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भाजपा की जीत में मीडिया का रोल होता है: रवीश कुमार

जब भारतीय जनता पार्टी दिल्ली नगर निगम में जीत के परचम लहराने की ख़बरें आ रही थीं तब उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह बंगाल के तीन दिनों के दौरे पर थे। बंगाल में अगले साल स्थानीय निकायों के चुनाव होने हैं। 2016 में विधानसभा चुनावों से एक साल पहले बीजेपी ने बंगाल में मेहनत शुरू कर दी थी। टीवी चैनलों ने बीजेपी के एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए आए दिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत से संबंधित फ़ाइलों को बांचना शुरू कर दिया था। रोज़ नेताजी को लेकर राजनीति होती थी। बीजेपी को विधानसभा में तीन सीटें मिली थीं। बीजेपी की इस हार पर किसी ने किसी से इस्तीफा नहीं मांगा। न्यूज़ चैनल नेताजी को भूल गए मगर बीजेपी बंगाल नहीं भूली। इस हार के बाद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह एकबार फिर बंगाल लौटे हैं। इस वक्त विधानसभा चुनाव नहीं होने हैं, मगर साल भर बाद होने वाले स्थानीय निकायों के चुनावों की तैयारी की बुनियाद रखने गए हैं।

अमित शाह ने इसे मिशन बंगाल का नाम दिया है। ज़मीन स्तर के कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए उनके यहां केले के पत्ते पर खाना खा रहे हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष होकर भी प्रदेश अध्यक्ष की तरह बूथ स्तर का अभियान शुरू करने गए हैं। आप बता दीजिए कि हाल फिलहाल में किस पार्टी के ऐसे अध्यक्ष को जानते हैं जो अपनी पार्टी के इतनी मेहनत करता हो।

नरेंद्र मोदी के उभार के बाद बड़ी संख्या में नौजवानों ने बीजेपी की तरफ रूख़ किया है। इन चुनावों में नए नए लोगों को टिकट देकर बीजेपी ने उनकी राजनैतिक महत्वकांक्षा को सक्रिय रखा है। यूपी में बहुजन समाज पार्टी बीस साल तक निकाय चुनावों को महत्व नहीं देती रही। शान से एलान करती रही कि हम ये चुनाव नहीं लड़ते हैं। जबति वो दिल्ली में लड़ती रही। यूपी में नहीं लड़ने का नतीजा यह हुआ कि ज़मीन पर नेतृत्व कमज़ोर पड़ गया। कार्यकर्ताओं के पास किसी प्रकार की सत्ता नहीं रही। अब जाकर बसपा ने कहा है कि जून में होने वाले यूपी के निकाय चुनावों में चुनाव लड़ेगी।

भाजपा के अलावा शिवसेना ही है जो निकाय चुनावों को महत्व देती है। बीएमसी पर कब्ज़ा बनाए रखकर शिवसेना महाराष्ट्र की राजनीति में प्रासंगिक बनी रहती है। बीजेपी ने यह खेल समझ लिया है। उसने सबसे पहले सहयोगी शिवसेना को ही चुनौती दे डाली और इस बार के चुनाव में 31 सीटों से 82 पर पहुंच गई। पहली बार बीएमसी में बीजेपी शिवसेना के बराबर पहुंच गई है। गुजरात, महाराष्ट्र से लेकर कई राज्यों के स्थानीय निकाय चुनावों के बारे में इंटरनेट सर्च कीजिए आपको बीजेपी की कहानी मिलेगी। उत्तर प्रदेश में जब पार्टी कई चुनावों तक सत्ता में नहीं आई तब इन्हीं निगमों के चुनावों के कारण उसके नेता बचे रहे या भविष्य के लिए तैयार होते रहे।

बीजेपी के लिए निकाय चुनाव आईपीएल लीग के मैच हैं। हर शाम कोई न कोई मैच खेलना है। ट्वेंटी ट्वेंटी मैच खेल कर टेस्ट टीम में चयन से वंचित खिलाड़ी को लगता है कि वो खिलाड़ी तो बन ही गया है। आम आदमी पार्टी की दिल्ली में हार हुई है। मुझे ध्यान नहीं आता कि कब उनके वोलेंटियर की बैठक हुई है, पार्टी के भीतर चुनाव की प्रक्रिया क्या है जिससे वोलेंटियर को लगता रहे कि वे एक नई पार्टी में आए हैं जो आदर्श के हिसाब से दूसरों से अलग है। लिहाज़ा आम आदमी पार्टी का कार्यकर्ता नेता बनने के सपने से वंचित हो गया। नतीजों से लगता है कि आम आदमी पार्टी ने ज़मीन पर वोलेंटियरों को राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं रखा होगा। अब तो आम आदमी का वोलेटिंयर दिखता ही नहीं है। विधायक भी नहीं दिखते हैं। सिर्फ पार्टी के नेता दिखते हैं।

