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बादशाह खां की 127 वी यौमे पैदाइश

 

(6 फरवरी 1890 – 20 जनवरी 1988)


जब भी जेल में रहकर संघर्ष करने की बात आती है, तो हम याद करते हैं या नेल्सन मंडेला को या फिर आंग सान सू की को। सू की को 15 वर्ष तक और नेल्सन मंडेला को 27 वर्ष तक। लेकिन यह सब खान अब्दुल गफ्फार खान के संघर्ष के सामने कुछ नहीं, जिन्होंने अपने ज़िन्दगी के पूरे 42 साल गुलामी के दौर में और फिर आज़ादी के बाद जेलों में गुजार दिए।

 

1942 में भारत छोड़ो आंदोलनमें जब गांधी के नेतृत्व के बावजूद हिंदोस्तानी अहिंसक नहीं रह सके, तब पठानों ने अपनी अहिंसा कायम रखी। इस पर गांधी की टिप्पणी थी कि अहिंसा बहादुरों का हथियार है, बुजदिलों का नहीं और पठान एक बहादुर कौम है, वह अहिंसा का पालन करने में समर्थ हो सकी।

 

अहिंसा की शिक्षा और अन्याय का विरोध करने का सबक बादशाह खां ने कुरान से हासिल किया।

 

जब डॉ. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष बने, तो उनके स्वागत में आठ भाषण दिए गए। इनमें सें सात ने अंग्रेजी में बोलना उचित समझा। अकेले बादशाह खां ही थे, जो हिन्दुस्तानी में बोले।

 

आज़ादी के बाद पहली बार 1969 में गाँधी जी की जन्म-शताब्दी में शिरकत के लिए मुख्य अतिथि के बतौर गाँधी स्मारक निधि के निमंत्रण पर बादशाह खां हिन्दोस्तान आये. देश की ओर से प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और गाँधी स्मारक निधि की ओर से जयप्रकाश नारायण ने एअरपोर्ट पर उनका स्वागत किया.

 

इस मौके पर संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने सांसदों से कहा कि वह यहाँ आये हैं, उन्हें गाँधी जी के बताये गए उसूलों को याद दिलाने के लिए.

 

उनकी इस यात्रा के दौरान गुजरात के अहमदाबाद में दंगे हुए, इससे बादशाह खां बैचैन हो गए और शांति स्थापित करने खुद दंगा ग्रस्त इलाकों में गए, और इस मौके पर उन्होंने कहा कि मज़हब के नाम पर क़त्ल करना, घरों को आग लगाना, खुदा का मज़हब नहीं है. खुदा का मज़हब मुहब्बत है जो हमेशा इंसानियत के लिये आता है.

 

इस दौरान दिल्ली के रामलीला मैदान में बादशाह खां का नागरिक सम्मान किया गया, जिसमे, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री समेत सभी विशिष्ठ शरीक हुए और भारी संख्या में आम हिन्दोस्तानी बादशाह खां को देखने और सुनने के लिए आये. जहाँ भी वह गए उनसे मिलने के लिए भारी संख्या में आम-जनमानस उमड़ पड़ा.

 

20 जनवरी 1988 को बादशाह खां इस दुनिया से चले गए.

 

बादशाह खां को दफन करने के लिए हिन्दोस्तान की सरकार ने राजघाट पर गाँधी समाधी के बराबर में जगह देने का प्रस्ताव पेश किया था, पर बादशाह खां को उनकी मौत के बाद उनके पैतृक स्थान जलालाबाद ले जाया गया.

 

जलालाबाद आज के अफ़ग़ानिस्तान का हिस्सा है, और बादशाह खां की मौत के समय यू.एस.एस.आर. और अफ़ग़ानिस्तान के बीच भीषण युद्ध चल रहा था. जिस आदमी ने कभी कोई पद नहीं लिया, न कभी किसी सरकार में या सत्ता प्रतिष्ठान से अपने आपको जोड़ा, उस महान अहिंसक व्यक्ति की मौत ने कुछ वक़्त के लिए सरहदों पर हो रही हिंसा को खामोश कर दिया. उनको दफन करने के लिए सीज़फायर का ऐलान उस वक़्त की एक महाशक्ति को करना पड़ा.

 

आज भी बादशाह खां हमारे लिए एक प्रेरणा स्त्रोत हैं.

 

  उवेस सुल्तान खान

(लेखक एक सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं)

                                                                                                                                                                            

 

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