर उनकी पोस्ट बहुत कुछ बताती है-

रिपोर्टर के अंतर्यामी होने को दाद दे सकते हैं, लेकिन जीवनगढ़ एएमयू से सटा इलाक़ा कैसे हो गया। ज़रा यह नक्शा देखें …

साफ़ है कि जीवनगढ़ और एएमयू में काफ़ी दूरी है। सच्चाई यह है कि रिपोर्टर की ख़बर में अगर एएमयू नहीं होता तो इसे इतनी प्रमुखता नहीं मिलती। और संपादक जी अगर ‘मार्च’ की पुरानी तस्वीर ना लगाते तो तनाव की बात भी प्रमाणित ना होती। रिपोर्टर और संपादक, दोनों ने अपने हुनर से यह ख़बर ‘बेच’ ली।

यह नई ‘संपादन कला’ है जो झूठ और मक्कारी के ज़रिये परवान चढ़ती है। हो सकता है कि ऐसे धत्करमों से अख़बार का सर्कुलेशन और संपादक जी का वेतन बढ़े। लेकिन शहर में आग लगेगी तो अख़बार के दफ़्तर और संपादक जी के घर हमेशा सुरक्षित ही रह पाएँगे, यह कोई मूर्ख ही कह सकता है।

साभार- मीडिया विजिल

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