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मेरा यकीन है कि एक दिन लोग उठेंगे, अख़बारों और चैनलों के ख़िलाफ़ बोलेंगे: रवीश कुमार

राज्यसभा में शरद यादव जी का भाषण मीडिया की उस सच्चाई के बारे में है जिसके बारे में हम सब जानते हैं। मगर पाठक से लेकर दर्शक तक को काठ मार गया है। किसी को इन ख़तरों की आहट से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। एक और बार शरद यादव ने मीडिया की हकीकत सदन में उठाकर लोगों को सुनने समझने का मौका दिया है। इनके भाषण को लाखों करोड़ों लोगों तक पहुंचा देना चाहिए और इनकी एक एक बात के आलोक में अख़बार और टीवी को देखना होगा। मैंने उनके भाषण के बडे हिस्से को टाइप किया है ताकि आप पढ़ सकें। मेरा यकीन है कि एक दिन लोग उठेंगे। अख़बारों और चैनलों के ख़िलाफ़ बोलेंगे। वे मीडिया की स्वतंत्रता, उसके काम और सरकार की तरफदारी में फर्क करेंगे। वो लोग भी उठेंगे तो जो अपनी पसंद की सरकार चुनते हैं। वो एक दिन कहेंगे,हमने अपनी पसंद की सरकार चुनी है। मीडिया का चुनाव नहीं किया है। मीडिया का काम है कि हमारी पसंद और हमारी चुनी हुई सरकार से आज़ाद होकर काम करे। हम भले वो दिन न देख सकें, पत्रकार भले ही मजबूर किये जाएं उसी मीडिया में काम करने के लिए लेकिन एक दिन जनता यह सब देख लेगी। बोलते रहिए। लिखते रहिए। शुक्रिया शरद दी। यहां से शरद यादव के भाषण का हिस्सा पढ़िये-

हम सब लोगों की बात का हिंदुस्तान के लोगों के पास पहुंचाने का रास्ता एक ही है औऱ वह मीडिया है। आज हालत ऐसी है, एक नया मीडिया, विजुअल मीडिया आया है, सोशल मीडिया आया है। मैंने एक दो बात सच्ची कही है, उपसभापति जी, मैं आपसे कह नहीं सकता कि सोशल मीडिया किस तरह से बढ़ा है, उसमें कई तरह की अफवाह चल रही है, लेकिन किस तरह से गाली गलौज चल रही है, उसका कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता है। मजीठिया कमीशन कब से मीडिया के लिए बना हुआ है। आज ये सारा मीडिया-हम लोकतंत्र में चुनाव सुधार की बात कह रहे है कि चुनाव सुधार कैसे हो। इस चुनाव सुधार की सबसे बड़ी बात है- हमारी लोकशाही और लोकतंत्र कहां जा रहा है, इसको वहां पहुंचाने वाले कौन लोग है, वह तो मीडिया ही है। जिसे चौथा स्तंभ कहते हैं, वही है न? उसकी ये हालत है? पत्रकार के लिए मजीठिया कमीशन बना हुआ है। याद रखना मीडिया का मतलब है, पत्रकारिता का मतलब है पत्रकार और वही उसकी आत्मा है। यह लोकशाही या लोकतंत्र जो ख़तरे में है, उसका एक कारण यह है कि हमन पत्रकार को ठेके में डाल दिया है। ठेके में नहीं डाल जिया है, बल्कि उससे ज़्यादा हायर एंड फायर एक नई चीज़ यूरोप से आई है यानी सबसे ज़्यादा हायर एंड फायर यदि कहीं है तो वह पत्रकार है। मैं बड़े बड़े पत्रकारों के साथ रहा हूं। मैं बड़े बड़े लोगों के साथ रहा हूं। हमने पहले भी मीडिया देखा है, आज का मीडिया भी देखा है। उसकी सबसे बड़ी आत्मा कौन है? सच्ची ख़बर आये कहां से? राम गोपाल जी, जब पिछला चुनाव विधान सभा का हो रहा था तो मैंने ख़ुद जाकर चुनाव आयोग को कहा ता कि यह पेड न्यूज़ है। आज जो पत्रकार है, वे बहुत बेचैन और परेशान हैं। पत्रकार के पास ईमान भी है। लेकिन वह लिख नहीं सकता है। मालिक के सामने उसे कह दिया जाता है कि इस लाइन पर लिखो। इस तरह से लिखो। उसका अपना परिवार है। वह कहां पर जाए?
वह सच्चाई के लिए कुछ लिखना चाहता है।

