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NEET परीक्षा में उर्दू को शामिल नहीं किए जाने से हजारों छात्रों का भविष्य अधर में लटका

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने एक बार फिर आगामी राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (एनईईटी) में उर्दू की अनदेखी की है, जिससे हजारों मेडिकल छात्रों का भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले दर किनार करते हुए कि उर्दू को एनईईटी पाठ्यक्रम से हटा दिया है। हालांकि कोर्ट ने 2013 में, इसको परीक्षा में शामिल किए जाने का फैसला दिया था।

मंत्रालय ने अभी तक इस संबंध में कोई अधिसूचना जारी नहीं की है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जे.पी. नड्डा ने घोषणा की है कि एनईईटी की परीक्षा हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती, मराठी, बंगाली, असमिया, तेलुगु और तमिल सहित आठ भाषाओं में आयोजित किया जाएगा।उन्होंने कहा कि यह निर्णय परीक्षा पैटर्न और दूसरे संबंधित पहलुओं पर राज्य सरकारों के साथ व्यापक विचार-विमर्श के बाद लिया गया है। मंत्रालय के इस निर्णय से देश भर में मेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए इच्छुक 16 हजार से अधिक उर्दू छात्रों को धक्का लगेगा।

उर्दू छात्रों के मामले की प्रतिनिधित्व करने वाले प्रोफेसर शेख नजामुद्दीन बताते हैंकि मंत्रालय का यह निर्णय बेहद दुखद है कि वो 8 भाषाओं में अगामी 2017-18 की एनईईटी-यूजी की परीक्षा ले रहा है और उर्दू को इससे से बाहर रखा जा रहा है।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर, और बिहार के कई उच्च माध्यमिक विद्यालयों और जूनियर कॉलेजों में उर्दू माध्यम से पढ़ाई होती है। प्रोफेसर नजामुद्दीन ने कहा कि मैं महाराष्ट्र का रहने वाला हूं और महाराष्ट्र में उर्दू माध्यम अकेले विज्ञान में 11 हजार छात्र अध्ययन करते हैं। इसलिए उर्दू का एनईईटी-यूजी की परीक्षा बाहर किया जाना बेहद निंदनीय है। उन्होंने कहा कि मेडिकल और डेंटल की परीक्षाएं महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे  राज्यों में उर्दू भाषा में भी आयोजित की जाती हैं उन्होंने कहा कि इस बात को याद रखना चाहिए कि 2013 में, हकदार अंसारी और माहीन फातिमा एवं अन्य छात्रों का संघ के खिलाफ दायर की गई याचिका पर निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने दी थी, जिसमें कोर्ट ने केंद्रिय संस्थाओं को उर्दू में परीक्षा लेने का निर्देश दिया था।

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