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सबसे ज़्यादा कुर्बानियां इस मुस्लिम बहुल गाँव ने दी है, देशभक्ति का सर्टिफिकेट बांटने वाले ज़रूर पढ़ें!

नए निज़ाम में भारते के मुसलमानों को शक की नज़र से देखा जा रहा है , उनसे देश भक्ति का सबूत मांगा जा रहा है । लेकिन आज हम आपको एक ऐसी जगह ले चलते हैं जहां की धरती कुर्बानियों की गवाह है। राजस्थान के झुंझनू का मुस्लिम बहुल गांव धनूरी राजस्थान में सबसे ज्यादा सैनिक कुर्बानिया देने वाला गांव है।

कैप्टन अली हसन खान ने ही दो साल पहले प्रधानमंत्री कार्यालय को खत लिखकर यह जानकारी दी थी कि झुंझनू का मुस्लिम बहुल गांव ‘धनूरी’ राजस्थान में सर्वाधिक सैनिक कुर्बानियां देने वाला गांव है। इस खत में प्रथम विश्वयुद्ध से लेकर कारगिल तक के उन सभी शहीदों की जानकारी शामिल थी जो धनूरी से ताल्लुक रखते थे।

आंकड़ों की तरफ देखें तो राजस्थान से फौज में भर्ती होने वाले सर्वाधिक युवा शेखावाटी (सीकर-झुंझनू जिले) से ही आते हैं। हाल ही में छत्तीसगढ़ के सुकमा नक्सली हमले के शहीदों में से एक, बन्नाराम भी सीकर से ही थे।

धनूरी गांव में शहीद की बेवाएं गर्व से बताती हैं कि उनके पति ने देश की सेवा में अपने प्राण न्यौछावर की । गांव 90 साल की सायरा बानो के पति दूसरे विश्वयुद्ध में शहीद हो गए थे। स्थानीय लोगों बतातें हैं कि गांव के हर घर से कोई ना कोई सेना में है ।

स्थानीय निवासी इस्माइल कहते हैं कि हमें इस बात का फख़्र है भाई जी कि हमारे यहां से लोग पांच-पांच पीढ़ियों से फौज में भर्ती हो रहे हैं। मेरे वालिद भी फौज में थे और मेरा भाई भी फौज में ही है।’ जब उनसे पूछा गया कि आप क्यों नहीं गए सेना में तो बोले कि कोशिश की थी लेकिन रह गया।

फौजियों को मिलने वाली सुविधाओँ पर से जुड़े सवाल पर इस्माइल कहते हैं कि ‘पता है भाई जी उस समय उतना दुख नहीं होता जब कोई सैनिक शहीद होता है, अफसोस तो तब होता है जब शहीदों के परिवार वालों, जंग के अपाहिजों और रिटायर्ड फौजियों को अपने हक के लिए दफ्तरों की ख़ाक छाननी पड़ती है।’

इस्माइल आगे कहते हैं कि ‘ बिल्कुल साधारण सा गांव है जहां सुविधा के नाम पर कुछ नहीं है. सालों से कोशिश कर रहे हैं स्कूल 12वीं तक करवाने की लेकिन वह तक नहीं हुआ।’

गौरक्षा के नाम पर इस्माइल कहते हैं कि ‘हमारे यहां पर भी सक्रिय हैं ऐसे गोरक्षक। आप गायों को ले जाने की सूचना पुलिस को दो, पता नहीं कैसे, गोरक्षक पहुंच जाते हैं! पिछले दिनों गाएं ले जा रहे एक आदमी ने उनको पैसे देने से मना कर दिया तो उसके साथ मारपीट कर उसकी गायें और बछड़े छुड़वा दिए। अब वो पूरे गांव में चारे-पानी के लिए भटकते फिर रहे हैं।’

गांव में यहां हमारी मुलाकात होती है वीरांगना अलहमदो बानो से। इस इलाके में किसी शहीद सैनिक की विधवा को यही ओहदा दिया जाता है।

