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हाशिमपुरा: 30 साल बाद भी सवाल वही, हत्यारे कौन थे?

आज से ठीक 30 बरस पहले 22 मई 1987 की रात यूपी की रिज़र्व पुलिस बल प्रोविंशियल आर्म्ड कांस्टेबुलरी (PAC) ने 42 मुसलमानों को हिरासत में लेकर गोली मार दी थी. पीएसी के जवानों ने हत्या के बाद उनकी लाशें ग़ाज़ियाबाद की गंग नहर और हिंडन नदी में फेंक दी थी.

मारे गए मुसलमान मुहल्ला हाशिमपुरा, ज़िला मेरठ के रहने वाले थे. सभी दिहाड़ी मज़दूर और पेशे से बढ़ई, दर्ज़ी, जुलाहे थे. 30 साल के बाद भी उनकी ज़िंदगी में कुछ ख़ास बदलाव नहीं दिखता. जो मारे गए उनके घर वाले और जिन्हें जेलों में रखकर पीटा गया, सभी वक़्त से पहले बूढ़े हो गए हैं. इनके रोज़गार अभी भी वही हैं जो पहले थे.

इस कांड के पांच चश्मदीदों में से एक मुहम्मद नईम याद करते हैं, “उन्होंने मुझे मरा समझकर गंग नहर में फेंक दिया था. मैं सरकंडे की झाड़ियों को पकड़कर उसके पीछे छिप गया था. मैंने देखा कि पीएसी के दो जवान एक लड़के की दोनों बाहें अपनी-अपनी तरफ खींच रहे थे और तीसरा जवान उसके सीने पर गोली दाग रहा था. इस तरह मैंने 14 लाशें गिरते हुए देखीं.”

28 साल लग गए इस केस की तफ़्तीश, सुनवाई और पहला फ़ैसला आने में. मगर इस लंबे इंतज़ार के बाद 21 मार्च 2015 को आया फ़ैसला मायूसी साथ लाया. अदालत ने सभी 16 अभियुक्तों को सबूतों के अभाव में सभी आरोपों से बरी कर दिया था. हाशिमपुरा के बाशिंदे फैसला सुनकर घरों से बाहर निकल आए थे. हर कोई यही पूछ रहा था कि फिर हमारे गुनहगार कौन हैं?

इंसाफ़ में देरी क्यों?

हाशिमपुरा कांड के दौरान केंद्र और राज्य दोनों में कांग्रेस की सरकार थी. यूपी सरकार की एक मशीनरी ने इस हत्याकांड को अंजाम दिया था. सरकार की मंशा शुरू से ही पीड़ितों के साथ न्याय करने की नहीं थी, उसका पूरा ज़ोर आरोपियों को बचाने में था. लिहाज़ा, जब अदालत का फ़ैसला आया तो इस केस की क़रीब से निगरानी करने वालों को कोई हैरानी नहीं हुई.

आज़ाद भारत के इतिहास में धार्मिक घृणा का यह ऐसा मामला है, जिसमें राज्य की रिज़र्व पुलिस बल सीधे तौर पर हत्याकांड में शामिल पाई गई. इसके बाद राज्य सरकार, प्रदेश पुलिस और अभियोजन पक्ष, जिनसे इंसाफ़ की उम्मीद थी, उन्होंने मुलज़िमों की शिनाख़्त और उन्हें सज़ा दिलवाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई. जांच की ज़िम्मेदारी सीबीसीआईडी को सौंपी गई थी, लेकिन ‘घर का मामला’ होने के नाते उसने पुख़्ता सबूत जुटाने की बजाय केस को ही खोखला कर दिया.

1987 में हुए इस कांड के बाद से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के अलावा लंबे समय तक समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने शासन किया. ये सभी पार्टियां ख़ुद के सेकुलर और मुसलमानों की ख़ैरख़्वाह होने का दावा करती हैं, लेकिन हाशिमपुरा को सभी ने मायूस किया. 30 साल बाद भी कोई ‘सेकुलर दल’ पीड़ितों के साथ खड़ा नहीं देखा गया.

इस कांड के फौरन बाद कहा गया कि ‘ऊपर’ से मिले आदेश के बिना हाशिमपुरा जैसा जनसंहार मुमकिन नहीं था. मगर आदेश किसने दिया, आज तक इसका पता नहीं चल पाया. चश्मदीद मुहम्मद नईम कहते हैं, “इसके बावजूद हमने उम्मीद नहीं छोड़ी है. आख़िरी सांस तक हम लड़ते रहेंगे और अगर मर गए तो हमारे बच्चे यह मुक़दमा देखेंगे.”

