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दलितों के घर भोजन करने वाले मौत की नींद सो चुके मासूमों के घर दुख बाँटने कब जाएँगे?

गोरखपुर जो मंत्री लोग अभी जा रहे हैं सिलेंडर ख़रीदने जा रहे हैं या परिवार वालों के यहाँ सांत्वना देने? कहाँ कहाँ गए हैं ? या हर कोई कलक्टर के साथ बैठकर मीटिंग कर रहा है? खाना खाने तो सब जा रहे हैं परिवारों में, सांत्वना देने साठ घरों में तो जाना ही चाहिए। ये पंक्ति देश के जानेमाने पत्रकार रविश कुमार की है।

गोरखपुर में हुए घटना के बाद जिस तरह भाजपा सरकार अपना पक्ष साफ़ करने में जुटी है। वही कुछ दिन पहले धर्म और साम्प्रदायिकता की राजनीति करने वाले इस गिरोह ने इधर बड़े जोर-शोर से ‘राष्ट्रवाद’ और ‘देशभक्ति’ का राग अलापना शुरू कर दिया था।

इस पूरे शोरशराबे में भगवा फासीवादी एक ओर जनता के बुनियादी हकों की आवाज को खून में डुबो देना चाहते हैं तो दूसरी ओर देश का फासीवादीकरण करके जनता पर अपनी तानाशाही थोप देना चाहते हैं।

बीजेपी अति खुद को पिछड़ों और दलितों का हितैषी बताने के लिए अब उनके घर जाकर उनकी रसोई में बने खाने का स्वाद चख रही है। खुद पीएम नरेंद्र मोदी भी बनारस के सिर गोवर्धन में सन्त रविदास मंदिर में रैदासियों के संग लंगर चख कर दलितों को अपना बनाने का प्रयास कर चुके हैं। लेकिन गोरखपुर में ६३ बच्चों के मौत के बाद भाजपा के दिग्गज नेताओं के पास इतना वक़्त नहीं की वो उन परिवारों से मिलें जिनके घर का चिराग बुझ गया है।

भाजपा के शासन काल में जिस ‘विकास’ की बात की जा रही है वह गरीबों की हड्डियों और लाशों पर खड़ा पूँजीपतियों का विकास है। इसकी कीमत देश का हर एक वह व्यक्ति चुका रहा है।

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