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‘भाजपा के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार कोविंद अंबेडकरवादी नहीं, हिन्दूवादी विचारों के दलित हैं’

राष्ट्रपति पद के लिये सत्ताधारी भाजपा का प्रत्याशी घोषित होने के कुछ ही देर बाद बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद ने दिल्ली रवाना होने से पहले पटना में अपने शुभचिंतकों और पत्रकारों का हाथ हिलाकर अभिवादन किया तो उनकी दाहिनी कलाई में बंधा लाल धागों वाला ‘कलावा’ उनकी शर्ट और कोट से बाहर होकर झांकता नजर आया। इस ‘कलावे’ ने राष्ट्रपति पद के भाजपा-प्रत्याशी की दलित-पहचान में ‘हिन्दूवादी’ का विशेषण भी जोड़ दिया। इससे स्वयं ही साफ हो रहा था कि वह न तो अंबेडकरवादी विचारों के दलित हैं और न ही पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन की तरह ठेठ सेक्युलर दलित हैं। भाजपा के दायरे से बाहर भी अपनी अपेक्षाकृत शालीन और संयत छवि रखने वाले रामनाथ कोविंद ने स्वयं भी कभी इस बात से इंकार नहीं किया कि वह संघी-सोच के ‘हिन्दुत्ववादी’ नहीं हैं! और बिल्कुल यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी ने आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व से मशविरे के बाद उनके नाम की घोषणा की। विचारधारा के स्तर पर अपनी ठेठ सवर्ण-हिन्दूवादी सोच के बावजूद पार्टी को ऐसे ‘अनुकूलित दलित’ को राष्ट्रपति पद के लिये मनोनीत करते हुए भाजपा नेतृत्व के मन में किसी तरह की दुविधा नहीं थी।

संघ-बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग

श्री कोविंद के नाम के ऐलान से पहले मीडिया और सियासी सर्किल में राष्ट्रपति पद के भाजपा प्रत्याशी के तौर पर जिन कुछ नामों की चर्चा थी, उनमें लोकसभाध्यक्ष सुमित्रा महाजन, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू के नाम प्रमुख थे। मुर्मू के अलावा तीनों नाम एक ही समुदाय से हैं। मीडिया और शासकीय गलियारे में आज भी ब्राह्मण या सवर्ण समुदायों का ही वर्चस्व है, इसलिये नामों की अटकलें भी जाति-आग्रह या पूर्वाग्रह से प्रभावित थीं। लेकिन हाल के कुछ वर्षों से आरएसएस-भाजपा में नीतिगत स्तर पर ‘सोशल-इंजीनियरिंग’ पर काफी जोर दिया जा रहा है। संघ-भाजपा के शीर्ष संचालकों और रणनीतिकारों को यह बात समझ में आ गई है कि सवर्ण-हिन्दुत्वा आधारित अपनी राजनीति को आगे बढ़ाना है तो दलित-पिछड़ों के बीच अपना आधार बढ़ाना होगा। एक सीमा तक उन्हें हिस्सेदारी भी देनी होगी। सिर्फ आरएसएस के शीर्ष निकाय को छोड़कर हर स्तर पर अन्य समुदायों की हिस्सेदारी बढ़ाई भी गई है। वैश्य समुदाय चूंकि आरएसएस-जनसंघ-भाजपा का बहुत पुराना जनाधार रहा है, इसलिये इस वक्त प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष, दोनों पदों पर वैश्य समुदाय के नेता काबिज हैं। लेकिन सरकार के ज्यादातर शीर्ष मंत्री, सलाहकार और कार्यकारी रणनीतिकार सवर्ण हिन्दू समुदाय से हैं। इन सबने मिलकर एक ‘अनुकूलित दलित नेता’ को राष्ट्रपति पद के लिये मनोनीत किया।