शहीद की पत्नी अलहमदो बानों कहती हैं कि ‘रमजान 14 ग्रेनेडियर्स में जीडीआर पोस्ट पर काम करतां. कुपावाड़ा में 1997 में शहादत हुई।’ बातों से पता चलता है कि बानो को कैंसर है। संक्रमण के चलते एक आंत भी निकाली जा चुकी है।

हालांकि इस बात को लेकर उनके चेहरे पर कतई रंज नहीं है, लेकिन सरकारी महकमों की लालफीताशाही से वे काफी परेशान हैं। वे कहती हैं, ‘छोटां-छोटां कामां खातर दफ्तरों का कत्ता ई (काफी) चक्कर काटना पड़सी। बठै कोई ने चिंता ई कोनी कै म्हे शहीदां रे परिवार वाला हां।’

शहीद रमजान की एक बेटी और दो बेटे हैं। इस्माइल बताते हैं कि बानो की ही हिम्मत है जो तमाम विपरीत हालातों में भी बच्चों की परवरिश से कभी समझौता नहीं किया। इसका नतीजा ये है कि एक छोटे से गांव में पलने के बावजूद उनकी बेटी एमबीबीएस कर दिल्ली के सफदरगंज अस्पताल में डॉक्टर है।

शहीद रमज़ान एक बेटा जयपुर से इंजीनियरिंग कर रहा है और दूसरा रूस से डॉक्टरी. बानो बताती हैं कि तौफीक (रूस) री स्कॉलरशिप जारी कोनी हुई। बठै रहबा खात्तर पीशा (पैसों) की जरूरत है। दफ्तरां मां कोई सुनवा ने ही तैयार कोनी. बीमारी के हालातां में भी ऑफिसों के चक्कर काटना पड़सी।

गांव में अगला घर सायरा बानो का है। गांव का एक और साधारण सा घर। अंदर सायरा बीड़ी पी रहीं हैं। उन्हें कम सुनाई देता है, सो घर की दूसरी औरतों से बातें हुईं।

वे बताती हैं कि जब सायरा के पति ताज मोहम्मद दूसरे विश्व युद्ध के दौरान शहीद हुए थे तब वे महज 15 साल की थीं। इसके बाद भी वे हमेशा गांव के बच्चों को फौज में जाने के लिए प्रेरित करती रही हैं।

कप्तान अली हसन सन 96 में रिटायर्ड हो गए। अब वो सरहद की बजाय गांव वालों के हक के लिए अलग-अलग महकमों से लड़ते हैं। वे अंदर से फाइलों का एक गठ्ठर लाकर दिखाते हैं और बताते हैं, ‘बेटा सीमा से बड़ी जंग हमें देश में लड़नी पड़ती है। वहां हमें पता होता है कि दुश्मन कौन है लेकिन यहां तो अपने ही…’

‘धनूरी से सत्रह शहीद होने के बावजूद हमारे गांव में एक शहीद स्मारक तक नहीं है’ कप्तान साहब बताते हैं, ‘हमारे मजहब में बुत नहीं बनवाए जाते, तो हम चाहते हैं कि शहीदों की याद में एक स्मारक बन जाए जिस पर पहले विश्वयुद्ध में शहीद हुए हमारे बुजुर्गों से लेकर रमजान खान तक सभी शहीदों के नाम लिखे हों। विधायकों और कलेक्टरों से लेकर मुख्यमंत्रियों तक न जाने कितनी अर्जियां पहुंचा दी लेकिन सालों से सिर्फ आश्वासन मिलते आ रहे हैं।’

प्रशासन से ख़फा हसन कहते हैं, ‘हमारे 1000 घरों से 250 युवा फौज में कार्यरत हैं और करीब 300 सेवानिवृत हो चुके हैं। यानी लगभग हर घर ने अपना एक बेटा देश को सौंपा है। इसके बावजूद हमारे बच्चों के लिए गांव में हायर सैकंडरी स्कूल तक नहीं है।

सरकार से कितनी ही बार दर्ख्वास्त कर ली लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं। प्रधानमंत्री कार्यालय में दरख्वास्त लगाई तो अफसरों ने उसे गलत जानकारी दे दी कि यहां पहले से ही स्कूल है। गांव के छोटे स्कूल की सालों से कोई मरम्मत नहीं हुई है। उसकी खराब हालत देखकर फौज से ही रिटायर्ड हुए परवेज खान ने अपनी जेब से पैसे लगाकर स्कूल का गेट बनवाया है।’

