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मोदी सरकार के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ पर उठ रहे सवाल, शहरों की रैंकिंग में है झोल

मोदी सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘स्वच्छ भारत अभियान’ पर हाल ही में हुए सर्वे पर सवाल उठने लगे हैं। देश के 434 शहरों में स्वच्छता सर्वेक्षण में विभिन्न शहरों को दी गई रैंकिंग में कुछ खामियां हैं।

इस सर्वे में शहरों को पांच पैरामीटर्स के तहत रैंकिंग दी गई है। जोकि हैं साफ-सफाई, ठोस कचरे का निपटान, शौचालयों का निर्माण, खुले में शौच को रोकना और लोगों का बर्ताव बदलने के लिए जागरूकता अभियान चलाना।

सर्वे में निकाय संस्थाओं ने फोन कॉल्स, सोशल मीडिया और डिजिटल एप्प के जरिए लोगों से जानकारी इक्क्ठी की। इसके अलावा सर्वेयने र्स भी अपनी तरफ से इस जानकारी को पुख्ता करने के लिए निजी सर्वे भी किये हैं।

इस सर्वे का 45 प्रतिशत हिस्सा निकाय संस्थाओं ले दावों पर, 25 प्रतिशत हिस्सा सर्वेयर्स के सर्वे और 30 प्रतिशत नागरिकों के फीडबैक पर आधारित था।

इसलिए माना जा सकता हैं ये सर्वे निकाय संस्थाओं के हिसाब से ही हुआ है। शहरों की रैंकिंग उनके द्वारा दी गई है। लेकिन इस रैंकिंग की जांच करने के लिए कोई भरोसेमंद सिस्टम भी नहीं है।

लोगों ने सवाल उठाये हैं कि इंदौर भारत का सबसे साफ शहर कैसे हो सकता है? क्या वाकई वाराणसी भुवनेश्वर से ज्यादा साफ है?

लेह शहर गंगटोक से ज्यादा गंदा कैसे हो सकता है? जो पिछली बार इस सर्वे में पहले नंबर पर था वह इस बार कैसे 11वें पायदान पर पहुंच गया?

 

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