कोविंद के जरिये डैमेज कंट्रोल की कोशिश

इस वक्त भाजपा-आरएसएस को एक ‘दलित चेहरा’ चमकाने की जरूरत भी थी। देश भर में दलित समुदाय उनकी नीतियों और उनके उग्रपंथी कार्यकर्ताओं-समर्थकों की कारगुजारियों से बेहद खफा है। हैदराबाद के रोहित वेमुला आत्महत्या कांड, ऊना (गुजरात) के दलित-पिटाई कांड, आगरा के हमलों और हाल की सहारनपुर हिंसा से दलितों के बीच भाजपा के खिलाफ जबर्दस्त माहौल है। पार्टी के रणनीतिकार सन् 2019 के संसदीय चुनाव के मद्देनजर इसे खतरनाक संकेत मान रहे हैं। उनका मानना है कि उत्तर प्रदेश में अगर अखिलेश-मायावती राजनीतिक तौर पर मिल गये तो भाजपा के लिये बड़ी चुनौती बन सकते हैं। ले-देकर इस वक्त उत्तर से दक्षिण तक भाजपा की छवि दलित-विरोधी दल की हो गई है। सन् 2002 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले भी कुछ ऐसा ही परिदृश्य था। भाजपा या संघ ने मुस्लिम समुदाय की कभी परवाह नहीं की। उसने उसे हमेशा ‘माइनस’ करके अपनी चुनावी रणनीति का निर्धारण किया। लेकिन गुजरात के भयानक मुस्लिम विरोधी कत्लेआम से भाजपा-आरएसएस की छवि देशव्यापी स्तर पर एक उग्रपंथी संगठन की बन रही थी। उस वक्त संघ-भाजपा ने समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव द्वारा सुझाये मुस्लिम समुदाय के गैर-राजनीतिक किस्म के एक ‘वैज्ञानिक-नौकरशाह’ एपीजे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति पद के लिये अपने समर्थन का ऐलान किया था। भाजपा ने उन्हें ‘राष्ट्रवादी और देशभक्त मुसलमान’ कहा, जैसे भारत के अन्य मुसलमान राष्ट्र-विरोधी या गैर-देशभक्त हों। एनडीए के तत्कालीन भाजपाई नेतृत्व ने एपीजे अब्दुल कलाम जैसे अराजनीतिक और संवैधानिक मामलों के गैर-जानकर व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाकर खूब फायदा उठाया। बिहार में राष्ट्रपति शासन की असंवैधानिक घोषणा सहित उनके कई फैसले बेहद विवादास्पद साबित हुए। संसद के संयुक्त अधिवेशन में एक बार उन्होंने यह भी फरमाया कि देश में दो-दलीय व्यवस्था हो तो ज्यादा बेहतर होगा। भारत जैसे विशाल और विविधता भरे देश में इस तरह का सुझाव किसी राष्ट्रपति की तरफ से आना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण था। बहरहाल, डा.कलाम किसी भी तरह संघी या भाजपाई नहीं थे। वह एक दिलचस्प किन्तु चतुर वैज्ञानिक-प्रशासक थे।

संघ-बीजेपी का दायरा तोड़ पाना मुश्किल

रामनाथ कोविंद राजनीतिक और संवैधानिक मामलों में डा.कलाम की तरह गैर-जानकार नहीं हैं। वह राजनीतिक और विधायी मामलों में जानकार और अनुभवी व्यक्ति हैं। पर पूरी तरह ‘संघी-भाजपाई’ हैं। इस बार भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए सरकार में भाजपा का पूर्ण बहुमत है, इसलिये उसने ‘पूर्णरूपेण अपना’ राष्ट्रपति चुनने की रणनीति बनाई है और राष्ट्रीय राजनीति के परिदृश्य के दबाव में ‘एक दलित’ को आगे किया है। पर रामनाथ कोविंद से अपने कई बार के औपचारिक-अनौपचारिक संवाद के आधार पर कह सकता हूं कि वह ज्यादातर भाजपा नेताओं की तरह मुझे कभी भी सांप्रदायिक रूप से कट्टरपंथी और संकीर्ण नहीं नजर आये। कुल मिलाकर वह शालीन और संतुलित व्यक्ति हैं। उनके ऊपर लग रहे हाल के कुछ आरोपों के बारे में मेरे पास ठोस तौर पर कोई जानकारी नहीं है। पर यह बात तो आईने की तरह साफ है कि वह देश के पहले दलित राष्ट्रपति के आर नारायणन जैसे विद्वान, सेक्युलर-लोकतांत्रिक विचार और वैज्ञानिक मिजाज वाले राजनीतिज्ञ नहीं हैं। एक जमाने में लोकसभा टीवी सहित अन्य कई चैनलों पर श्री कोविंद भाजपा प्रवक्ता के तौर पर पेश होते रहते थे। ऐसी कई टीवी चर्चाओं में पत्रकार के रूप में मैं भी उसी पैनल में मौजूद रहा। अपने ऐसे ही निजी अनुभवों के आधार पर कह सकता हूं कि रामनाथ कोविंद अपने पड़ोसी राज्य यूपी के भाजपा-पृष्ठभूमि वाले दूसरे राज्यपाल राम नाईक से कुछ अलग किस्म की शख्सियत हैं।

वह श्री नाईक की तरह विपक्षियों के प्रति पूरी तरह अनुदार नहीं हैं। लेकिन यह भी सच है कि श्री कोविंद पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन की तरह किसी बड़े संवैधानिक मुद्दे पर केंद्र सरकार द्वारा बड़ी गलती किये जाने के बावजूद ऐसा हस्तक्षेप नहीं करना चाहेंगे, जो सरकार या संघ के शीर्ष नेतृत्व को नापसंद हो। संविधान की मर्यादा से बाहर होने पर भी वह सरकार पर सवाल नहीं उठायेंगे, क्योंकि ऐसी परिस्थिति में वह अंततः संविधान के बजाय दल के साथ रहना पसंद करेंगे। अंत में एक बात औरः अगरश्री कोविंद चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बनते हैं तो मैं चाहूंगा कि उनके बारे में की गई मेरी उपरोक्त टिप्पणी गलत साबित हो जाय। मोदी सरकार आज जिस तरह के कदम उठा रही है, उसे देखते हुए संविधान और समाज को बचाने वाले राष्ट्रपति की बड़ी जरूरत है!

  • उर्मिलेश 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और राज्यसभा चैनल के कार्यकारी प्रमुख रह चुके हैं। आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

– जनचौक

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