हमारे लोकतंत्र में बाज़ार आ गया है। खूब आये लेकिन यह जो मीडिया है, इसको हमने किनके हाथों में सौंप दिया है? यह किन-किन लोगों के पास चला गया है? इस देश का क्या होगा। अब हिंदुस्तान टाइम्स भी बिकने वाला है। कैसे चलेगा यह देश? यह चुनाव सुधार, यह बहस, ये सारी चीज़ कहां से आएगी? कोई यहां पर बोलने के लिए तैयार नहीं है? निश्चित तौर पर मैं आपसे कहना चाहता हूं कि जो मीड़िया है, लोकशाही में, लोकतंत्र में यह आपके हाथ में है, इस पार्लियामेंट के हाथ में है। कोई रास्ता निकलेगा या नहीं निकलेगा? ये जो पत्रकार हैं, ये चौथा खंभा है, उसके मालिक नहीं हैं और हिंदुस्तान में जब से बाज़ार आया है तब से तो लोगों की पूंजी इतने बड़े पैमाने पर बढ़ी है। मैं आज बोल रहा हूं तो यह मीडिया मेरे ख़िलाफ़ तंज कसेगा, वह बुरा लिखेगा। लेकिन मेरे जैसा आदमी जब चार साढ़े चार साल जेल में बंद रहकर आज़ाद भारत में आया तो अगर अब मैं जाऊंगा तो मैं समझता हूं कि मैं हिन्दुस्तान की जनता के साथ विश्वासघात करके जाऊंगा। सर, आज सब से ज़्यादा ठेके पर लोग रखे जा रहे हैं और पूरे हिंदुस्तान में लोगों के लिए कोई नौकरी या रोज़गार पैदा नहीं हो रहा है। सब जगह पूंजीपति और सारे प्राइवेट सेक्टर के लोग हैं। अख़बार में सबसे ज़्यादा लोगों को ठेके पर रखा जाता है। इस तरह मजीठिया कमीशन कौन लागू करेगा? इनके कर्मचारियों का कोई यूनियन नहीं बनने देता है। आप किसी पत्रकार से सच्ची बात कहो, तो वह दहशत में आ जाएगा क्योंकि उसका मालिक दूसरे दिन उसे निकाल बाहर करेगा। तो यह मीडिया कैसे सुधरेगा। अगर वही नहीं सुधरेगा तो चुनाव सुधार की यह सारी बहस मर जायेगी। ये भी उसे छांटकांट कर देंगे। उसका मालिक बोलेगा कि किस किस का देना है, किस किस का नहीं देना है। हम रोज़ यहां बोलते हैं औऱ ये रोज़ बोलता है कि हमारे जैसे आदमी को मत छापो। क्योंकि यह सच बोल रहा है और यह सच ही इस बैलेट पेपर का ईमान है। इस ईमान को चारों तरफ से पूंजी ने घेर लिया है। बड़े पैसे वालों ने घेर लिया है और अब सब से बड़ी मुश्किल यह है कि बहस करें तो कैसे करें। सरय यह देश बहुत बड़ा है। एक कंटिनेंट है, लेकिन हमारी बहस और हमारी बात कहीं जाने को तैयार नहीं है। कहीं पहुंचने को तैयार नहीं है।

ये अखबार के पूंजीपति मालिक कई धंधे कर रहे हैं। इन्होंने बड़ी बड़ी ज़मीन ले ली है और कई तरह के धंधे कर रहे हैं। ये यहां भी घुस आते हैं। इनको सब लोग टिकट दे देते हैं। मैं आप से कह रहा हूं कि इस तरह यह लोकतंत्र नहीं कभी नहीं बचेगा। सर, इसके लिए एक कानून बनना चाहिए कि अगर कोई मीडिया हाउस चलाता है या अखबार चलाता है वह दूसरा धंधा नहीं कर सकता है। सर, इस देश में क्रास होल्डिंग बंद होनी चाहिए। यह कानून पास करो, फिर देखेंगे कि हिंदुस्तान कैसे नहीं सुधरता है। हमारे जैसे कई लोग हिन्दुस्तान में हैं, जिसने सच को बहुत बग़ावत के साथ बोला है। पहले भी हिन्दुस्तान को बनाने में ऐसे लोगों ने काम किया है। मैं नहीं मानता कि आज ऐसे लोग नहीं है। ऐसे बहुत लोग हैं। जो सच को ज़मीन पर उतारना चाहते हैं। लेकिन कैसे उतारें? यानी इस चौथे खंभे पर आपातकाल लग गया है। हिन्दुस्तान में अघोषित आपातकाल लगा हुआ है। यह जो पत्रकार ऊपर बैठा हुआ है, वह कुछ नहीं लिख सकता क्योंकि उसके हाथ में कुछ नहीं है। यही जब सूबे में जाता है तो मीडिया वहां की सरकार की मुट्ठी में चला जाता है। कुछ पत्रकार सच लिखते हैं तो गाली ही नहीं देते हैं, उसे निकाल बाहर किया जाता है। फिर यह देश कैसे बनेगा। आप कैसे सुधार कर लोगों। मैं आप से नहीं, सबसे पूछना चाहता हूं कि सुधार कैसे होगा। सर, इस देश में मीडिया के बारे में बहस क्यों नहीं होती ?इस देश में ऐसा कानून क्यों नहीं बनता कि कोई भी ब्यापारी या किसी तरह की क्रौस होल्डिंग नहीं कर सकता है। तब हिंदुस्तान बनेगा। सर हिन्दुस्तान जिस दिन आज़ाद हुआ था, तो इसी तरह हुआ था।

गणेश शंकर विद्यार्थी थे जिन्होंने हिन्दुस्तान के लिए जान दे दी थी। मैं इस पार्लियांमेंट में रविशंकर प्रसाद जी से निवेदन करना चाहता हूं कि आज वहां हैं, हम यहां हैं। कल चले जायेंगे लेकिन आने वाले हिन्दुस्तान के ग़रीब, मज़दूर, किसान से लोकतंत्र दूर हट गया है। आप कितने ही तरीके से स्टैंड अप करिए, आप कितनी भी तरह की योजनाएं बनाइये लेकिन वह दूर हटता जाएगा। हम सभी ने बहुत ताकत लगायी लेकिन वह गरीब तक नहीं पहुंच पाता है। सब, जब इनके यहां चुनाव हो रहा था, तो मैं तीन-तीन अख़बार के पास गया था। उन अख़बारों में मेरा कहीं नहीं छप रहा था। मैं महीने भर से शिकायत कर रहा था, लेकिन उनमें मेरे बारे में एक लाइन नहीं आयी। वे आज भी नहीं छापेंगे क्योंकि वह मालिक बैठा हुआ है। सारे पत्रकार मेरी बात को ह्रदय से ज़ब्त करेंगे लेकिन उसका मालिक उसकी तबाही करेगा।

 

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