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…तो 10 साल बाद UP में तीन तीन-चार चार भाषा की जानकारी रखने वाले नागरिक मिलेंगे: रवीश कुमार

उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में नर्सरी कक्षा से ही अंग्रेज़ी की पढ़ाई शुरू हो जाएगी। मीडिया रिपोर्ट से यह साफ नहीं हो सका कि नर्सरी की पढ़ाई अंग्रेज़ी माध्यम में होगी या अंग्रेज़ी वर्णमाला सिखाई जाएगी। तब तक मान कर चलना चाहिए कि योगी जी ने यूपी के सरकारी स्कूलों को इंग्लिश मीडियम बनाने का फ़ैसला नहीं किया है, बल्कि अंग्रेजी एक विषय के रूप में होगा। जैसे संस्कृत तीसरी कक्षा से होगी और दसवीं में जाकर एक विदेशी भाषा ताकि विदेश जाने पर कोई दिक्कत न हो। यूपी से पलायन रोकने वाली सरकार अवसरों की तलाश में विदेश जाने वालों के लिए एक भाषा की व्यवस्था करा रही है तो यह एक व्यावहारिक और अच्छा फ़ैसला है। योगी जी के फैसले से कुछ हैरानी भी हुई। क्या वाक़ई यूपी के सरकारी स्कूलों में नर्सरी कक्षा में ए बी सी डी नहीं सीखाई जाती होगी, क्या इसके लिए उन्हें छठी कक्षा तक का इंतज़ार करना पड़ता था? यूपी में कक्षा छह से अंग्रज़ी की पढ़ाई शुरू होती है। अख़बारों ने लिखा है कि योगी सही तरह के फ़ैसले ले रहे हैं। यूपी के सरकारी स्कूलों से निकलने वाला बच्चा, हिन्दी उर्दू, संस्कृत और स्पेनिश या फ्रेंच में भी दक्ष होगा। दस साल बाद यूपी में तीन तीन चार चार भाषा की जानकारी रखने वाले या बोलने वाले नागरिक मिला करेंगे। ऐसा हो गया तो यूपी भारत का ग्लोबल राज्य हो सकता है।

इस फैसले से सरकारी स्कूलों में बड़े पैमाने पर संस्कृत और विदेशी भाषा के शिक्षकों के लिए संभावना बनती दिख रही है। परमानेंट तो नहीं लेकिन ठेके पर भी किसी को कहां दिक्कत है। समाजवादी पार्टी ने वर्षों के अंग्रेज़ी विरोध के बाद अंग्रेज़ी पर ज़ोर देना शुरू कर दिया था। उनके बाद हिन्दी को लेकर बीजेपी ही अकेली चलती रही। 2014 में केंद्र में सत्ता में आने के बाद हिन्दी और संस्कृत को लेकर काफी शोर हुआ। इतना शोर हुआ कि दक्षिण में लोग हिन्दी के प्रति इस नई आक्रामकता को लेकर आशंकित हो उठे। संस्कृति को लेकर जितना हंगामा हुआ, उस अनुपात में काम क्या हुआ, इसकी मुझे जानकारी नहीं है। संस्कृत के कितने नए विभाग खुले, कितनी पुरानी संस्थाओं को बेहतर किया गया और इसमें नौकरी की संभावना कितनी बढ़ी? मोदी सरकार के तीन साल होने को आ रहे हैं भाजपा संस्कृत को लेकर अपनी उपलब्धियों का रिपोर्ट कार्ड तो रख ही सकती है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कह रहे हैं कि परंपरा और आधुनिकता को मिलकर चलना होगा। संघ के प्रभाव या दबाव में मातृभाषा में शिक्षा को महत्व दिया गया। तो लगा कि इस दिशा में व्यापक बदलाव होगा। गोवा में सुभाष वेलिंगकर ने तो संघ से ही बग़ावत कर दी। बीजेपी सरकार पर आरोप लगाया कि गोवा की बीजेपी सरकार ने मातृभाषा को लेकर किया गया अपना वादा नहीं निभाया है। सरकार अंग्रेज़ी माध्यम में शिक्षा देने वालों को अनुदान क्यों देती है। चुनाव के बाद बाग़ी सुभाष वेलिंकर फिर से संघ में लौट चुके हैं। ऐसा क्यों है कि संघ भी मातृभाषा की लड़ाई इतनी आसानी से हार जाता है। मातृभाषा की लड़ाई सिर्फ दो जगहों पर जीती जाती है। निबंध प्रतियोगिता और सेमिनार में। बाकी हर जगह पर मातृभाषा की लड़ाई संघ भी हार जाता है। मोदी भी हार जाते हैं, योगी भी हार जाते हैं, लेफ्ट राइट सेंटर सबकी यही गति होती है।

