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‘आलिम कहलाना तो आसान है, लेकिन अमली ज़िन्दगी में उलेमा ए किराम की विरासत को बाकी रखना मुश्किल’

शिक्षा और तालीम की नई दुनिया जो इतनी आकर्षक और हल्की फुल्की नज़र आती है, इसका कारण शिक्षा विशेषज्ञों द्वारा समयनुसार शिक्षा व्यवस्था मे बदलाव की निरंतर कोशिशें हैं, माहिरीन ने शिक्षण विधियों में विभिन्न प्रकार के प्रयोग किए, ताकि विद्यार्थियों की रुचि शिक्षा में क्रमशः बनी रहे…

जिनमे खेल कूद, प्रश्न उत्तर के सिलसिले, आयु और कक्षा के हिसाब से दिलचस्प पाठ्यक्रम, सामाजिक जागरूकता के कार्यक्रम,सफाई अभियान, विभिन्न प्रकार की प्रतियोगी परीक्षाएं, वगैरा वगैरा….

दूसरी और क्लासरूम और स्कूल का माहौल, खुले हवादार कमरे, उपयुक्त फर्नीचर, रोशनी, सफाई, खेल का मैदान, उम्र और आयु के लिहाज से हर बच्चे के लिए ज़रूरी सुविधा, आरामदायक और सुंदर ड्रेसकोड…

मदरसे भी शिक्षा संस्थान हैं, मदरसों के विद्यार्थियों में अपार क्षमताएं हैं, लेकिन वक़्त पर बदलाव न होने की वजह से मदरसों में किसी किस्म की तालीमी तरक़्क़ी न हो सकी, ये तो हुआ है कि शिक्षा का स्तर घटा हो, दुख की बात यह है कि बदलाव की बात करना भर जुर्म है, करने वाले को शंका की नज़रों से देखा जाता है….

मदरसों में भी बच्चे पढ़ते हैं, और वो इंसान ही हैं, उनमे वो तमाम भावनाए हैं जो एक सामान्य बच्चे में होती हैं, वो भी विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताओं में पुरुस्कार पाना चाहता है, वो भी चाहता है कि मुहल्ले भर के बच्चों के अंदर उत्साह भर दे, मदरसे के बच्चे को भी भविष्य के लिए कई सारे विकल्प चाहिए, वो अभी खेलकूद के मैदान को हसरत भरी नजरों से देखता है…

आठ साल की उम्र से लगातार पच्चीस साल की उम्र तक एक ही अंदाज़ से उसका मानसिक विकास कैसे होगा ? नीचे बैठना, ड्रेसकोड के नाम पर आजतक कोई विचार नही, सफाई का नाम नही, चौबीस घण्टो में से पन्द्रह घण्टे से अधिक कक्षा में बिताना, और इतने वक़्त में सिर्फ दो विषयों का रट्टा मारना, ये कोनसा निज़ाम ए तालीम है,

बकरीद पर क़ुरबानी की खाल ढोना, फसल के मौके पर अनाज और गल्ला इकट्ठा करना, और यूँही ढुलमुल और बोर ज़िन्दगी गुज़ार कर मोलवीयत की डिगरी पा कर आलिम कहलाना तो आसान है, लेकिन अमली ज़िन्दगी में उलेमा ए किराम की विरासत को बाकी रखना आसान नही है……!!

मौलाना हसन अहमद
इमाम जामा मस्जिद बुढाना, मुज़फ्फरनगर

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