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पीएम मोदी ने जुकरबर्ग को जिस ‘साइबर विलेज’ को दिखाकर लुटी थी वाहवाही, वह बंद होने के कगार पर

अलवर: दिल्ली से 150 किलों मीटर दूर राजस्थान के अलवर में स्थित देश का पहला ‘साइबर विलेज’ बंद होने के कगार पर है। फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग को इस गांव में बुलाकर इसे देश का पहला साइबर विलेज बताया गया था। लेकिन सच्चाई यह है कि इस गांव में किसी को भी कंप्यूटर चालू करने तक नहीं आता।

जब फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग भारत आए थे तब राजस्थान के चांदोली गांव को देश का पहला सायबर विलेज बताकर वाहवाही लुटी गई थी। लेकिन सच्चाई यह है कि आज जब कोई सेलिब्रिटी चांदोली गांव को देखने आता है तो कुछ बच्चों को बैठाकर लैपटॉप ऑपरेट करा दिया जाता है और फिर बच्चों का सेलिब्रिटी के साथ फोटो सेशन हो जाता है।

दरअसल, दैनिक भास्कर ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें उसने दावा किया है कि यह साइबर विलेज अब केवल कागज के पन्नों पर ही बचा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कुछ स्कूली बच्चों को छोड़ दिया जाए तो गांव के किसी भी व्यक्ति को कंप्यूटर या लैपटॉप खोलना तक नहीं आता।

बता दें कि मोदी सरकार ने इसे पायलट प्रोजेक्ट के तहत इस गांव का चयन किया था और कंप्यूटर एजुकेशन के लिए देश का पहला साइबर ग्राम घोषित किया था। यहां साइबर ग्राम योजना के तहत लड़के लड़कियों और महिलाओं व्यापारियों को कंप्यूटर के बारे में ज्ञान देना था।

हालांकि हकीकत से दूर सरकार का दावा है कि चांदोली में 2650 बच्चों और महिलाओं को डिजिटली साक्षर किया गया है। जबकि  हकीकत यह है कि गांव में एक भी ऐसी महिला नहीं है जो कंप्यूटर जानती हो। वहीं सरकार ने दावा किया था कि करीब एक हजार किसान इंटरनेट का यूज कर रहे हैं और इसे वे खेती, फसल के चयन, बाजार कीमतों के लिए काम में लेते हैं। लेकिन हकीकत उसके ठीक उलट है।

गौरतलब है कि 11 अक्टूबर 2014 को फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग इस गांव में आए थे और सरकार ने इसे दिखाकर बताया था कि भारत का गांव टेक्नोलॉजी के मामले में कितना आगे है। तब जुकरबर्ग ने इस गांव की काफी तारीफ की थी। दरअसल, साइबर ग्राम योजना को फरवरी 2014 में भारत सरकार के अल्पसंख्यक मंत्रालय ने डिजिटल एंम्पावरमेंट फाउंडेशन को सौंपा था। इसका लक्ष्य था हर घर से कम-से-कम दो सदस्यों को कंप्यूटर का ज्ञान देना है।

 

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