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आतंक के आरोप में जेल में बंद मुसलमानों पर ख़ुदकुशी के लिए दबाव बनाया जाता है

रमज़ान आ रहे हैं…मुस्लिम मोहल्लों और बाज़ारों की तंग गलियां चमकीली सुतलियों से सज रही हैं, हर रात को दुल्हन की तरह सजाने का काम ज़ोरों पर हैं। ख़रीदारी हो रही है,चहलकदमी बढ़ चुकी है, दस्तरख़ान सजाने से ताल्लुक़ रखते तरह-तरह के आइडियाज़ पर बातें हो रही हैं लेकिन शिद्दत से इंतज़ार के बावजूद इस पाक़ महीने की शुरूआत में बाज़ारों की बजाय कुछ मुस्लिम महिलाएं अपनी अंधेरी हो चुकी ज़िंदगी की दास्तां सुनाने उज्जैन से दिल्ली की सड़कों पर धक्के खा रही हैं। गोद में छोटे-छोटे बच्चे। गर्मी से हलकान। भूख से परेशान।

ये सभी महिलाएं भोपाल सेंट्रल जेल में क़ैद उन मुस्लिम लोगों के परिवारों की महिलाएं हैं जो आतंकवाद के आरोप में पिछले साढ़े तीन साल से क़ैद हैं। एटीएस ने कुल 29 लोगों को गिरफ्तार किया था, जिनमें से 31 अक्टूबर 2016 को 8 अंडर ट्रायलज़ को जेल से भागने के आरोप में गोली मार दी गई थी। ऐसा पुलिस और जेल प्रशासन का दावा है कि वे लोग जेल से भागने की कोशिश कर रहे थे। हालांकि उनका फर्जी एनकाउंटर किया गया था। तब से बाक़ी बचे 21 अंडर ट्रायलज़ की स्थिति जेल में बद से बदद्तर बनी हुई है। बताया जा रहा है कि जेल के अंदर उनकी जान को खतरा है।

नजमाः 29 वर्षीय नजमा जेल में बंद 37 वर्षीय मोहम्मद ज़ुबैर की बेग़म हैं। ज़ुबैर को 21 फरवरी 2014 को उठाया गया था। तब से वह भोपाल की सेंट्रल जेल में हैं। नजमा बताती हैं कि ‘ हमारे हालात बहुत खराब हो चुके हैं। परेशानी उस दिन से शुरू हो गई थी जिस रोज़ हमारे शौहर घर से गए थे। अभी तक केस में लाखों रुपये लग चुके हैं, घर मुश्किल से चल रहा है ऊपर से केस पर लगने वाले पैसे।’

नजमा के अनुसार जेल में इन लोगों को रात-रात में उठाकर पीटा जाता है। दूसरे कैदियों से बोला जाता है कि इन्हें पीटो। ‘जय श्री राम’ के नारे लगाने के लिए बोला जाता है। दिन भर ये लोग जेल की छोटी सी बैरक में कै़द रहते हैं। इन्हें कभी बाहर नहीं निकाला जाता है। जब महीने में जब परिवार मुलाकात के लिए जाता है तभी इन लोगों को बाहर निकाला जाता है। मुलाक़ात के वक्त पांच पुलिसकर्मी इनके साथ खड़े रहते हैं और पांच उनके साथ। नजमा के अनुसार पांच मिनट से ऊपर की मुलाक़ात में हालचाल तक नहीं पूछ पाते हैं। सबसे बड़ी बात यह भी है कि जेल में पूरे दिन में इन लोगों को एक बोतल पानी दिया जा रहा है। उसी में इन्हें नहाना है, बाथरूम जाना है, नमाज़ के वक्त हाथ-पांव धोने हैं और वही पानी पीना भी है।

वह बताती हैं कि महतपुर से उज्जैन फिर वहां से भोपाल जाने के लिए इतने पैसे लग जाते हैं। भूख-प्यास से परेशान हम लोग भोपाल जाते हैं लेकिन पांच मिनट की मुलाक़ात होती है। जिसमें कोई बात ही नहीं हो पाती। नजमा के अनुसार उनके घर में ज़ुबैर के भाई परिवार चला रहे हैं। वे ही नजमा और उनके तीन बच्चों का पालन-पोषण करते हैं।