भाजपा के विरोधी दल एक बात जान लें। मोदी शाह की जोड़ी हिट विकेट से आउट नहीं होगी। उन्हें आउट करना होगा और आउट करने के लिए मैच खेलना होगा। प्रैक्टिस मैच भी खेलना होगा। अपने कार्यकर्ताओं का लगातार राजनीतिक प्रशिक्षण करना होगा। विरोधी दल के कार्यकर्ता ढीले-ढाले मिलते हैं। मंझोले नेता लुंजपुंज तरीके से हथियार डाले मिलते हैं। किसी मुद्दे पर उनकी तैयारी नहीं होती है। व्हाट्स अप के ज़रिये फैलाये जा रहे झूठ का जवाब कैसे देना है इसे लेकर न तो बड़ा नेता गंभीर रहता है न छोटा नेता। उसे पता नहीं है कि राष्ट्रवाद और राजनीतिक मुद्दों के बीच फर्क कैसे करना है। अमित शाह जब बंगाल में रहेंगे तो वहां उनसे बंगाल के ही कार्यकर्ता मिलेंगे। इस तरह से दरबारी संस्कृति भी कमज़ोर पड़ती है। दिल्ली के चक्कर लगाने की आदत हतोत्साहित होती है।

विपक्ष राजनीतिविहीन, नेताविहीन और कार्यकर्ताविहीन लगने लगा है। भाजपा सत्ता में होते हुए भी विपक्ष की तरह राजनीति कर रही है। कई तरह के विपक्षी दल हो गए हैं जिनका उद्देश्य भी एक दूसरे जैसा ही है। इनकी अब स्वतंत्र नियति नहीं दिखती है। गठबंधन ही इनका उपाय है। समझ नहीं आता कि ये अलग अलग क्यों हैं। अपनी व्यक्तिगत राजनीति के लिए या किसी महान राजनीतिक उद्देश्य के लिए। अलग अलग लड़ते हुए भाजपा से नहीं लड़ सकते हैं। इन्हें गठबंधन के अलावा राजनीतिक विलय के बारे में सोचना चाहिए।

आम तौर पर संघ परिवार और भाजपा को अलग या अनुपूरक देखने की परंपरा रही है लेकिन ग़ौर से देखिये इन सबका विलय हो चुका है। भाजपा और संघ की संस्थाओं में अंतर्विरोध को मात देने के लिए भी यह उपाय अच्छा है। सबको चुनाव जीतने के लक्ष्य से जोड़े रखो। पहले जीते फिर देखेंगे। जीतने के बाद दूसरी जगह जीतने के लिए भेज दो। इस तरह से कई प्रकार की दक्षिणपंथी पार्टियां जो अलग अलग नाम से संघ परिवार के भीतर चल रही थीं, उनका बीजेपी में विलय हो गया है। उन सबका एक ही उद्देश्य है बीजेपी की जीत। बीजेपी भी अब बीजेपी नहीं है। वही आर एस एस है। आर एस एस भी बीजेपी है।

विरोधी दलों के पास तीन विकल्प हैं। बीजेपी की सहयोगी बन जायें, उनके नेता बीजेपी में चले जायें, और बिना लड़े मिट जायें। अभी जो भी दल बीजेपी की सहयोगी हैं आने वाले दिनों में उनका विलय तय हैं क्योंकि गठबंधन में रहते हुए उनकी भी राजनीतिक भूमिका समाप्त हो गई है। आज आप बीजेपी की सहयोगी दलों को देखिये। शिवसेना को छोड़ कर सबकी राजनीतिक भूमिका गौण हो गई है। बाकी सबका कार्यकर्ता पासवान ज़िंदाबाद,अनुप्रिया ज़िंदाबाद,कुशवाहा ज़िंदाबाद की जगह मोदी ज़िंदाबाद करना सीख गया है। उनके ही नेता जब मोदी मोदी करेंगे तो कार्यकर्ता क्यों नहीं करेगा। भारत की राजनीति में अभी बहुत कुछ होना है जिसकी कल्पना हमने नहीं की है। पुरानी परिपाटी से देखेंगे तो इस राजनीति में कुछ नहीं दिखेगा। बेहतर है कि विपक्षी दल भी भाजपा के सामने आने के लिए विलय करें। अपना लक्ष्य एक करें। यकीन न हो तो आप बंगाल में ममता बनर्जी और उड़ीसा में नवीन पटनायक की तरफ देख लीजिए। किस तरह से वे एक विशालकाय पार्टी से घिर गए हैं। अब जब लेफ्ट के कार्यकर्ता बीजेपी में जा रहे हैं तो लेफ्ट की अकेले की पोलिटिक्स के क्या मायने हैं। इसलिए विपक्ष का विलय ही गठबंधन से बेहतर जवाब होगा। अलग अलग खुदरा खुदरी पार्टियों का मतलब नहीं रहा क्योंकि उनमें न तो लड़ने की इच्छाशक्ति बची है, नेता नहीं बचा है और न ही उनके पास मीडिया है।

