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कश्मीर में जुल्म की कहानी बयाँ करतीं ‘आधी विधवाएं’

कश्मीर में इन दिनों फिर से उथल-पुथल मची हुई है। असंतोष की आग फिर तेज़ हो गई है। यूँ तो यह आग घाटी के लिए नई नहीं है। लेकिन इस बार इसकी तपिश कुछ ज्यादा ही लाल दिखाई दे रही है।

बुनियादी स्वतंत्रता और अधिकारों से वंचित रहने के असंतोष ने आज कश्मीर के लोगों को भीतर तक कुरेद दिया है लेकिन हमने उनकी इस तड़प के सामने अपनी आखें बंद कर रखी हैं।

हमें बस कश्मीर से लगाव रहा है लेकिन कश्मीरियों से नहीं। कश्मीर के बारे में आम लोग ही नहीं, खास लोगों, नौकरशाहों और मीडिया के बड़े हिस्से में तथ्यों की जानकारी के मुकाबले भावना का ज्वार अधिक दिखता है।

बहरहाल, ऐसे में एक नाम कश्मीर की मनमोहक वादियों में न खत्म होने वाली सज़ा बन कर गूंज रहा है। ‘हाफ विडो’ यानी ‘आधी विधवा’।

वे महिलाएँ जिनके पतियों को फौज, पुलिस या सुरक्षाबल के जवान “पूछताछ” के लिए ले गए और फिर उनका कोई अता-पता नहीं चलता, यहाँ ‘हाफ विडो’ कहलाती हैं। घाटी में ऐसी आधी विधवाओं की संख्या हज़ारों में है। वहीँ, बुरहान वानी प्रकरण के बाद इनकी संख्या में भी इजाफा होने की सम्भावना ने इनकार नहीं किया जा सकता।

इन महिलाओं के नाम के आगे अलिखित रूप से विधवा शब्द जुड़ जाता है और साथ ही जुड़ता है वह दर्द और तकलीफ जो उसे तनहा रहने पर मजबूर कर देती है। भले ही ऐसी महिलाओं के आगे ‘आधी विधवा’ शब्द क्यों न जुड़ा हो लेकिन इनकी बेचैनी पूरी विधवा से कम नहीं होती।

एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स ऑफ़ डिसअपियर्ड पर्सन (APDP) के एक सर्वे के अनुसार, 1989 में शुरू हुए विद्रोह के बाद से अभी तक लगभग 8000 से 10000 लोग लापता हो चुके हैं। इस संस्था द्वारा सर्वे के आधार पर इकठ्ठा किये आकड़ों की माने तो  कश्मीर में ‘हाफ विडो’ की संख्या 1500 के आस-पास है।

हालाँकि मानवाधिकार और जेंडर वायलेंस पर काम करने वाले तमाम नागरिक संगठन और संस्थाओं के आकड़ों के अनुसार इनकी संख्या 2000 से लेकर 2500 तक हो सकती है।

इसके अलावा जम्मू कश्मीर कोलिशन ऑफ़ सिविल सोसायटी (JCCS) के आकड़ो पर यदि नज़र डाले तो कश्मीर में ‘हाफ विडो’ की  संख्या लगभग 1500 से 2000 के बीच है। यह आकड़े 1989 से लेकर हाल के वर्षों में किये के सर्वे पर आधारित है।

इस तरह के तमाम संगठनों के ‘हाफ विडो’ के आकड़ों में फर्क हो सकता है लेकिन आंकड़ों में उलझने के बजाय अहम बात यह है कश्मीर के लोगों के लापता होने की इस समस्या में कोई बदलाव नहीं आया है। यह सिलसिला अभी तक बदस्तूर जारी है। और जारी है उस पत्नी का अपने पति की जुदाई में बिलखना और आंसू बहाना।

हाँ इनके मन में उम्मीद की एक मज़बूत डोर ज़रूर बंधी होती है। वो उम्मीद है एक खबर की। ऐसी खबर जो इनके लम्बे इंतज़ार को ख़त्म कर दे। जो इनके मायूस चेहरे को फिर से गुलज़ार कर सके। लेकिन एक कड़वा सच यह भी है कि इनमे से अधिकतर जिंदगियों को ज़िन्दगी भर इसी मायूस और मुरझा चुके चेहरे के साथ जीना पड़ता है।

इंटरनेशनल डे ऑफ़ दी डिसअपियर्ड

“पूछताछ” के नाम पर गायब कर दिए गये लोगों की तरफ समाज और सरकार का ध्यान दिलाने के मद्देनज़र एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स ऑफ़ डिसअपियर्ड पर्सन (APDP) 30 अगस्त को  ‘इंटरनेशनल डे ऑफ़ दी डिसअपियर्ड’ मनाता आ रहा है।   इसकी शुरुआत 2007 से की गयी थी जिसका मकसद बदकिस्मती का दंश झेलते लापता हो चुके गरीब तबके ने आने वाले बंदियों को याद करना और राहत पहुंचाना है।

  • नवेद अख्तर

 

 

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