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मोदी सरकार के फ़ैसले की मार मांस कारोबारियों पर नहीं, ग़रीब किसानों पर पड़ेगी: रवीश कुमार

पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण नियम की अधिसूचना को ध्यान से पढ़ना चाहिए। अभी तक इसे लेकर मांस व्यापार के संदर्भ में ही मुख्य रूप से चर्चा हो रही है लेकिन यह नियम पशु मंडियों को जिस तरह परिभाषित करता है, जैसे उनके मापदंड बनाए गए हैं, उसके अनुसार बहुत सी मंडियों में पशुओं का लेन-देन नहीं हो सकेगा। नए नोटिफिकेशन के लिए पशु बाज़ार के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए कुछ शर्तें पूरी करनी होंगी। हर जिले में पशु बाज़ार मॉनीटरिंग समिति बनेगी जिसके पास पशु बाज़ारों को तीन महीने के भीतर पंजीकरण कराना होगा।

नए नियमों के तहत उन्हीं मंडियों को पशु बेचने के लिए मंज़ूरी मिलेगी जहां पशुओं के लिए समुचित आवास होंगे, चारा द्रोणिकाएं होंगी, अनेक नल होंगे, बाल्टियों सहित पानी की टंकियां होंगी, प्रकाश की व्यवस्था होगी, शौचघर होंगे, बीमार और शिथिल पशुओं के लिए अलग बाड़े होंगे, गर्भवती पशुओं के लिए अलग बाड़े होंगे, पशु चिकित्सा की सुविधा होगी, चारा भंडारण क्षेत्र होगा, बिना फिसलन वाली फर्श होगी, घोड़ों के लोटने के लिए रेत का गड्ढा होगा और पशुओं की विभिन्न प्रजातियों के लिए पृथक बाड़े होंगे।

पशु मंडियों के लिए नया ढांचा तैयार करने के लिए पैसे कौन देगा? कई जगहों पर खुले खेत में ही पशुओं का मेला लगता है, खरीद बिक्री होती है और खेल खत्म। इस हिसाब से तो सैकड़ों की संख्या में लगने वाले पशु मेले बंद हो जाएंगे। जब तक इन सुविधाओं से मेले की जगह लैस नहीं होगी, पशु बाज़ार मॉनीटरिंग समिति खरीद बिक्री की अनुमति नहीं देगी। यही नहीं इन मंडियों में नियम का पालन हो रहा है, इसकी जांच के लिए अधिकारी औचक निरीक्षण करेगा। रिकार्ड देख सकता है, किसी मवेशी के लिए क्रूरता होते देखेगा तो मवेशी को जब्त कर लेगा। नोटिफिकेशन में लिखा है कि पशु बाज़ार मॉनीटरिंग समिति पशु चिकित्सा निरीक्षक, उनकी सहायता के लिए पैरा पशु चिकित्सा कर्मचारी को अधिकृत करेगा। नए नोटिफिकेशन में पशु चिकित्सा अधिकारी के जो काम तय किए गए हैं उसकी सूची देखकर किसी अधिकारी से पूछना चाहिए कि क्या वे किसी मंडी में आने वाले सभी पशुओं की जांच कर सकते हैं, किसी ज़िले में पर्याप्त पशु चिकित्सा अधिकारी हैं।

बहरहाल अब हर बाज़ार में तैनात पशु चिकित्सा अधिकारी बाज़ार में आने वाले हर पशु की जांच करेगा। उतारते वक्त और ले जाते वक्त निगरानी करेगा। संभालकर मवेशी और दस्तावेजों की जांच करेगा।

इस नोटिफिकेशन में यह भी कहा गया है कि पशु बाजार में मरे पशुओं सहित सभी पशुओं की लाशों को भस्म कर दिया जाएगा। उनको चमड़े के लिए बेचा नहीं जाएगा या उनका चमड़ा नहीं उतारा जाएगा। यह समझ नहीं आया कि लाशों को कहां भस्म करेंगे, क्या इसके लिए भी कुछ व्यवस्था होनी है और मरे हुए पशु की खाल ही तो उतारी जाती है जिससे स्थानीय स्तर पर चमड़ा बनता है। क्या इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर नहीं पड़ेगा।

यही नहीं पशु मंडी जाने वाले किसानों को अपने साथ किसान होने का प्रमाण पत्र लेकर जाना होगा। मवेशी का मालिक फोटो पहचान के साथ नाम और पता देगा। वह लिखकर देगा कि मवेशी को वध के लिए नहीं बेच रहा है। खरीदने वाले को भी पहचान पत्र जमा कराना होगा। खरीदने वाला किसान है, इसके लिए राजस्व दस्तावेज़ दिखाना होगा।