बीजेपी की इस प्रचंड जीत में जितनी भूमिका अमित शाह जैसे राष्ट्रीय अध्यक्ष की है उससे कहीं अधिक भूमिका संसाधनों की है। आज मुकाबला बराबरी का नहीं रहा। बीजेपी संसाधनों से लैस पार्टी है। वो हर चुनाव को बड़े पैमाने पर लड़ती है। अख़बार, टीवी से लेकर सोशल मीडिया और सड़कों पर उसके विज्ञापन देखिये। कहीं भी रैली होती है दूसरे ज़िलो से सैंकड़ों गाड़ियां चली आती हैं। इसमें संगठन का पक्ष तो है ही, संसाधन का भी पक्ष उतना ही है। कांग्रेस की एक नेता ने प्राइम टाइम के बाद बताया कि उनके पास चुनावी रेडियो जिंगल प्रसारित करने के पैसे नहीं थे। मेरी राय में यही सबसे अच्छी चुनौती है। भाजपा ने भी यह दिन देखे होंगे जब उनके पास कांग्रेस से कम संसाधन होगा। कांग्रेस में अगर चाह होगी तो वो इन्हीं कमियों के साथ लड़ेगी और कई साल बाद सत्ता में लौटने का सपना देखने की स्थिति में होगी।

भाजपा की जीत में मीडिया का रोल होता है। आप किसी भी चैनल को देखिये, उनके ज़रिये लगातार भाजपा के पक्ष में धारणाओं का निर्माण हो रहा है। एंकरों के सवाल बीजेपी के सवाल होते हैं। विपक्ष का उपहास उड़ाया जाता है। आम दर्शकों को क्या पता कि टीवी का खेल कैसा होता है। वो लगातार विपक्ष को कमज़ोर हालत में देखते देखते सरकार का गुस्सा विपक्ष पर ही निकालने लगता है। आज न कल मीडिया का विपक्ष बनाना ही होगा। बल्कि यह काम विपक्ष को ही करना होगा। उसे बीजेपी का विपक्ष बनने के साथ साथ मीडिया का भी विपक्ष बनना होगा। जनता को बताना होगा कि कैसे चुनाव आते ही मीडिया बीजेपी की तरफ से बैटिंग करने लगता है। आज किसी को याद नहीं कि नेताजी की फाइल का क्या हुआ। तब नेताजी का परिवार प्रधानमंत्री से मिलता था। टीवी ने नेताजी को लेकर इस तरह बातें की कि लोग गांव घरों में रोज़गार के सवाल भूलकर नेताजी की बात करने लगे। इसी तरह के अनेक उदाहरण आपको चुनावी राज्यों से मिल जायेंगे। विपक्ष की रैलियों को बराबरी से जगह नहीं मिलती है। एक ही दिन में प्रधानमंत्री की तीन तीन रैली लाइव दिखाई जाती है। विपक्ष की बहुत कम। पूरा मुकाबला असंतुलन का है।

मैंने लेख के शुरू में बंगाल का उदाहरण दिया कि कैसे एमसीडी की जीत के वक्त पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगाल में चुनावी तैयारियों के लिए मौजूद था। 11 मार्च को जब उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने ऐतिहासिक जीत हासिल की, उसके ठीक दस दिन बाद 21 मार्च को राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह कोयंबटूर में थे। वे वहां राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की सालाना बैठक में हिस्सा लेने चले गए और कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। उस तमिलनाडु में जहां एक साल पहले हुए विधान सभा चुनाव में बीजेपी को ज़ीरो सीट मिली थी। भाजपा वहां भी दोबारा लड़ने चली जाती है जहां उसे ज़ीरो मिलता है। विरोधी दल ज़ीरो मिलने के बाद लड़ना ही भूल जाते हैं और टीवी लगाकर भाजपा प्रेरित मीडिया का कवरेज़ देखते हुए छाती पीट रहे होते हैं। अमित शाह की तरह राजनीति भले न करें, मगर उनकी तरह परिश्रम करने में कोई बुराई नहीं है।

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