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RBI नोटबंदी के नोट गिनने में बिज़ी है, इसलिए अंबानी-अडानी का लोन नहीं वसूल पा रहा है: रवीश कुमार

भूषण स्टील- 44,477 करोड़, एस्सार स्टील- 37,284 करोड़, भूषण पावर- 37,248 करोड़, एल्क्ट्रो स्टील-10,274, मोनेट इस्पात- 8,944 करोड़। कुल मिलाकर इन पांच कंपनियों पर बैंकों का बकाया हुआ 1, 38, 227 करोड़। एस्सार स्टील पर 22 बैंकों का बकाया है।

इसके अलावा अनिल अंबानी के रिलायंस ग्रुप पर अकेले 1, 21, 000 करोड़ का बैड लोन है। इस कंपनी को 8,299 करोड़ तो साल का ब्याज़ देना है। कंपनी ने 44,000 करोड़ की संपत्ति बेचने का फ़ैसला किया है।

रूइया के एस्सार ग्रुप की कंपनियों पर 1, 01,461 करोड़ का लोन बक़ाया है।

गौतम अदानी की कंपनी पर 96,031 करोड़ का लोन बाक़ी है।

मनोज गौड़ के जे पी ग्रुप पर 75,000 करोड़ का लोन बाकी है।

10 बड़े बिजनेस समूहों पर 5 लाख करोड़ का बक़ाया कर्ज़ा है। किसान पांच हज़ार करोड़ का लोन लेकर आत्महत्या कर ले रहा है। इन पांच लाख करोड़ के लोन डिफॉल्टर वालों के यहां मंत्री से लेकर मीडिया तक सब हाज़िरी लगाते हैं।

भारतीय रिज़र्व बैंक इन्हें वसूलने में बहुत जल्दी में नहीं दिखता, वैसे उसे नोटबंदी के नोट भी गिनने है। इसलिए 2 लाख करोड़ के एन पी ए की साफ-सफाई की पहल होने की ख़बरें छपी हैं। इन समूहों को 2 लाख करोड़ की संपत्ति बेचनी होगी।

बैंक अपने बढ़ते हुए NPA के बोझ से चरमरा रहे हैं। बैंकिंग सेक्टर का एन पी ए बढ़कर 8 लाख करोड़ हो गया है। इसमें से 6 लाख करोड़ का ए पी ए पब्लिक सेक्टर बैंकों का है। करीब 20 पब्लिक सेक्टर ने जितने लोन दिये हैं उसका 10 फीसदी NPA में बदल गया है। इंडियन ओवरसीज़ बैंक का एन पी ए तो 22 प्रतिशत से अधिक हो गया है। 2016 के दिसंबर तक 42 बैंकों का एन पी ए 7 लाख 32 हज़ार करोड़ हो गया है। एक साल पहले यह 4 लाख 51 हज़ार करोड़ था। इस साल के पहले आर्थिक सर्वे में लिखा हुआ है एशियाई संकट के वक्त कोरिया में जितना एन पी था, भारत में उससे भी ज़्यादा हो गया है।

एन पी ए को लेकर शुरू में लेफ्ट के नेताओं ने कई साल तक हंगामा किया, मगर पब्लिक डिस्कोर्स का हिस्सा नहीं बन सका। बाद में किसानों के कर्ज़ माफ़ी के संदर्भ में एन पी ए का ज़िक्र आने लगा। एन पी ए को भी उद्योगपतियों को मिलि कर्ज़ माफ़ी की नज़र से देखा जाने लगा। इसलिए अब इसका दबाव सरकार पर पड़ रहा है। तीन साल तक कुछ नहीं करने के बाद पहली बार कोई सरकार एन पी ए की तरफ कदम बढ़ाती नज़र आ रही है। बैंकिंग कोड बना है, दिवालिया करने का कानून बना है।

हाल ही में भारतीय रिज़र्व बैंक ने उन 12 खातों के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं जिन पर 5000 करोड़ से अधिक का एन पी ए है। कुल एन पी ए का यह मात्र 25 फीसदी है।

भारतीय रिज़र्व बैंक भी एन पी ए को लेकर सख़्त होने लगा है क्योंकि अब इसे नहीं रोका गया तो बैंक डूब जायेंगे। इसके लिए लोन न चुकाने वाली कंपनियों के ख़िलाफ़ NATIONAL COMPANY LAW TRIBUNAL( NCLT) में याचिका दायर की गई है।

NPA बनने के कई कारण होंगे। रिसर्च के दौरान नौकरशाही, टेंडर में घपले वगैरह भी हैं। मगर अर्थव्यवस्था में जब संकुचन आता है तो निवेश का रिटर्न कम होने लगता है। कंपनियां लोन नहीं चुका पाती हैं। यही कारण है कि 2017 के पहले तीन महीने में प्राइवेट कैपिटल इंवेस्टमेंट है वो काफी सिकुड़ गया है। CMIE नाम की एक प्रतिष्ठित संस्था है, इसका कहना है कि अप्रैल और मई में नए निवेश के प्रस्ताव पिछले दो दास में घटकर आधे हो गए हैं। कंपनियों के पास पैसे ही नहीं रहेंगे तो निवेश कहां से करेंगे।

2016 के दूसरे हिस्से के बाद बैड लोन बढ़ता जा रहा है। इस कड़ी में अब छोटी और मझोली कंपनियां भी आ गईं है। बिक्री और मुनाफा गिरने के कारण ये कंपनियां लोन चुकाने में असर्मथ होती जा रही हैं। बहुत सारी कंपनियां अपने लोन को चुकाने के लिए संपत्तियों की नीलामी करने वाली हैं। ख़रीदार हैं भी क्या? 8 लाख करोड़ का लोन चुकाने के लिए बेचने की बात तो हो रही है, यह तो कोई बता दे कि ख़रीदार कौन है?

इसका एक रास्ता यह भी निकाला जा रहा है कि बैंकों का आपस में विलय किया जाए। विलय करने से NPA पर क्या असर पड़ेगा, यह समझने की मेरी क्षमता नहीं है। पर जानना ज़रूर चाहूंगा कि विलय से क्या होगा? बिजनेस अख़बारों में इस पर काफी चर्चा होती है मगर बाकी मीडिया को इससे मतलब नहीं। NPA एक तरह का आर्थिक घोटाला भी है। आठ लाख करोड़ के घोटाले की प्रक्रिया को नहीं समझना चाहेंगे आप?

आज के फाइनेंशियल एक्सप्रेस में ख़बर है कि 21 पब्लिक सेक्टर बैंकों के विलय से 10 या 12 बैंक बनाए जायेंगे। देश में स्टेट बैंक की तरह 3-4 बैंक ही रहेंगे। हाल ही में भारतीय स्टेट बैंक में छह बैंकों का विलय हुआ है। इसकी सफलता को देखते हुए बाकी बैंकों को भी इस प्रक्रिया से गुज़रना पड़ सकता है। 2008 में भी भारतीय स्टेट बैंक में स्टेट बैंक आफ सौराष्ट्र का विलय हुआ था। 2010 में स्टेट बैंक आफ इंदौर का भारतीय स्टेट बैंक में विलय हुआ था।

इस लेख के लिए 16.7.2017 का बिजनेस स्टैंडर्ड, फाइनेंशियल एक्सप्रेस, 8.5.2016 का हिन्दू, 20.2.2017 का FIRSTPOST.COM, 9.6.2017 का MONEYCONTROL.COM की मदद ली है। सारी जानकारी इन्हीं की रिपोर्ट के आधार पर है।

 

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