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6 जुलाई को मंदसौर से निकलेगी देशव्यापी किसान यात्रा, सरकार की बढ़ सकती है मुश्किलें

किसान आंदोलन अभी थमा नहीं है। इसकी चिनगारी अभी सुलग रही है। अब किसान संगठनें किसानों की एकता को दर्शाने के लिए मध्यप्रदेश के मंदसौर से 6 जुलाई को देशव्यापी किसान जनजागृति यात्रा निकालेंगे। इससे सरकार की मुश्किलें काफी बढ़ सकती है।

ञात हो कि 6 जून को दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में दिल्ली के गांधी पीस फाउंडेशन में आयोजित बैठक में देश के 130 किसान संगठनों के मुखिया ने हिस्सा लिया था। सर्वसम्मति से दो मुद्दों पर आंदोलन चलाने का निर्णय लिया गया। पूरे देश के किसानों का कर्ज माफ हो और स्वामीनाथन की रिपोर्ट लागू किया जाए। किसानों की लागत मूल्य 50 फीसदी से अधिक मूल्य दिया जाना प्रस्तावित है। इस दौरान एक समन्वय समिति का गठन किया गया। इसका नाम अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति रखा गया है। ज्ञात हो कि पीएम नरेंद्र मोदी ने भी चुनाव से पूर्व किसानों को फसल का मूल्य लागत मूल्य से अधिक दिलाने का वादा किया था।
जनजागृति यात्रा

नव गठित समिति ने छह जुलाई को मंदसौर से देश भर में कर्ज़ माफी और स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करने को लेकर पद यात्रा करने फैसला लिया है। किसान संगठन बड़े पैमाने पर इसकी तैयारी कर रहे हैं। है। देशभर के किसानों के 130 संगठन के लोग गोलीकांड के ठीक एक माह बाद मंदसौर में जमा होंगे। यहां से दिल्ली के जंतर-मंतर तक और बिहार के चंपारण तक जनजागृति यात्रा निकाली जाएगी। संभावना है कि किसान आंदोलन पहले से भी उग्र हो सकता है। इससे केंद्र और राज्य सरकारों की मुश्किलें बढ़ सकती है। बता दें कि किसानों ने अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को अपना विरोध जताने और सरकार का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए शवासन किया था।

पिछले दिनों यह आंदोलन काफी उग्र हो गया था। देश भर के किसान आपनी मांगों को लेकर जगह-जगह प्रदर्शन कर रहे थें। देश के विभिन्न हिस्सों में कई किसानों ने कर्ज के बोझ के चलते आत्महत्याएं की। उधर मध्यप्रदेश में प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में कई किसान मारे गए। इसको लेकर प्रदर्शन काफी उग्र हो गया। प्रदर्शन करते हुए किसानों ने जगह-जगह दूध, सब्जी-तरकारी, फल जैसे कई कृषि उत्पाद सड़क पर फेंक दिए थें और सड़कों पर जाम लगा दिया था। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने किसान आंदोलन उग्र होने का ठीकरा विपक्ष पर फोड़ा था वहीं विपक्षी पार्टियों ने सरकार को किसान विरोधी बता कर हमला किया था।
विपक्ष का हमला

राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद ने भारतीय जनता पार्टी पर आरोप लगाते हुए कहा था कि सरकार देश के अंदर किसानों पर गोलियां चलवा रही है और सीमा पर जवान शहीद हो रहे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा था “भाजपा सीमा पर जवानों को तो देश के अंदर किसानों पर गोलियां चलवाकर ‘मर जवान-मर किसान’ कर रही है। क्या यही हैं अच्छे दिन?” कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा था कि BJP के न्यू इंडिया में हक़ मांगने पर हमारे अन्नदाताओं को गोली मिलती है? राहुल गांधी मंदसौर में गोलीबारी में मारे जाने वाले किसानों के परिजनों से मिलने जा रहे थे कि रास्ते में पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया था। वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्वजिय सिंह ने भी शिवराज सिंह चौहान पर निशाना साधते हुए कहा था कि ये तथाकथित किसान पुत्र न संघ का सगा है न किसान का सगा है न बीजेपी का सगा है।

आंदोलन के दौरान महाराष्ट्र में सोलापुर जिले के एक गांव में एक किसान ने कथित रूप से आत्महत्या कर ली थी। उसने अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि जब तक मुख्यमंत्री उसके घर नहीं आते और उसकी मांगें पूरी नहीं करते, तब तक उसका अंतिम संस्कार नहीं किया जाना चाहिए।
आंदोलन के दौरान कृषि मंत्री का योग

ये भी खबर आई थी कि जहां महाराष्‍ट्र और मध्‍य प्रदेश में किसान आंदोलनों में पुलिस की फायरिंग से कई लोगों की मौत हो गई और किसानों की खुदकुशी का सिलसिला जारी रहा वहीं इन सबके बीच केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधामोहन सिंह योगगुरु बाबा रामदेव के तीन दिवसीय योग शिविर का बिहार के पूर्वी चंपारण जिला मुख्यालय मोतिहारी में उद्घाटन किया और योग करते दिखे।

