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मुज़फ्फरनगर दंगे में राहत के नाम पर घोटाले!

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की पिछली अखिलेश सरकार में मुज़फ्फर नगर के दंगे किसे याद नहीं होगा। मानवता को तार तार करने वाले जनसंहार को अखिलेश सरकार ने जांच के नाम चंद प्रशासनिक अधिकारियों को ज़िम्मेदार तो ठहरा दिया लेकिन दंगा पिढ़ितो के लिए जो मुआवज़ा ​जारी किया गया उसमें भी कई घोटाले किए गए जिसका खुलासे बचने के लिए अब प्रशासनिक अधिकारी आरटीआई यानी सूचना के अधिकार के ​तहत देने में लापरवाही कर रहे हैं यही वजह कि राज्य सूचना आयोग में आए ऐसे मामलों में अपीलों की तादात बढ़ती जा रही है। सितंबर 2013 में दंगे में शामली निवासी सईद हसन के पिता हाजी सिराजुद्दीन और मां हमीदन सहित तेरह लोगों की हत्या कर दी गई थी इस सम्बन्ध में सईद हसन ने अक्टूबर 2015 में शामली जिलाधिकारी के यहां आरटीआई के जरिए दंगे के बारे में लेखपाल से लेकर एसडीएम तक की रिपोर्टों की जानकारी मांगी, लेकिन उन्हें सूचना नहीं मिली। इसी प्रकार मेरठ निवासी रहीमुद्दीन सैफी ने डीएम शामली के दफ्तर से आईटीआई के जरिए दंगे से संबंधित अफसरों की रिपोर्टों की प्रतियों के साथ हाई कोर्ट के आदेश से कितने मृतक परिवारों को आर्थिक सहायता राशि दी गई? कितने पीड़ित परिवारों को पुनर्वास सहायता राशि और कितने लोगों को सरकारी नौकरियां दी गईं? इसकी सूचना मांगी थी। लेकिन, उन्हें भी स्थानीय प्रशासन ने सूचनाएं नहीं दीं। हार कर सईद हसन और रहीमुद्दीन ने राज्य सूचना आयोग में अपील की। राज्य सूचना आयुक्त हाफिज उस्मान ने बताया कि दोनों अपीलों पर सुनवाई के बाद डीएम शामली कार्यालय के जनसूचना अधिकारी को नोटिस जारी कर तीस दिनों में मांगी गई सूचनाएं देने के आदेश दिए गए हैं। बताया कि इससे पहले भी आयोग में मुजफ्फरनगर दंगों से संबंधित करीब दर्जन भर अपीलों पर सुनवाई चल रही हैं। कई मामलों में तो जुर्माने के बाद भी स्थानीय प्रशासन द्वारा सूचनाएं नहीं दी जा रही हैं। अखिलेश सरकार ने इस दंगे पीढ़ितों को हर संभव मदद देने का आश्वाषन दिया था लेकिन उनके अधिका​रियों ने इससे सम्बन्धित जानकारी देने में हीलाहवाली कर रहे हैं और अब तो सरकार भी नई है।

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