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वो सैयद शहाबुद्दीन थे जिन्होंने मुसलमानों को बाबरी मस्जिद के लिए लड़ना सिखाया

नई दिल्ली: पूर्व सांसद और ऑल इंडिया बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के सदस्य सैयद शहाबुद्दीन का शनिवार की सुबह निधन हो गया है। वे 82 साल के थे और लंबे समय से बीमार चल रहे थे।

सैयद शहाबुद्दीन की पैदाईश 4 नवम्बर 1935 में झारखंड के रांची में हुई थी। उनकी पैदाईश झारखंड के सैयद निजामुद्दीन और सकीना बानो के घर हुई। वे उन मुस्लिम कद्दावर नेताओं में थे जिन्होंने मुस्लिम राजनीति को अलग दिशा दी। उन्होंने कैरियर की शुरूआत एक राजनयिक और एक राजनेता के रूप शुरू किया। वे भारतीय विदेश मंत्रालय में दक्षिण पूर्व एशिया, हिंद महासागर और प्रशांत के संयुक्त प्रभारी सचिव भी रहे।

सैयद शहाबुद्दीन तीन बार भारतीय संसद के सदस्य रहे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में वकालत की। उसके बाद 1989 में उन्होंने ‘इंसाफ पार्टी’ की स्थापना की और मुस्लिमों की रहनुमाई करने लगे। मुसलमानों के हक की लड़ाई लड़ते हुए उन्होंने मुस्लिम आरक्षण जैसे कई मुद्दों पर बहस छेड़ी।

उनका नाम शाह बानो केस से लेकर बाबरी मस्जिद विध्वंश तक जुड़ा रहा। बताया जाता है कि जब बाबारी मस्जिद को गिराया गया तो उन्होंने मुसलमानों से अपील किया कि वे ‘सरकारी समारोहों’ से अलग रहकर सरकार के प्रति अपना विरोध जताएं। उन्होंने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और इसकी लीगल लड़ाई में उतर गए।

सैयद शहाबुद्दीन भारत के संघीय ढ़ांचे के पैरोकार थे। उनका मानना था कि शासन के हर मुहकम्मे पर जनता का अधिक-से-अधिक भागीदारी होनी चाहिए। जब साल 2010 में भारत के प्रमुख मुस्लिम संगठनों ने मुसलमानों के लिए आरक्षण का मुद्दा उठाया तो उन्होंने उसकी अगुआई की। उन्होंने कहा कि आरक्षण मुसलमानों का वाजिब हक है और उन्हें ये मिलना चाहिए।

आरक्षण के मुद्दे पर उन्होंने एक बार कहा था, “मुसलमानों को आरक्षण दिया जाए। रंगनाथ मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट के पूरे सुझावों पर अमल किया जाए। आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा को हटाया जाए और धारा 341(3) में संशोधन कर मुसलमानों को भी अनुसूचित जाति में शामिल किया जाए।”

शहाबुद्दीन का मानना था कि 1950 में राष्ट्रपति अध्यादेश के जरिए धारा 341 पर प्रतिबंध लगाकर सभी अल्पसंख्यकों को अनुसूचित जाति से खारिज कर दिया गया। लेकिन बाद में सिखों और नवबौद्धों को इस धारा में संशोधन कर अनुसूचित जाति की श्रेणी में शामिल किया गया पर मुसलमान और ईसाई को इससे जानबूझकर बाहर रखा गया।

सैयद शहीबुद्दीन बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के सदस्य थे। उन्होंने इस मुद्दे पर देश भर के बुद्धिजीवियों को लामबंद किया। उन्होंने ही बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की नीव रखी थी। वे बाबरी मुद्दे को कोर्ट और दूसरे फोरम तक लेकर गए। वे मानते थे कि भारतीय मुसलमान पहले मुसलमान है फिर भारतीय है।

इसके अलावा उन्होंने सलमान रुश्दी की किताब ‘सैटेनिक वर्सेज’ को प्रतिबंधित कराने में अहम भूमिका निभाई। कहा जाता है कि जिस जमाने में भारत के मुसलमान कुर’आन और हदीस के आलावा कुछ और सोच पाते थे उस जमाने में सैयद शहाबुद्दीन ने मुसलमानों में राजनीतिक और सामाजिक सोच पैदी की।

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