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‘अजमेर ब्लास्ट में भवेश और देवेंद्र को सज़ा मिलने पर साबित होता है कि RSS के कुछ लोग आतंकवाद में शामिल हैं’

अजमेर दरगाह में बम फोड़ने वाले आतंकवादियों में दो को उम्र क़ैद की सज़ा हो गई, तीसरे (सुनील जोशी) की रहस्यमय परिस्थिति में मृत्यु हो चुकी है। इतनी बड़ी वारदात तीन लोगों का काम नहीं हो सकती, पर सात आरोपियों को – जिनमें स्वामी असीमानंद भी शामिल थे – सबूतों के अभाव में ‘संदेह का लाभ’ देकर बरी कर दिया गया है। संघ के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार को भी क्लीन चिट मिल गई है। तीन आरोपी भगोड़े घोषित किए जा चुके हैं।

जिन दो आतंकियों – भवेश पटेल और देवेंद्र गुप्ता – को उम्र क़ैद हुई है, कहते हैं वे आरएसएस के प्रचारक रहे हैं। कई टीवी बहसों में संघ/भाजपा के प्रवक्ता मुझे कहा करते थे कि संघ के किसी आदमी की आतंकवाद में शिरकत साबित नहीं हुई है, इसलिए ‘भगवा आतंकवाद’ शब्दों का प्रयोग क्यों किया जाए। अब? अब शायद कहेंगे तीन ही तो साबित हुए हैं!

बहरहाल, यह साबित हुआ कि आतंकवाद देश में इकहरा नहीं है। वैसे हिंसक बयानों में भी भगवा आतंकवाद की छाया ख़ूब नुमायाँ है। पर जिन आतंकियों को उम्र क़ैद की सज़ा दे दी गई, उन्हें वे लोग अब फाँसी देने की माँग अब क्यों नहीं कर रहे हैं जो पहले आतंकवादी के लिए एक ही सज़ा – मृत्यदंड – की माँग करते थे? कल टीवी चैनलों पर भी देखा कि सज़ा के एलान के बावजूद कुछ उन्हें “दोषियों को उम्र क़ैद” भर बता रहे हैं, उनके लिए आतंकवादी शब्द का प्रयोग करने से कतरा रहे हैं। क्या इसलिए कि ये आतंकवादी हिंदू निकले?

(नोट- यह लेख ओम थानवी की फेसबुक वॉल से लिया गया है, सियासत हिंदी से इसे अपनी सोशल वाणी में जगह दी है)

 

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