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हिन्दुस्तानी मुसलमान कौन हैं, जानिए इंटरनेट पर सनसनी फैलाने वाले शायर हुसैन हैदरी से

यूट्यूब चैनल कम्यून पर अपलोड हुए एक वीडियो के बाद एक नौजवान शायर हुसैन हैदरी अचानक सुर्ख़ियों में हैं। सभी के मन में यही सवाल घुमड़ रहा है कि आख़िर हुसैन हैदरी कौन हैं? हैदरी के बारे में इंटरनेट पर कोई जानकारी नहीं है, सिवाय उनकी तीन नज़्मों के। 10 फरवरी को यूट्यूब पर जब उनकी नई नज़्म ‘हिन्दुस्तानी मुसलमां’ अपलोड हुई तो उसे सुनने वालों की बाढ़ आ गई। मीडिया इंडस्ट्री के दो बड़े नाम रवीश कुमार और विनोद दुआ ने भी अपने-अपने शो के दर्शकों को उनसे रूबरू करवाया है।

‘हिन्दुस्तानी मुसलमां’ इस लिहाज़ से एक कामयाब नज़्म है कि इसमें भारतीय मुसलमानों की सटीक तस्वीर उभरती है। मुसलमानों के प्रति एक आम धारणा से लेकर उनकी परेशानियां, शिक़ायतें वग़ैरह सबकुछ है इस नज़्म में। ये नज़्म बताती है कि हिन्दुस्तान में एक नहीं तरह-तरह के मुसलमान बसते हैं। सभी अलग तरह से जीते हैं और सभी की अलग कहानी है। और आख़िर में हैदरी नज़्म ये कहते हुए ख़त्म करते हैं कि ‘मैं जितना मुसलमां हूं भाई, मैं उतना हिन्दुस्तानी हूं।’ कमाल ये कि इसे लिखने वाले हुसैन हैदरी ना तो पेशेवेर शायर हैं और ना ही अदब की कहीं से तालीम हासिल की है।

बस अदबी दुनिया का शौकिया जुनून उन्हें मुंबई खींच लाया। दो साल पहले तक हुसैन कोलकाता की एक कंपनी में बतौर फाइनेंस हेड काम कर रहे थे। तय वक़्त पर तनख़्वाह अकाउंट में आ जाया करती थी। शायरी और कविता की किताबें पढ़ा करते थे और इसी दौरान साहिर लुधियानवी के एक गीत ने उनकी ज़िंदगी का ट्रैक बदल दिया। वो अमर गीत था, ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है।’ बक़ौल हुसैन, ‘बहुत बड़ी बात लिख गए हैं साहिर और ये सच है कि अगर सबकुछ मिल भी जाए तो भी क्या हो जाएगा?’

हुसैन ने आईआईएम इंदौर से फाइनेंस की पढ़ाई की और कोलकाता में अच्छी नौकरी मिली। हुसैन कहते हैं कि मैं ऐसी लाइफस्टाइल नहीं जी रहा था जिसमें मुझे ज़्यादा रुपयों की ज़रूरत पड़े। इसलिए कॉरपोरेट में करियर की बजाय शौक को चुना। हुसैन कहते हैं कि मैं नाकाम होने पर शर्मिंदगी के साथ जी लूंगा मगर ये मलाल नहीं चाहता कि मैंने कभी अपना शौक़ पूरा करने की कोशिश नहीं की। ज़्यादा से ज़्यादा यही होगा कि मैं फेल हो जाऊंगा।

दोबारा लिखनी पड़ी ये नज़्म

दो तीन साल पहले हुसैन कोलकाता से भूटान घूमने गए, तभी उन्होंने ‘हिन्दुस्तानी मुसलमां’ लिखी मगर वापस लौटते वक़्त उनकी डायरी भूटान में ही कहीं गुम हो गई। फिर वो नौकरी छोड़कर पूरी तरह लिखने के लिए मुंबई आ गए। जब उन्होंने लिखना शुरू किया तो भूटान में गुम हुई नज़्म की लाइनें उन्हें बार-बार याद आतीं। फिर उन्होंने नए सिरे से हिन्दुस्तानी मुसलमां लिखी जिसे लोग बस सुनते ही जा रहे हैं।

दिलचस्पी के नाते हुसैन को पढ़ाई के दौरान जहां-जहां मुशायरों की ख़बर मिलती, वो पहुंच जाते। इंटरनेट पर नामचीन शायरों के वीडियो देखते और सुनते। इनके अब्बा इक़बाल हुसैन इंदौर में एक बुकशॉप रीडर्स पैराडाइज़ चलाते हैं मगर शायरी और कविता की ज़्यादातर किताबें उन्होंने भोपाल, दिल्ली और कोलकाता से ख़रीदी हैं।

हिन्दुस्तानी शायरों में निदा फाज़ली, बशीर बद्र, मुनव्वर राणा, मंज़र भोपाली, ताहिर फराज़, राजेश रेड्डी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को इन्होंने ख़ूब पढ़ा है जबकि सरहद उसपार वालों में अहमद फराज़, जॉन एलिया, अब्बास ताबिश, वसी शाह पसंदीदा हैं। दिल के क़रीब साहिर हैं और अंदाज़े बयां जावेद अख़्तर का सबसे ज़्यादा पसंद है।

एक-दूसरे से मिलना ज़रूरी

मुंबई पहुंचने के बाद हुसैन ने सोशल मीडिया के ज़रिए शेरो-शायरी के शौक़ीन लोगों से जुड़ना शुरू किया। यहीं उन्हें कम्यून के बारे में पता चला जो नई नस्ल के फनकारों को जगह देने का एक मंच है। कम्यून में पढ़ी गई ये उनकी तीसरी नज़्म है जिसे संभालते हैं रेडियो जॉकी और एक्टर रोशन अब्बास। इनके साथी हैं अंकुर तिवारी और गौरव गुप्ता।

मुंबई में हुसैन पहले मुहम्मद अली रोड पर रहते थे और अब वर्सोवा में हैं। पुश्तैनी घर इंदौर में ही है। मां फ़रीदा हैदरी गोश्त बेहद उम्दा बनाती हैं लेकिन हुसैन को उनके हाथ की सेव की सब्ज़ी और दाल गाखड़ सबसे ज़्यादा पसंद है।

हुसैन चाहते हैं कि हमारा मुल्क़ उस दुनिया से बाहर निकले जहां कहा जाता है कि फलां समाज अच्छा है और दूसरा बुरा। हरेक की अलग ज़िंदगी और कहानियां हैं। यही तो कमाल है हिन्दुस्तान का कि यहां तरह-तरह के लोग हैं, चाहे हिंदू हो या मुसलमान और जब तक इनसे मिलेंगे-जुलेंगे नहीं, तब तक एक-दूसरे को समझेंगे कैसे?

लेख: शाहनवाज़ मलिक

साभार: कैच हिंदी 

 

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