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रिपोर्ट: मोदी सरकार के वादों से इतर आज भी विकास के हाशिए पर हैं दलित, मुस्लिम और आदिवासी..

नई दिल्ली: केंद्र में बैठी मोदी सरकार के तीन साल पूरे हो चुके हैं। अब सरकार द्वारा किए गए विकास के खोखले दावों की पोल भी ही है।

सेंटर ऑफ इक्विटी स्टडीज (सीईएस) द्वारा जारी इंडियन एक्सक्लूजन रिपोर्ट (2016) में यह बात सामने आई है कि आज भी देश में दलित, आदिवासी और मुसलमानों के साथ दिव्यांग भी सार्वजनिक सेवाओं की पहुंच से बहुत दूर हैं।

ये रिपोर्ट शुक्रवार को नई दिल्ली में इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट में जारी की गई। यह सीईएस के एनुअल फ्लैगशिप प्रकाशन का तीसरा संस्करण है।

सीईएस के निदेशक हर्ष मंदर ने बताया कि इस रिपोर्ट में चार सार्वजनिक सेवाओं को शामिल किया गया है। ये हैं – वृद्धावस्था पेंशन, डिजिटल तकनीक तक पहुंच, खेती योग्य जमीन और न्याय।

भारत के इतिहास में दलितों, मुसलामानों, आदिवासियों और दिव्यांगों के अधिकारों को दबाया जाता रहा है।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 57.3 फीसदी दलितों और 52.6 फीसदी मुसलमानों के पास अपनी जमीन नहीं है। जबकि मोदी सरकार दावा करती है कि दलितों और गरीबी दर से नीचे वाले लोगों को जमीन दी जायेगी।

इसके अलावा मोदी सरकार की विकास संबंधी परियोजनाओं की वजह से करीब 40 फीसदी आदिवासियों को विस्थापित होना पड़ा है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि जमीन को बांटने का काम सामाजिक वर्गीकरण के मुताबिक होता है। जमीन के मालिक जोकि अपर कास्ट के संबंध रखते हैं उनको सरकार जमीन मुहैया करवा देती है।

वहीँ किसानों जोकि माध्यम वर्ग और मजदूर जोकि दलित या आदिवासी होते हैं, जमीन देने की वादा करके भी उन्हें वंचित रखा जाता है।

इसके अलावा जिन दलितों को जमीन अलॉट कर भी दी जाती है। वहां पर भी उन्हें रहने नहीं दिया जाता। वहां से भी उन्हें बाहर निकाल दिया जाता है।

 

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