Wednesday , July 26 2017
Home / Kashmir / वहाबियत की राह पर अग्रसर होता कश्मीर

वहाबियत की राह पर अग्रसर होता कश्मीर

पिछले कुछ महीनों से कथित तौर पर कश्मीर में जो भी कुछ हो रहा है, यह कट्टर इस्लामीकरण का प्रत्यक्ष परिणाम है। जानकार कहते हैं कि अब कश्मीर ‘वहाबीकरण’ के अधीन है और कश्मीर में मुसलमानों के एक वर्ग को इसी नाम से जाना जाता है, जिनकी अहले हदीस के रूप में भी पहचान है।

 

 

 

वहाबियत अठारहवीं सदी के मुहम्मद इब्न अब्द अल वहाब द्वारा नजद, सऊदी अरब से शुरू किया गया एक आंदोलन था। इसके अनुयायी मुख्य रूप से अरब दुनिया में हैं जो कतर में सबसे ज्यादा 48 प्रतिशत हैं। लेकिन हाल के दिनों में कश्मीर में भी इसका फैलाव हुआ है और कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि कश्मीर इस विचारधारा की राजधानी बन रही है।

 

 

 

 

विशेष रूप से टीवी चैनलों पर जानकार इस्लाम के साथ जुडी राजनीतिक समस्या को चित्रित करने के लिए इसका उपयोग कर रहे हैं। जब जामिया मस्जिद में शुक्रवार की नमाज के बाद कुछ लड़कों द्वारा आईएसआईएस का झंडा का लहराया जाता है तो उस दिन की सुर्खी बन जाती है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि पिछले कुछ साल में अहले हदीस की लोकप्रियता बढ़ी है और यह दुनिया भर में होने वाले बदलाओं का नतीजा है।

 

 

 

 

लेकिन क्या इसने इस क्षेत्र में 27 से अधिक वर्षों से चल रहे राजनीतिक संघर्ष में प्रमुख भूमिका निभाई ? शायद नहीं। कश्मीर का सशस्त्र संघर्ष 1980 के दशक के अंत में जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट द्वारा शुरू किया गया था और यह जम्मू-कश्मीर राज्य को एकजुट करने के उद्देश्य से धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के लिए जाना जाता है, क्योंकि यह 1947 में अस्तित्व में था।

 

 

 

 

और फिर 1970 में हिजबुल मुजाहिदीन और अन्य संगठन उभर कर सामने आय, जो कश्मीर में इस्लाम और पाकिस्तान के संघर्ष से जुड़े थे।
इन संगठनों की संख्या में लोगों की संख्या बढ़ती गई, जो सशस्त्र विद्रोह में शामिल हो गए। तहरीक-उल-मुजाहिदीन एक संगठन था जो जाहिर तौर पर अहले हदीस की ही शाखा थी, लेकिन दोनों ने इस वास्तविकता को सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया था।

 

 

 

 

दिलचस्प बात यह है कि एक भी युवा जिसने मदरसा या दारूल उलूम में अध्ययन किया वह पिछले 10 वर्षों में आतंकवादी गुटों में शामिल नहीं हुए हैं। यह एक अच्छी बात थी कि राजनीतिक अस्तित्व सुनिश्चित करने और संवर्ग की रक्षा करने के लिए कुछ छोटे संगठनों को लॉन्च किया गया था।

 

 

 

 

अहले हदीस आंदोलन कश्मीर के लिए नया नहीं है। माना जाता है कि यहां मस्जिदों की संख्या 1990 में 500 से बढ़कर 2017 में 900 हो गई है और यह मुख्य रूप से सऊदी अरब से फंड के साथ पूरा किया गया है जिस पर गृह मंत्रालय द्वारा निगरानी रखी जा रहा है क्योंकि अहले हदीस से जुड़ी संस्थाओं में कुछ ऐसे हैं जिन्हें विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम प्रमाणपत्र प्रदान किए गए हैं।

 

 

 

 

कश्मीर घाटी में यह आंदोलन 120 साल पुराना है। अहले हदीस की मस्जिद को पहली बार साल 1890 में श्रीनगर में स्थापित की थी। वह तत्कालीन अविभाजित पंजाब में सलाफी आंदोलन से प्रभावित था। कश्मीर में अहले हदीस को बढ़ावा देने वालों में मौलाना सनाउल्लाह अमृतसरी, अबुल कासिम बनारसी, अब्दुल अजीज रहमानबादी जैसे विद्वानों से लोग प्रभावित हुए हैं।

 

 

वास्तव में मुख्य इस्लामिक आंदोलनों जैसे कि जमात-ए-इस्लामी, अहले हदीस और बरेलवी भारत में अपने साथियों द्वारा प्रभावित हुए हैं। कश्मीर में अहले हदीस ने अलगाववादी आंदोलन में ज्यादा भूमिका नहीं निभाई है, हालांकि यह 2003 में विभाजित होने तक संयुक्त हुर्रियत सम्मेलन का हिस्सा था। उसके बाद यह किसी भी अन्य गुटों में शामिल नहीं हुआ।

 

(शुजात बुखारी)

TOPPOPULARRECENT