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कैराना: ध्रुवीकरण की राजनीति में विकास के छूटें मुद्दे

कैराना। उत्तर प्रदेश की कैराना विधानसभा सीट हिंदू-मुस्लिम-गुर्जर बहुल इस इलाके की राजनीति दो खानदानों की विरासत के बीच अटकी हुई है. हिंदुओं के पलायन को भाजपा चुनावी मुद्दा बनाने में जुटी है, ताकि वोटो का ध्रुवीकरण किया जा सके। लेकिन स्थानीय लोग इस बार इन सबसे परे हटकर विकास पर बहस चाहते हैं.

पिछले वर्ष पलायन के मुद्दे को लेकर कैराना खासा गर्म रहा था और इसकी गूंज विधानसभा में भी सुनाई दी थी, लेकिन चुनावी बेला में अब यहां की राजनीति दो सियासी घरानों के बीच फंसी हुई है। भाजपा ने कैराना विधानसभा सीट से सांसद हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को टिकट दिया है, जबकि समाजवादी पार्टी ने नाहिद हसन को टिकट दिया है।

पलायन के मुद्दे पर भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता डॉ. चंद्रमोहन सिंह ने आईएएनएस से कहा, “निश्चित तौर पर कैराना से हिंदुओं का पलायन हुआ है। कानून-व्यवस्था खराब होने की वजह से यहां के लोगों का पलायन हुआ है। यह एक चुनावी मुद्दा है। यहां छेड़छाड़ की घटनाएं आम बात हैं। इसे रोकने के लिए ही भाजपा ने वादा किया है कि हम सत्ता में आएंगे तो एंटी रोमियो दल बनाया जाएगा। इसे स्कूलों के बाहर तैनात किया जाएगा, ताकि बहन-बेटियों की सुरक्षा की जा सके।”

कैराना विधानसभा सीट के अतीत पर बात करें तो 70 के दशक में सेना छोड़कर वकालत के साथ ही राजनीति की शुरुआत करने वाले हुकुम सिंह पहली बार 1974 में यहां से विधायक चुने गए थे। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। कैराना में तब कांग्रेस नेता व पूर्व सांसद स्वर्गीय अख्तर हसन सक्रिय थे। उनके और हुकुम सिंह के बीच तब से शुरू हुई राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता आज तक कायम है।

पूर्व सांसद अख्तर हसन के पुत्र मुनव्वर हसन के नाम सबसे कम उम्र में लोकसभा, विधानसभा, राज्यसभा व विधान परिषद में पहुंचने का रिकॉर्ड भी है। अब उनके पौत्र नाहिद हसन भी उसी लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं। लगभग चार दशक से दोनों परिवार यहां की राजनीति की धुरी बने हुए हैं।

हसन और हुकुम के चबूतरों के इर्द-गिर्द ही कैराना की सियासत घूमती रही है। सिंह लागातर चार बार यहां से विधानसभा का चुनाव जीते, लेकिन वर्ष 2014 में वह लोकसभा चुनाव में जीत गए। यह सीट खाली हो गई। इस सीट पर उपचुनाव हुआ तो बाजी हसन परिवार के हाथ लग गई। नाहिद हसन यहां से विधायक चुने गए।

वर्ष 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में हुकुम सिंह को इस सीट से जीत मिली थी। उन्हें 80,293 मत मिले थे, जबकि दूसरे स्थान पर बसपा के अनवर हसन रहे थे। हसन को 60,750 वोट मिले थे। तीसरे स्थान पर रहे सपा के अयूब जंग को 21,267 मत मिले थे।

इस बार सपा ने उपचुनाव के विजेता विधायक नाहिद हसन को ही उम्मीदवार बनाया है, जबकि भाजपा ने हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को टिकट दिया है। बसपा से दिवाकर कश्यप मैदान में हैं, तो रालोद के अनिल चौहान भी यहां की चुनावी जंग को रोचक बनाने में जुटे हुए हैं।

कैराना विधानसभा सीट पर पर कुल 299,980 मतदाता हैं, जिसमें 163,493 पुरुष व 136,487 महिला मतदाता हैं और यहां की साक्षरता दर 60 फीसदी है। यहां के जातिगत समीकरण की बात करें तो इस सीट पर सर्वाधिक 142,000 मुस्लिम मतदाता हैं। जबकि 70 हजार शाक्य और 35 हजार गुर्जर मतदाता हैं।

ध्रुवीकरण की राजनीति करने वाले दोनों घरानों के लिए विकास की बात यहां बेमानी लगती है। जीते कोई लेकिन उपेक्षा के चलते ही कंडेला में बनने वाले औद्योगिक क्षेत्र के विकास की योजना परवान नहीं चढ़ सकी। यमुना के खादर में धान, गन्ना व सब्जी की खेती होती है। यहां के लोगों को छोटी-छोटी नौकरियों के लिए भी अन्य राज्यों की शरण लेनी पड़ती है।

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