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अब सब कुछ मुसलामानों के हाथ में है

यूपी के मुख्य मंत्री के चुनाव से साफ़ संदेश मिल गया है कि बस अब सब कुछ मुसलमानो के हाथों में है, वो चाहें तो यहीं से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की आंधी को ब्रेक लगा दें और न चाहें तो बचाखुचा भारत भी संघ को सौंप दें। मुस्लमान चाहें तो दलित दमन, स्त्री उत्पीडन, आदिवासी नरसंहार, स्वदेशी-विरोध, एफ़ डी आई, महंगाई जैसे ज़रूरी मुद्दे दोबारा राजनीति के केंद्र में आ सकते हैं। मुसलमानो को सिर्फ इतना करना है की भारतीय जनता पार्टी को वोट देना है, मौलानाओं से भाजपा को मतदान करने के पक्ष में ज़ोरदार फ़तवे दिलवाने हैं और पूरी ताक़त से देशप्रेम के चिंतन से खुद को जोड़ना है। अपना एक भी प्रत्याशी किसी भी पार्टी से चुनाव के मैदान में नहीं उतारना है। क्योंकि ये आज़म ख़ाँ, ओवैसी या नसीमुददीन सिद्दीक़ी सिर्फ़ निजी हित साध सकते हैं।

अब सत्ता में भागीदारी के ख़याल से दूर रहना है, एक गैर-राजनैतिक समूह बन कर सिर्फ़ अपनी शिक्षा, रोज़गार से सरोकार रखना है। ऐसा नहीं है की पहले से ये हो नहीं रहा, आम मुसलमान तो यही कर रहा है, बस करना ये है की अब सिर्फ यही करना है। आपका सियासी भाव जैसे ही नीचे आएगा, भारत की सियासत में जनता के असली सवाल वापिस आ जाएंगे।

बहुजन समाज पार्टी हो या जनता दल, कांग्रेस हो या समाजवादी पार्टी , एक तो इन सबके साथ मसला ये है कि इनका कोई ईमानदाराना कमिटमेंट सेकुलरिज्म के साथ है नहीं। ये जब भी सत्ता में रही हैं तब ये खुद मुसलमानो से दूरी बनाए रखती हैं, क्योंकि अगर मुसलमानो की समस्या पर तवज्जो दी जाए तो, हमदर्दी राखी जाए तो इनके हिन्दू वोटबैंक में छेद हो जाता है।

काँग्रेस पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, जनता दल जैसे सभी दलों का हाल ये रहा है कि ये मुसलमानो का नाम भी ले लेती हैं तो सिर्फ इतना करने भर से इनका हिन्दू, बहुजन, दलित, पिछड़ा वोट बिदक कर एकमुश्त भाजपा में चला जाता है।

याद कीजिये मुज़फ्फरनगर-शामली जैसे वीभत्स दंगो में भी अखिलेश सरकार का पूरा पुलिस तंत्र दंगाइयों के साथ कंधे से कन्धा मिलाये खड़ा था। उधर सैफेई महोत्सव में खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व्यस्त रहे थे, जबकि सपा में मुसलमानो के तथाकथित क़द्दावर नेता आज़म खान की बोलती बंद करा दी गयी थी। ये वही तेज़ तर्रार आज़म खान हैं नब्बे के शुरूआती दशकों में जिनके ओजपूर्ण भाषण के कैसेट पूरी हिंदी बेल्ट के मुसलमानो को सपा से एक नयी उम्मीद के साथ जोड़ते थे। इनके रहते जब दादरी के अख़लाक़ को मारा गया तब भी अपराध की जांच के बजाय मांस की जांच करवाने की ज़रुरत बताती है की मुस्लमान को न्याय दिलाने में नहीं, बल्कि अपराधी घोषित करने में सारा तंत्र लगा हुआ है।