इसके बाद भी योगी का यह फैसला व्यावहारिक तो है। वे भले मातृभाषा में यकीन रखते हों लेकिन अंग्रेज़ी का काम कर बता दिया कि जो सामने है उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। समाज में अंग्रेज़ी सीखाने की फैक्ट्री चल रही है। अंग्रेज़ी नहीं जानने की कुंठा युवाओं को मार रही है। सारे प्राइवेट स्कूल अंग्रज़ी माध्यम के ही चल रहे हैं। ऐसे में सरकारी स्कूलों को अंग्रेज़ी से वंचित रखकर योगी जी संघ को खुश कर सकते थे मगर सरकारी बच्चों को बराबरी के अधिकार से वंचित रखकर कैसे खुश हो सकते थे। एक ही बच्चे सरकारी स्कूल से अंग्रेज़ी में लचर होकर निकलें और प्राइवेट स्कूल से मज़बूत यह ठीक नहीं है। इस लिहाज़ से योगी जी ने ठीक ही किया मगर यह कोई बड़ा फैसला नहीं है. एक सामान्य फ़ैसला ही है।

नवंबर 2014 में हिन्दू अख़बार के संदीप जोशी ने रिपोर्ट लिखी है कि तब के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने फैसला किया था कि हर ज़िले में एक सरकारी इंग्लिश मीडियम स्कूल खोला जाएगा। यह स्कूल प्राइवेट और कांवेंट स्कूलों की बराबरी करने वाला होगा। अखिलेश यादव इस बात से चिंतित थे कि माता पिता सरकारी स्कलों में बच्चों को नहीं भेज रहे हैं क्योंकि वहां हिन्दी माध्यम में पढ़ाई होती है। जो माता पिता प्राइवेट स्कूल में नहीं भेज सकते हैं वही अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजते हैं। हिन्दू अख़बार के मुताबिक इसके लिए अंग्रेज़ी पढ़ाने योग्य शिक्षकों की भर्ती का अभियान चलेगा। ख़बर के अनुसार सरकार अगले ही सत्र से इंग्लिश मीडियम स्कूल खोल देना चाहती थी। पूर्व मुख्यमंत्री इंग्लिश मीडियम के ज़रिय सरकारी स्कूलों के प्रति लोगों का नज़रिया बदल देना चाहते थे। योगी जी को बताना चाहिए कि 2014-17 के बीच कितने ज़िलों में सरकारी इंग्लिश मीडियम स्कूल खुले हैं या सिर्फ पूर्व मुख्यमंत्री ने ख़बरबाज़ी ही की।

इस बहस के केंद्र में गुणवत्ता का सवाल होना चाहिए। हिन्दी या अंग्रेज़ी का नहीं। हिन्दी में ही बोका होंगे तो हिन्दी माध्यम के होने भर से प्रतिभाशाली नहीं हो जाएंगे। हर साल असर की रिपोर्ट आती है। यूपी के बारे में 2016 की रिपोर्ट कहती है कि कक्षा तीन में 16.8 प्रतिशत बच्चे अक्षर तक नहीं पढ़ सकते हैं। आठवीं कक्षा में 14 प्रतिशत ऐसे हैं जो पहली कक्षा के स्तर का पाठ ही पढ़ सकते हैं। कक्षा पांच में 24 प्रतिशत बच्चे ही जो दूसरी कक्षा का पाठ पढ़ सकते हैं। असर की रिपोर्ट बताती है कि कक्षा पांच में पढ़ाई का स्तर 2010 की तुलना में गिरता ही जा रहा है। 2010 में 34 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा का पाठ पढ़ लेते थे, अब 24 प्रतिशत बच्चे ही पांचवी में जाकर दूसरी कक्षा का पाठ पढ़ पाते हैं। तो गुणवत्ता का ये स्तर है। इसमें अंग्रेज़ी आ जाए या हिन्दी चली जाए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। माध्यम से भी बड़ी समस्या ये है कि बच्चा मातृभाषा में पढ़ते हुए भी पढ़ने लायक नहीं है। इसे देखकर लगता है कि इस समस्या का समाधान रात को बारह बजे फैसला लेकर लोगों के बीच छवि बनाने से नहीं होगा बल्कि वाकई कुछ अलग करना होगा। अगर कुछ अलग करना है तो वो किया जाना चाहिए न कि अलग करने के नाम पर बारह बजे रात को या सवा चार बजे सुबह फैसला लेना चाहिए। इससे कुछ नहीं होता है।