लामबंद हुए किसान संगठन अब एक साझा आंदोलन की तैयारी में जुटे हैं। योगेंद्र यादव, तमिलनाडु के अय्यकन्नू, हनन मुल्ला राजस्थान के रामपाल, महाराष्ट्र के राजू शेट्टी जैसे दिग्गज नेताओं ने मांग की है कि सरकार जल्द से जल्द स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करे और किसानों का पूरा कर्ज़ माफ करने के साथ उनके फसल की उचित कीमत दिया जाए।

उधर अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने ऐलान करते हुए कहा है कि छह जुलाई से मंदसौर से देशव्यापी किसान यात्रा निकाली जाएगी और इस यात्रा का समापन दो अक्टूबर को चंपारण में होगा। इस यात्रा का मकसद गांव-गांव जाकर सभी किसानों को जोड़ने का प्रयास करना है।
सभी राज्यों में फैला आंदोलन

महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के पुणतांबे गांव से शुरू हुई हड़ताल मध्य प्रदेश पहुंची, और वहां मंदसौर के गोलीकांड के बाद से यह आग चारों दिशाओं में फैल गयी है। राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु समेत अन्य राज्यों में ये आंदोलन फैल गया। कहीं धरना, कहीं प्रदर्शन, कहीं बंद, कहीं चक्काजाम किए जा रहे थे। मानो बरसों से सोया किसान आंदोलन एकाएक जाग उठा। थके-हारे किसान नेताओं में नया जोश भर गया। उधर बिहार के जहानाबाद के समाहरणालय के समक्ष 20 जून को धरना देने वाले किसानों में 13 किसानों ने शाम पांच बजे से अनिश्चितकालीन अनशन शुरू किया है। जिला प्रशासन के किसी भी पदाधिकारी द्वारा मांगों से संबंधित ज्ञापन नहीं लेने और धरना दे रहे किसानों से नहीं मिलने से क्षुब्ध कृषकों ने बेमियादी अनशन प्रारंभ किया है। वहीं बिहारशरीफ में जुटे किसानों ने कहा है कि अगर उनके हितों में कोई निर्णय नहीं लिया गया तो 26 जून को सड़क एवं रेल मार्ग जाम किया जाएगा।

बीते दिनों किसान संघर्ष ने वह हासिल कर लिया जो किसान आंदोलन पिछले बीस साल से हासिल नहीं कर पाया था। सरकारों और बाबुओं के पास किसान मुद्दों पर चर्चा का वक्त भी किसी तरह निकल आया। मीडिया भी अचानक किसान की सुध लेने लगी। टीवी शो में किसानों की हालत पर चर्चा होने लगी।

खबर है कि किसान 3 जुलाई को नीति आयोग का घेराव और जंतर मंतर पर अनिश्चितकालिन धरना करने वाले हैं। 6 जुलाई को किसान जनजागृति यात्रा के बाद 9 अगस्त को बड़े पैमाने पर जेल भरो आंदोलन करेंगे।

भारतीय किसान संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष ठाकुर पूरण सिंह ने कहा था कि केंद्र और प्रदेश सरकार को किसानों की कोई परवाह नहीं है। किसानों का कर्ज माफी समेत विभिन्न मांगों को लेकर भाकिसं छह जुलाई को मेरठ कमिश्नरी का घेराव करेगा। पूरण सिंह ने केंद्र और प्रदेश सरकार को किसान विरोधी बताया था।

आंदोलन में महिला

अखिल भारतीय स्वामीनाथन संघर्ष समिति ने भी धरना दिया था। धरने की अध्यक्षता महिला किसान विद्या देवी ने की थी। मोर्चा महिलाओं के हाथों में रहा। महिलाएं सुबह ट्रैक्टर-ट्रालियों में सवार होकर धरनास्थल पर पहुंची थीं। इस मौके पर प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए विद्या देवी ने कहा था कि महिलाएं भी किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आंदोलन में भाग लेंगी। यदि सरकार ने जल्द ही उनकी मांगें नहीं मानी तो वे अपने बच्चों और पशुओं के साथ लघु सचिवालय में पड़ाव डालेंगी।

अब सवाल है कि क्या यह विद्रोह सिर्फ उग्र विरोध बन कर रह जायेगा या फिर खेती-किसानी के लिए क्रांतिकारी परिवर्तन लायेगा? इस विद्रोह की चिंगारी से सिर्फ बस और ट्रक जलेंगे या कि इस आग में तप कर कुछ नया सृजन होगा? क्या इस आंदोलन की आर में कुछ नेता अपनी रोटी सेंकने में लगे रहेंगे? अब यह आने वाला समय ही बताएगा।

 

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