शमां परवीन– 24 वर्षीय शमा परवीन जावेद की बेग़म हैं। वह बताती हैं कि उनके शौहर का कहना है कि उन लोगों को जेल में तरह-तरह की प्रताड़नाएं दी जा रही हैं। खाने के लिए इतना ही दिया जाता है जितने में वे ज़िंदा रह लें। शमां के अनुसार उन्हें नमाज़ नहीं करने दी जाती। इस बाबत वे कई जगह शिकायत भी कर चुकी हैं लेकिन कहीं से इंसाफ नहीं मिला।

आमरेनः 26 वर्षीय मोहम्मद इरफान की बेग़म हैं। इरफान ढाबा चलाते थे। वह घोसबा से अहमदाबाद अपने चाचा के किडनी के ऑपरेशन के लिए उन्हें एक लाख रुपया देने जा रहे थे कि एटीएस ने उन्हें रास्ते से उठा लिया। आठ दिन तक किसी खूफिया जगह पर रखा। आपरेन बताती हैं कि ‘मेरे शौहर की एक आंख में बहुत तकलीफ है। हम लोग जेल में उन्हें एक चश्मा देकर आए थे लेकिन जेल प्रशासन ने उन्हें वह चश्मा नहीं दिया।‘ यहां तक कि इनके जीजा अबू फज़ल भी जेल में ही हैं।

इरफान को फौरन मेडिकल सहायता की ज़रूरत है। आमरेन का आरोप है कि जेल प्रशासन हमारे शौहर को कमज़ोर करके मार डालना चाहता है। वह कहती हैं कि 31 अक्टूबर यानी उस रात हुए एनकाउंटर से पहले सब ठीक था लेकिन उसके बाद तो जैसे सब इन लोगों का मारना चाहते हैं। आमरेन का कहना है कि हो सकता है कि उस रात का कोई राज़ इन लोगों के पास हो क्योंकि जेल प्रशासन इन लोगों से बोलता है कि तुम लोग आत्महत्या कर लो। आमरेन के घर में कोई कमाने वाला नहीं है। 65 वर्षीय बूढ़े ससुर कमाते हैं लेकिन हर 10 दिन के बाद उन्हें काम से निकाल दिया जाता है।

फरज़ानाः 25 वर्षीय फरज़ाना मोहम्मद आदिल की बेग़म हैं। उनके हालात भी बद से बदतर हैं। घर में कोई कमाने वाला नहीं है। रोज़ी-रोटी का गुज़ारा मुश्किल से हो रहा है। वह बताती है कि हमें अल्लाह पर ही भरोसा है और आंखों में शौहर का चेहरा है। फरज़ाना के अनुसार पहले बच्चे अपने अब्बू के बारे में खूब पूछा करते थे लेकिन अब वे भी नहीं पूछते हैं।

इन सभी के मामले को देख रही पीयूसीएल से जुड़ी माधुरी बताती हैं कि एनकाउंटर से जुड़े तथ्य बाहर न आएं इसीलिए इन लोगों की ज़िंदगी को मुश्किल किया जा रहा है। माधुरी का कहना है कि पल-पल इनका जेल में रहना खतरे से खाली नहीं है इसलिए जल्द से जल्द मानवाधिकार आयोग को इसमें दख़ल देना चाहिए। माधुरी के अनुसार दिल्ली अपनी मुश्किलें सुनाने और भी परिवारों ने आना था लेकिन पैसे और पुलिस के डर की वजह से नहीं आ पाए। वह बताती हैं कि परिवारों ने मानवाधिकार आयोग को लिखित में शिकायत दी है कि आयोग इस मसले में जल्द से जल्द दख़ल दे।

मांगेः कोई भी टीम फौरन जेल का दौरा कर इन लोगों से मुलाक़ात करे। इनकी जान को जेल में ख़तरा है। इनका मेडिकल करवाया जाए। इनके खाने और पीने के पानी की सुविधा को सुनिश्चिच किया जाए। इन्हें इनके वकील से मिलने की इजाज़त दी जाए। कानून अनुसार परिवार को 20 मिनट की तयशुदा मुलाकात करने की इजाज़त दी जाए। जो सामान और दवाएं परिवार जेल में देकर आता है वह उन तक पहुंचता नहीं है, वह पहुंचाया जाना चाहिए। जेल में इन लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं दी जांए। जिन 8 अंडर ट्रायल का एनकाउंटर किया गया था उनकी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट उनके वकील को दी जाए।

(साभार-democracia.in
मनीषा भल्ला की खास रिपोर्ट)

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