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UP: नोटबंदी फेल होने का एक और सबूत, वोट खरीदने के लिए इस चुनाव में और ज्यादा खर्च किए गए पैसे

बीते साल आठ नवम्बर को पीएम मोदी में भ्रष्टाचार रोकने के लिए नोटबंदी लागू की थी। नोटबंदी के बाद कालाधन पर लगाम लगाने के बड़े-बड़े वादे किए गए और चर्चा थी कि आने वाला चुनाव पहले के मुकाबले ईमानदारी और सादगी से लड़ा जाएगा लेकिन रिपोर्ट आने के बाद साफ़ हो गया है कि इस बार के चुनाव में नेताओं पर नोटबंदी का रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ा है।

सीएमएस के चुनाव पूर्व एवं पश्चात सर्वेक्षण के अनुसार उत्तर प्रदेश के चुनाव में विभिन्न दलों ने 5500 करोड़ रुपये खर्च किए जिनमें करीब 1000 करोड़ रपये ‘वोट के बदले’ नोट पर खर्च किए गए। सर्वे के दौरान करीब एकतिहाई मतदाताओं ने नकद या शराब की पेशकश की बात मानी है।

सर्वेक्षण कहता है कि रूझान के मुताबिक वर्ष 2017 में 1000 करोड़ रुपये मतदाताओं के बीच बांटे गए। जितने मतदाताओं पर सर्वेक्षण किया गया उनमें से 55 फीसदी अपने आसपास में किसी न किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जिन्होंने इस या पिछले विधानसभा चुनावों में वाकई पैसे लिए।

इस चुनाव में वीडियो वैन समेत प्रिंट एवं इलैक्ट्रोनिक सामग्री पर ही 600-900 करोड़ रपये खर्च हुए। सर्वेक्षण कहता है, ‘उत्तर प्रदेश में डाले गए हर मत पर करीब 750 रुपये खर्च आए जो देश में सर्वाधिक है।’

अध्ययन के अनुसार सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि नोटबंदी से चुनाव व्यय काफी बढ़ गया। कुछ निर्वाचन क्षेत्रों, जहां मुकाबला कड़ा था, मतदाताओं की संख्या और मतदाता की भूमिका को प्रभावित करने के हिसाब से लोगों के बीच 500 से लेकर 2000 रुपये तक बांटे गए। दोतिहाई मतदाताओं के हिसाब से उम्मीदवारों ने पहले से ज्यादा खर्च किए।

 

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