इस नोटिफिकेशन के अनुसार बहुत सारी ऐसी जगहें जहां इस तरह की सुविधाएं नहीं हैं वहां पशु की खरीद-बिक्री बंद हो जाएगी। इस नोटिफिकेशन में मवेशी का मतलब गाय, भैंस बछड़ा, कलोर, व्याना और ऊंटिनी है। कुक्कुट भी है जिसमें मुर्गा, पीरू, हंस, बत्तख, गिनि मुर्गा है। इस नोटिफिकेशन में जिस तरह से क्रूरता को परिभाषित किया गया है जो मवेशियों को लेकर मौजूद अलग-अलग क्षेत्रों की सांस्कृतिक परंपराओं से भी छेड़छाड़ करता है।

श्रावण अमावस्या के दिन पूरे महाराष्ट्र में बैल पोला मनाया जाता है. इस दिन के लिए बैलों को सजाया जाता है। उनके सींग की रंगाई होती है। क्या अब यह बंद हो जाएगा। नए नोटिफिकेशन में लिखा है कि बैलों को आभूषण या सजावटी सामग्री पहनाना मना है। मथुरा में गोप अष्टमी के दिन गायों को फूल माला से सजाया जाता है। फूल माला से सजाने पर रोक की बात तो नोटिफिकेशन में नहीं है, मगर क्रूरता वाले कह सकते हैं कि इतने लोग घेरकर गाय की पूजा करेंगे जो गाय घबरा सकती है। क्या गाय-बैलों को घुंघरू से सजाना क्रूरता होगी। नोटिफिकेशन के अनुसार नाक या नकेल या लगाम को खींचना, झटकना और झकझोरना मना है। क्या बगैर नकेल खींचे भैंस और बैल को नियंत्रित किया जा सकेगा. क्या भैंस या बैल नाम से बुलाने पर मान जाएंगे। वैसे किसानों को बता दिया जाए कि डंडे या पैने से मारना भी क्रूरता में गिना जाएगा।

करनाल के पशुपालक किसान राम सिंह ने अपने बैल के गले में घुंघरू बांधा है। नाथ भी बदलते रहते हैं। देश भर में पशु मेलों में सजावटी सामान मिलते हैं। इन दुकानों में रंग बिरंगी रस्सियां, घंटियां होती हैं। इसलिए इस बहस में पशुपालकों और मवेशियों के सामान बेचने वाले दुकानदारों की भी एंट्री होनी चाहिए। अभी तक मांस व्यापारी ही अपनी बात रख रहे हैं।

नोटिफिकेशन की कई ऐसी बातें मवेशी और पशुपालक के दैनिक रिश्ते को प्रभावित करने वाली है। नोटिफिकेशन में लिखा है कि पशु को दूध पीने से रोकने के लिए छींका का प्रयोग करना क्रूरता होगी। बछड़े के मुंह पर जो लगाया जाता है उसे छींका या कहीं जाब कहते हैं। किसानों या पशुपालकों के पास छींका लगाने के अपने तर्क हैं। अब तो बगैर पशु चिकित्सक के आप अपनी गाय भैंस को नाल से दवा तक नहीं पिला सकते हैं। ज़्यादा समय तक के लिए छोटी रस्सी पर खूंटी से बांधना क्रूरता होगी। पशु को कंट्रोल करने के लिए पूंछ, थूथन और कान मरोड़ना मना हो गया है। इस तरह के नियम बनाए गए हैं। हो सकता है कि यह नियम सरकार कड़ाई से लागू न करे मगर किताब में होने से बहुत से एनजीओ पशुपालकों पर अनावश्यक दबाव डाल सकते हैं। चेकिंग में मवेशी पकड़े जाएंगे तो यह सब अपराध के तौर पर गिने जाएंगे कि नाथ लगाया था, आभूषण पहनाया था वगैरह।

हिन्दी के लोग पशु मेलों और मवेशियों के ज़्यादा करीब हैं मगर इस तरह का लेख देखने को नहीं मिला। लेकिन इस पर ठोस लेख लिखा है डाउन टू अर्थ पत्रिका के रिचर्ड महापात्रा ने। उनका कहना है कि इस फैसले से पशुधन पर निर्भर किसान बुरी तरह प्रभावित होने वाला है। मीट के निर्यातक से ज़्यादा ग़रीब किसान प्रभावित होने जा रहे हैं। पशुधन की उनकी आर्थिकी तीन लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा बड़ी है… रिचर्ड ने लिखा है कि हम कृषि अर्थव्यवस्था को ठीक से नहीं जानते हैं इसलिए मीडिया में गलत मुद्दों पर बहस हो रही है। 2010-11 में पशुधन से साढ़े तीन लाख करोड़ का आउटपुट जनरेट हुआ था जो खेती की जीडीपी का 28 प्रतिशत था। देश की जीडीपी का 5 प्रतिशत। इस कारोबार में किसी भी तरह की छेड़छाड़ से ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित होने जा रही है।

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