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मुस्लिमों ने पाकिस्तान को नकारा था, अब हिन्दुओं को भी हिन्दू राष्ट्र की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए

उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों से चार महीने पहले मुसलमान सदमे में था। यदि मुसलमान गुलामों जैसी स्थिति नहीं चाहते , यदि वे भारत को हिंदू राष्ट्र नहीं बनने देना चाहते हैं, तो उन्हें कुछ समय के लिए चुनावी राजनीति से दूर रहना होगा और इसकी जगह तालीम पर ध्यान देना होगा। राज्यसभा के पूर्व सांसद मोहम्मद अदीब ने ये बात लखनऊ में एक भाषण के दौरान कही।

अदीब ने जिन लोगों के सामने ये बात कही थी उसमें ज्यादातर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के ओल्ड बॉयज़ एसोसिएशन के सदस्य थे। ऐसा नहीं है कि अदीब मुसलमानों को मतदान से दूर रखना चाहते थे।

उनका मतलब था कि मुस्लिम बुद्धिजीवी चुनाव लड़ने के विचारों पर गौर करे, उनकी यह धारणा थी कि उत्तर प्रदेश में सत्ता में कौन सी पार्टी आएगी, यह फैसला वह करेंगे। अदीब ने इस सुझाव को तफसील से समझाया। उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान के मुसलमानों ने साल 1947 में मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान को नकार दिया था। अब यह तय करने की हिंदुओं की बारी है कि क्या वे चाहते हैं- भारत एक हिंदू राष्ट्र बने या धर्मनिरपेक्ष बने। मुसलमानों को यह समझना चाहिए कि चुनावी मैदान में उनकी वजह से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हो जाता है। उन्होंने इसका जवाब वहां मौजूद लोगों से पूछा।

लेकिन किसी के पास कोई जवाब नहीं था तो अदीब ने खुद बोले कि हिंदुओं का एक वर्ग ऐसा भी है जो मुसलमानों से नफरत करता है। नरेंद्र मोदी उनके लिए आदर्श हैं लेकिन 75 प्रतिशत हिन्दू धर्मनिरपेक्ष हैं। उन्हें तय करने दें कि किस तरह का भारत चाहते हैं। मुस्लिम उम्मीदवार भी धर्मनिरपेक्ष हिंदुओं को देख नाराज़ हो जाते हैं जब वो भाजपा का समर्थन करते हैं, यही बात हर चुनाव को हिंदू-मुस्लिम में बांटती है।

उस दिन बाद में अदीब ने कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद से मुलाकात की जो लखनऊ में थे। अदीब से आजाद ने पूछा कि तुमने ऐसा भाषण क्यों दिया?” अब आज़ाद की बारी थी कि वह अदीब से रूबरू हो। उन्होंने आजाद से पूछा कि यह किस प्रकार की धर्मनिरपेक्षता है जो 20 प्रतिशत मुस्लिम वोटों पर निर्भर करती है? उनका इशारा बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की तरफ था।

इस पर आजाद ने अदीब को कांग्रेस में शामिल होने का न्योता दिया और उनके सामने राज्यसभा भेजे जाने का प्रस्ताव रखा। लेकिन अदीब ने इस प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा कि पहले धर्मनिरपेक्ष हिंदुओं को साथ जोड़ें। उत्तर प्रदेश चुनाव के परिणाम के बाद अदीब गुस्से में थे। उन्होंने कहा कि सैयद अहमद बुखारी एक सवाल लिए मेरे पास आए और कहा कि क्यों नहीं राजनीतिक पार्टियों ने मुझसे मुस्लिम से अपने समर्थन में अपील करने को कहा ?

मैंने उन्हें शांत रहने की सलाह दी और राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करने के लिए कहा। इसके बावजूद भी बुखारी ने घोषणा कर दी कि मुसलमानों को बहुजन समाज पार्टी को वोट देना चाहिए।

यूपी चुनाव के नतीजों के बाद अदीब ने नाराजगी भरे लहजे में कहा कि जाटवों, यादवों और जाटों के एक वर्ग समेत तमाम हिंदुओं ने भारतीय जनता पार्टी के लिए मतदान किया। हालाँकि जल्द ही उनकी नाराज़गी अफ़सोस में बदल गई और उन्होंने कहा कि मैं एक बुजुर्ग हूँ, मैं हिंदू राष्ट्र में मरना नहीं चाहता।

ध्रुवीकरण के मुद्दे 

उत्तर प्रदेश एक ऐसी जगह है जहां गौमाता, लव जिहाद, और घर वापसी जैसे मुद्दे गौण नहीं हुए हैं। ये सभी मुद्दे मुजफ्फरनगर के साल 2013 के दंगों की पृष्ठभूमि में आते हैं, जिसने विभाजन के बाद से 1990 के राम जन्मभूमि आंदोलन और इससे पहले विरासत में मिले हिंदू-मुस्लिम विभाजन को चौड़ा कर दिया।

साल 2012 में 69 मुस्लिम विधायक उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुनकर आये थे जो इस चुनाव में घटकर मात्र 25 रह गए हैं। मुसलमानों के प्रतिनिधित्व में गिरावट हिंदुत्व का हावी होना दर्शाता है।

शायर मुनव्वर राणा ने कहा है कि मुसलमानों को पारसी की तरह बनना चाहिए जो अपने काम को बेहतर ढंग से अंजाम देते हैं। मतदान के दिन मतदान करने के लिए जाते हैं और काम पर वापस जाते हैं। साथ ही कहा कि आज अपने लोगों को तालीम देने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की जरुरत है।

उत्तर प्रदेश में भाजपा की भारी जीत की वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकासवादी वादों का नतीजा नहीं है। कई सीटों पर वोटों के बिखराव से सीधा भाजपा को फायदा पहुंचा है जिससे उसको उत्तर प्रदेश में बहुत बड़ी जीत हासिल हुई है।

मुस्लिम रिहाई मंच के प्रमुख वकील मोहम्मद शोएब ने इसे विडंबना बताया कि 70 साल तक हम सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ रहे हैं लेकिन यह और 70 गुना बढ़ गई है।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर मोहम्मद सज्जाद ने कहा कि पिछली विधानसभा में 69 विधायक और इस बार? सज्जाद की तरह लगभग सभी ने मौलवियों के खिलाफ अपना गुस्सा निकाला। क्या उन्हें मुसलमानों को ये बताना चाहिए थे कि उन्हें किस पार्टी का वोट देना चाहिए? क्या उन्हें नहीं पता था कि उनकी लापरवाही से हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण हो जाएगा?

उर्दू अखबार अवधनामा के संपादक ओबैद्दुल्ला नाशीर कहते हैं कि उन्होंने ऐसे लोगों पर मुसलमानों के बीच भ्रम पैदा करने के लिए भाजपा से पैसे लेने के आरोप लगाए तो उनके साथ बदसलूकी की गई।

मुस्लिम बहुल इलाके संभल के कवि अमीर इमाम ने कहा कि अब मुसलमानों को मौलानाओं को बताना होगा कि उनकी सेवा मस्जिदों में जरूरी है, न कि राजनीति में।

 

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