वहीँ अख़लाक़ क़त्ल के आरोपी की जेल में बीमारी से हुई मृत्यु पर उसकी लाश पर तिरंगा झंडा और मुआवज़ा बताता है कि उत्तर प्रदेश की क़ानून व्यवस्था में मुस्लमान पीड़ित की लाश पर दस कोड़े और मारने का नया रिवाज़ चलन में आ गया है। लखनऊ के सैफुल्लाह मामले में तो और भी भयानक परिपाटी गढ़ी गयी है। यानी बेगुनाह मुस्लमान नौजवान जब आतंकवाद के आरोपों से बरी हो कर 12 -15 साल में बहरहाल बेगुनाह साबित होने लगे तो मुसलमान नौजवानों को सीधे ही एनकाउंटर कर के मारा जाने लगा।

अखिलेश यादव की तथाकथित सेक्युलर सरकार के दौरान भारतीय मुसलमानो के लिए सैफ़ुल्लाह हत्या काण्ड से नया कोड ऑफ़ कंडक्ट ये आया की जब औलाद को एनकाउंटर में बेमौत मारा जाये तो उसका ग़म नहीं मनाना है, जो औलाद गयी सो गयी लेकिन घर में जो दूसरे बच्चे हैं उनको जो जीते जी रोज़ मरना होगा, उससे उन्हें बचाने का एक ही तरीक़ा है की मरनेवाली औलाद पर दस कोड़े और मारो, बल्कि उसका जनाज़ा भी आख़ कर दो। जब कैमरे हट जाएँ तो बाद में-अकेले में रो लेना, क़ब्र पता कर के उससे ये ज़ालिमाना बेवफ़ाई माफ़ करवा लेना, मरनेवाला लख़्ते-जिगर भी वाल्दैन की मजबूरी समझेगा।

आख़िर मरने वाले के साथ मरा नहीं जा सकता। अगले सभी एनकाउंटर्स में अब सैफुल्ला की परिपाटी लागू होगी। मीडिया बिलखते बाप के मुंह में माइक ठूंस कर पूछेगा की क्या आप भी सैफुल्ला के राष्ट्रभक्त बाप की तरह अपनी औलाद के एनकाउंटर पर आंसू बहाने के बजाय मारनेवाले वर्दीधारी हत्यारों की पीठ नहीं थपथपाएंगे?

सैफुल्लाह के बाप की तरह आप भी औलाद के लिए इंसाफ तो नहीं मांगेंगे? इशरत जहाँ की अम्मी ने बेटी के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ के जो जुर्रत की वो नेक्स्ट जनरेशन के मुसलमान वाल्दैन नहीं कर पाएंगे भारत में अब।

ये सब तथाकथित धर्मनिरपेक्ष समाजवादी सरकार के सिर्फ एक कार्यकाल में हुआ है। इस से बदतर भी बहुत कुछ हो सकता है आपके साथ, खुद पर रहम खाइये और इसको रोक लीजिये। आपके होने से राजनैतिक पार्टियों को सेक्युलर होने का जो घातक सर्टिफिकेट मिलता है वो आपके काम तो आता नहीं, बस भाजपा की सांप्रदायिकता की ताक़त बढ़ा देता है। सेक्युलर पार्टियों की थोड़ी धर्म निरपेक्षताकी वजह से ही योगी आदित्यनाथ आज मुख्यमंत्री पद पर है।

धर्मनिरपेक्षता के इस फ़र्ज़ी प्रमाणपत्र से बेरहम जाति व्यवस्था, निजी संपत्ति के जमावड़े, कॉर्पोरेट लूट आदि के कड़े सवालों से सभी पार्टियां ख़ुद को बचा लेती हैं। धर्मनिरपेक्षता की ये धुंध छंटे तो कांग्रेस, सपा, भाजपा को भी मनुवाद, दलित-उत्पीडन, आदिवासी क़त्लेआम, के असली सवालों का सामना करना पड़े।

कांग्रेस पार्टी ने मस्जिद का ताला तो खुलवाया लेकिन झगड़े का हल नहीं निकाला, कांग्रेस-भाजपा ने मस्जिद तो तुड़वाई लेकिन तभी वहां एक मंदिर बनवा कर इस मामले को हमेशा के लिए ख़त्म नहीं कर दिया। मुसलमानो ने तब से अब तक हो रही कारसेवाओं पर कभी भी उफ़ नहीं की। एक भी मुस्लमान कभी बाबरी मस्जिद को बचाने, या उस पर क़ब्ज़ा करने नहीं गया।

  • शीबा असलम फ़हमी

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