इसी साल 15 जनवरी के इंडियन एक्सप्रेस में एक और ख़बर छपी है। प्रधानमंत्री मोदी ने शिक्षा और सामाजिक विकास पर अफ़सरों की एक कमेटी बनाई है। इस कमेटी ने सुझाव दिया है कि सभी सेकेंडरी स्कूलों में अंग्रेज़ी पढ़ाई जानी चाहिए। भारत के 6,612 ब्लॉक में कम से कम एक सरकारी इंग्लिश मीडियम स्कूल तो होना ही चाहिए। छठी क्लास से सभी विषयों को अंग्रेज़ी में पढ़ाया जाना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। इस कमेटी में उच्च शिक्षा के तमाम सचिव सदस्य थे जिसने राज्य सरकारों से बात कर ये सुझाव दिया था। अक्तूबर 2016 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी एक संस्था शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने मानव संसाधन मंत्रालय को सुझाव दिया था कि प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही होना चाहिए। किसी भी स्तर पर अंग्रेज़ी को अनिवार्य नहीं किया जाए।

दिसंबर 2016 की ख़बरें हैं कि लोकसभा में मानव संसाधन मंत्री की तरफ़ से एक आंकड़ा पेश किया गया है कि सिर्फ 17 प्रतिशत बच्चे ही अंग्रेज़ी माध्यम स्कूलों में पढ़ रहे हैं। 49 फीसदी बच्चे हिन्दी माध्यम स्कूलों में पढ़ रहे हैं। यह आंकड़ा राष्ट्रीय स्तर का है। धारणा से तो लगता है कि सब अंग्रेजी माध्यम स्कूल में ठेलाए जा रहे हैं लेकिन 83 प्रतिशत बच्चे इस देश के हिन्दी या अन्य मातृभाषा में शिक्षा ले रहे हैं। सरकार ने यह आंकड़ा सदन में दिया है। बिहार में मात्र 3 प्रतिशत बच्चे ही ऐसे स्कूल में जाते हैं जो अंग्रेज़ी माध्यम के हैं। इसका मतलब है कि आज भी भारत में ज़्यादा बच्चे हिन्दी माध्यम में पढ़ रहे हैं तो कायदे से सरकार को अंग्रेज़ी माध्यम को प्रोत्साहित करना चाहिए या हिन्दी माध्यम को। आंदोलन हिन्दी माध्यम में सामग्री उपलब्ध कराने का चलना चाहिए या अंग्रेज़ी माध्यम का करके वाहवाही लूटने का चलना चाहिए।

योगी या मोदी जी को भाषा की राजनीति आती होगी, उन्हें यह नहीं पता होगा कि दुनिया के कई देशों में यह आधुनिक सोच है कि शिक्षा मातृभाषा में हो। मातृभाषा में शिक्षा पारंपरिक सोच नहीं है। शिक्षा की गुणवत्ता और सहजता के लिए ज़रूरी है कि पढ़ाई का माध्यम मातृभाषा हो। मैं ख़ुद अपने बच्चों के लिए इस फार्मूले पर चल रहा हूं। पांचवी के बाद कब अंग्रेज़ी आ गई मुझे पता ही नहीं। अंग्रेज़ी तो आनी ही चाहिए। मैं ख़ुद इसकी वकालत करता हूं क्योंकि हिन्दी को लेकर हम थर्ड क्लास की राजनीति ही कर सकते हैं, अंग्रेज़ी का कुछ बिगाड़ नहीं सकते। इसलिए हिन्दी माध्यम के छात्रों से कहता हूं कि इन नेताओं के चक्कर में मत रहो। आराम से और लगन से अंग्रेज़ी में ख़ुद को दक्ष करो। क्योंकि व्यवस्था पर कब्ज़ा करने का तरीका तो सबको मालूम है, बदलने का किसी को नहीं मालूम।

किसी भी तर्क और शोध से शिक्षा का बेहतर माध्यम मातृभाषा ही है। योगी ने जी अच्छा किया इसके चक्कर में टाइम बर्बाद नहीं किया। हिन्दी माध्यम पार्टी, जिसके नेता हिन्दी माध्यम के अंग्रेज़ी के विकास के लिए इतना कुछ कर रहे हैं, तारीफ़ होनी चाहिए। दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने अंग्रेजी देवी की स्थापना की है। अंबेडकर कहते थे कि अंग्रेज़ी शेरनी का दूध है। इसे पीना ही होगा। अंग्रेज़ी से कोई नहीं बच सकता।अंग्रज़ी को हराने का सपना सब देखते हैं,पर अफ़सोस होता है कि मातृभाषा की लड़ाई सबसे पहले हिन्दी ही क्यों हार जाती है। बाकी योगी जी का फैसला ही ठीक है दोस्तों।

 

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