 

आगे क्या?

इंसाफ़ की लड़ाई 22 मई 1987 से ही जारी है. 21 मार्च 2015 को आए फ़ैसले के ख़िलाफ़ पीड़ितों ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील दायर की है. मौजूदा सबूत से कड़ियां जोड़ने के लिए नए दस्तावेज़ निकाले जा रहे हैं, ताक़ि दोषी मुलज़िमों की पहचान की जा सके.

अदालत से मांग की गई है कि इस कांड के शिकार ऐसे भी मुसलमान हैं जो बुरी तरह घायल हुए थे, उन्हें भी मुआवज़ा दिया जाए. यह मांग भी की गई है कि सांप्रदायिक आधार पर हिरासत में लेकर की जाने वाली हत्यायों के ख़िलाफ़ स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं, ताक़ि फिर कहीं कोई हाशिमपुरा ना होने पाए.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के हस्तक्षेप के बाद अदालत ने मृतकों के घर वालों को 2-2 लाख रुपये और घायलों को एक-एक लाख रुपये मुआवज़ा देने का आदेश दिया है. उम्मीद है कि आगामी 13 जुलाई तक पीड़ितों को मुआवज़ा मिल पाएगा.

 

डर का क्या करें?

हापुड़ रोड पर गुलमर्ग सिनेमा के ठीक सामने है हाशिमपुरा. इस मुहल्ले में आने और जाने के लिए सिर्फ एक संकरी गली है. अगर गली का मुहाना बंद कर दिया जाए तो इस मुहल्ले से बाहर नहीं निकला जा सकता. बाक़ी तीनों दिशाओं में हिंदुओं के मुहल्ले आबाद हैं.

ग़रीबी के स्तर में यहां कोई ख़ास सुधार नहीं हुआ है. अभी भी यहां के ज़्यादातर लोग वही पुराने काम करते हैं. बस मकान कच्चे की जगह पक्के हो गए हैं. नालियों से गंदा पानी निकलने का इंतज़ाम ठीक नहीं है.

याक़ूब सैफ़ी 1987 में शहर के बच्चा पार्क इलाक़े में टेलरिंग की शॉप चलाते थे जिसे दंगाइयों ने जला दिया था. उनके भाई महताब को पीएसी के जवान ले गए थे जिसकी लाश भी नहीं मिली. याक़ूब को 22 दिन तक जेल में रखकर पीटा गया.

कुछ महीने बाद जब हालात सामान्य हुए तब उन्होंने दूसरे की दुकान पर 8 साल तक मज़दूरी की. फिर सिलाई मशीन ख़रीदकर उन्होंने और उनकी बीवी नसरीन ने घर में टेलरिंग का काम शुरू किया. आज भी याक़ूब यही काम करते हैं. शहर में दोबारा दुकान बना ली है.

याक़ूब कहते हैं कि उस हादसे का ख़ौफ़ इतना है कि 30 साल बाद भी दहशत में जीते हैं. शहर में मामूली तनाव होता है तो ‘सतासी’ की यादें ज़ेहन में ताज़ा हो जाती हैं. भेदभाव होता है तो नज़रअंदाज़ करके आगे बढ़ जाते हैं. हम एक और हाशिमपुरा नहीं चाहते. ज़िंदगी बड़ी मुश्किल से पटरी पर वापस लौटी है.

 

हाशिमपुरा कांड अलविदा (रमज़ान महीने का आख़िरी जुमा) के दिन हुआ था. जुमे की नमाज़ के बाद बुज़ुर्गों, बच्चों और औरतों को छोड़कर कमोबेश सभी को उठा लिया गया था. सभी को सिविल लाइंस पुलिस स्टेशन में हाज़िर करने के बाद जेल भेजा जा रहा था.

मगर रिज़र्व पुलिस बल पीएसी के जवान आख़िरी ट्रक ग़ाज़ियाबाद की ओर ले गए थे. इस ट्रक में ज़्यादातर कम उम्र के नौजवान बिठाए गए थे जिन्हें जवानों ने गंग नहर के पास गोली मार दी थी.

  • शाहनवाज़ मलिक (कैच न्यूज़)

 

 

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