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दलितों के विकास के लिए बनाई गई स्कीमों में मोदी सरकार ने की भारी कटौती

दलितों प्रेम का ढिंढोरा पीटने वाली मोदी सरकार ने अपने तीन साल के कार्यकाल में उनके लिए फंड आवंटन में भारी कमी आई है।

मसलन मैला उठाने वाले लोगों के स्वरोजगार और उन्हें इससे छुटकारा दिलाने वाली स्कीम के तहत 2013-14 में 557 करोड़ रुपये का बजट था। लेकिन 2017 में इसमें सौ गुना की कटौती हो गई और यह बजट सिर्फ पांच करोड़ तक सिमट कर रह गया।

इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट के यूपीए की सरकार में दलित कल्याण की स्कीमों की बजट का 2.49 फीसदी खर्च किया जा रहा था। लेकिन 2016-17 में यह घट कर 1.96 फीसदी रह गया।

वर्ष2017-18 में यह 1.72 फीसदी पर पहुंच गया। मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान यह आवंटन 2.44 फीसदी है लेकिन यह तय है कि खर्च इससे काफी कम होगा।

दलित अधिकारों के लिए बरसों से काम करने वाले भारत सरकार के पूर्व सचिव पीएस कृष्णन ने बजट में दलितों के लिए आवंटन में लगातार कमी की ओर ध्यान दिलाते हुए पीएम और वित्त मंत्री को चिट्ठी लिखी है।

उनके मुताबिक स्पेशल कंपोनेंट प्लान के मुताबिक बजट में दलितों के लिए स्कीमों की हिस्सेदारी 16.6 फीसदी होनी चाहिए क्योंकि उनकी आबादी इतनी है। लेकिन इस साल के बजट में इन स्कीमों के लिए 10,4490.45 करोड़ रुपये खर्च किए गए। यह पूरे बजट का सिर्फ 5.5 फीसदी बैठता है।

समाज में भेदभाव खत्म करने के उद्देश्य से दलितों के लिए जो स्कीमें और कार्यक्रम लागू किए गए हैं उन्हें आवंटित होने वाली राशियों में भारी कटौती की गई है। मसलन सिर पर मैला ढोने को रोकने और उनके पुनर्वास   की स्कीम के लिए 2013-14 में 557 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे।

लेकिन 2017-18 इसकी एक फीसदी से भी कम राशि आवंटित की गई  है। इसी तरह दलित छात्र-छात्राओं के लिए दी जाने वाली स्कॉलरशिप कार्यक्रम में भी काफी कटौती की गई है। मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान यह सिर्फ 50 करोड़ रुपये रह गई है। सबसे ज्यादा चिंता दसवीं से नीचे की कक्षाओं की (प्री-मैट्रिक) स्कॉलरशिप में कटौती को लेकर है।

इस वजह से कई छात्र-छात्राओं की राह में अड़चनें पैदा हो गई हैं। पहले 26 मंत्रालयों में दलितों पर किए जाने वाले खर्च पर योजना आयोग नजर रखता था। लेकिन योजना आयोग को खत्म कर दिए जाने के बाद निगरानी की जिम्मेदारी सामाजिक अधिकारिता मंत्रालय के पास आ गई है।

हालांकि अभी यह पता नहीं चल पा रहा है कि दलितों स्कीमों के लिए आवंटित राशि किस तरह खर्च हो रही है। साफ है कि दलितों को लेकर मोदी सरकार की जुबां पर कुछ और है और दिल में कुछ और।

साभार-सबरंग

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