कप्तान अली हसन आगे कहते हैं, ‘अंधेरगर्दी देखिए, गांव के स्कूल में एनसीसी थी, जिससे गांव के बच्चों को कम उम्र से ही ट्रेनिंग मिलना शुरू हो जाती थी और आगे नौकरी मिलने में भी मदद रहती थी। लेकिन उसे यहां से हटाकर दूर के निजी स्कूल में शिफ्ट कर दिया गया है।

शिकायत करने पर शिक्षा विभाग बहाना बनाता है कि विद्यालय में एनसीसी के लिए 40 वर्ष की आयु से कम के अध्यापक नहीं है। ये तो सरकार का काम है, लेकिन उन्होंने अपना पल्ला झाड़ लिया।’

अली हसन बताते हैं कि अमूमन सभी विभागों का एक सा हाल है। वे कहते हैं, ‘जंग में घायल हुए सैनिकों को अनुकंपा जमीन से लेकर अन्य रियायतें प्राप्त करने के लिए दफ्तरों के चक्कर पर चक्कर लगाने पड़ते हैं। जिन्होंने पैसा दे दिया उनका काम हो गया बाकियों की सुनने वाला कोई नहीं है।

अली हसन के एक रिश्तेदार सद्दीक खान जो राजस्थान पुलिस में सब इंस्पेक्टर के पद से रिटायर हुए हैं, कहते हैं, ‘जब पूरे देश में हिंदू-मुसलमान एक साथ रहते हैं। तहजीबें एक दूसरे में गहराई तक समाई हुई हैं तो मंदिर और मस्जिद भी तो आस-पास ही होंगी, इसमें दिक्कत क्या है? हिंदू भाइयों की श्रद्धा का ख्याल हमें रखना होगा और हमारी का उन्हें।’

सद्दीक खान कहते हैं, ‘बुरा लगता है जब एक मुसलमान को बार-बार अपने देशभक्त होने का सबूत देना पड़ता है। जबकि न तो वफादारों की कोई निश्चित कौम होती ही और न ही गद्दारों का कोई मजहब। लेकिन शुक्र है हमारे गांव में इस तरह का माहौल नहीं है। हमारे यहां हिंदू-मुसलमानों के बीच किसी तरह का कोई बैर नहीं। सभी भाइयों की तरह रहते हैं और एक-दूसरे के हर कार्यक्रम में वैसे ही शिरकत करते हैं जैसे किसी अपने के में।’

वे बताते हैं, ‘हमारे गांव की बेटी है संजू पारिक, अभी चूरू जिले में एसडीएम हैं। उनके पति भी फौज में शहीद हो गए थे। उसके बाद बिटिया वापिस गांव आ गयी। उसे अपनी बच्ची समझकर हम लोगों से जो कुछ बन पड़ा, हमने किया।

खान फोन पर एसडीएम पारिक से बात भी करवाते हैं. संजू पारिक बताती हैं कि जब उनके पति शहीद हुए थे तब वे महज 12वीं पास थीं। उस मुश्किल वक्त में घर वालों से ज्यादा सहयोग गांव वालों ने दिया था। पारिक कहती हैं, ‘इन सभी ने बिना किसी मजहबी भेद के कदम-कदम पर भाई और पिता बनकर मेरा साथ दिया है। इन्ही की दुआ और प्यार है कि मैं यहां तक पहुंच सकी।’

सद्दीक खान कहते हैं, ‘सरकार सर्जिकल स्ट्राइक जैसी मुहिमों के नाम पर वोट मांगती है, जीत भी जाती है। लेकिन फौजियों के लिए जब कुछ करने की बारी आती है तो हमारे हाथ सिर्फ निराशा लगती है।’ इन दोनों ही बुजुर्गों की बातों और परेशानियों से जी जुड़ सा जाता है। वहां से जाने का मन नहीं होता लेकिन ट्रेन का समय हो चला है।

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