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इस किताब को ख़ुद के लिए पढ़िए, इससे पहले कि धरती से सब विदा हो जाएं: रवीश कुमार

डाउन टू अर्थ पत्रिका अब हिन्दी में भी आती है लेकिन अपने फेसबुक पर कभी किसी को इस पत्रिका के बारे में बात करते नहीं देखा। हिन्दी के पाठकों को लगातार अपना विस्तार करते रहना चाहिए। पर्यावरण की दुनिया के संकट दुनिया की राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं। इसे लेकर हिन्दी में लिखा तो जा रहा है मगर चर्चा कम है। सोपान जोशी ने स्वच्छता के संदर्भ में जो किताब जल थल मल लिखी है वैसी किताब तो अंग्रेज़ी और फ्रेंच में भी नहीं है। मगर किसी को नहीं देखा चर्चा करते हुए जबकि उस पुस्तक का संबंध मौजूदा सरकार और उसकी सबसे बड़ी योजना से भी है। त्वरित राजनीतिक टिप्पणियों के अलावा पढ़ने की साधना के अलावा कोई विकल्प नहीं है। अब तो लगता है कि लोग साहित्य भी नहीं पढ़ रहे हैं। नए रचनाकारों की बात ख़ुद रचनाकार ही फेसबुक की टाइमलाइन पर कर रहे हैं। साहित्य के बारे में जब भी बात होती है भूतकाल हावी नज़र आता है। उसमें भी बताने दिखाने का भाव बोलता है और वो भी दो चार साहित्यकारों तक ही सीमित होता है।

पेंग्विन से एक किताब आई है। प्रेरणा सिंह बिद्रा की यह किताब 599 रुपये की है। नाम है THE VANISHING. हाल ही में वैज्ञानिकों ने शोध कर बताया है कि एक साल में एक हज़ार से लेकर दस हज़ार प्रजातियां धरती से लुप्त हो रही हैं। लुप्त होने की यह रफ्तार पहले कभी नहीं थी। जब डायनासोर ग़ायब हुआ था तब वो एक प्राकृतिक घटना थी लेकिन अब मानव की भूख जीव जंतुओं को निगलती जा रही है। प्रदूषण एक कारण है मगर आबादी बढ़ने के कारण मनुष्य अब जंगलों पर धावा बोल रहा है। खेतों में अपार्टमेंट बन रहे हैं। इससे प्रकृति को स्थायी तौर पर नुकसान हो रहा है। अक्सर कहा जाता है कि पर्यावरण विकास का दुश्मन है लेकिन मधुमक्खियों और नाना प्रकार के कीटों से होने वाले पोलिनेशन के कारण 235 अरब से लेकर 577 अरब डॉलर का आउटपुट होता है। जानवरों के नष्ट होने से आर्थिक नुकसान भी हो रहा है।

राजस्थान का राजकीय पक्षी है बस्टर्ड। अब यह ख़त्म होने के कगार पर है। जम्मू कश्मीर का राजकीय पशु है हंगुल। वो भी अब सौ दो सौ की संख्या में बचा है। चंबल के इलाके के घड़ियाल की रिहाइश का नब्बे फीसदी हिस्सा नष्ट हो चुका है। प्रेरणा ने हाथियों पर बेहद दर्दनाक चैप्टर लिखा है। जंगलों के ख़त्म होने के कारण हाथियों की चपेट में ग़रीब किसान ही पहले आते हैं। उनकी फ़सल नष्ट होती है तो हाथी पर हमला बोल देते हैं। असम में ऐसे ही एक हाथी को मार दिया और उस पर लिख दिया गया ‘धान चोर बिन लादेन’। कब हाथी गणेश है और कब लादेन आपको यह चैप्टर रुला देगा।

क्या आपको पता है कि दुनिया भर में पीने के पानी का 75 फीसदी हिस्सा जंगलों से आता है जो तेज़ी से नष्ट हो रहे हैं। जंगल ख़त्म होते हैं तो उनके साये में सदियों से बने जल संसाधन भी सूखने लगते हैं। श्रीनगर के पास का दाचीगाम इसकी एक मिसाल है। भारत में अभी भी जंगल जितने कार्बन गैसों को सोखते हैं उस काम के लिए अगर मशीन लगाई जाए तो 6 लाख करोड़ रुपये ख़र्च होने लगेंगे। भारत में जंगल तेज़ी से ख़त्म हो रहे हैं। उनकी जगह वृक्षारोपण का ढोंग हो रहा है। वृक्षारोपण से प्राकृतिक जंगल नहीं बनते। वहां पर जीव जंतुओं के रहने के घर नहीं बन सकते हैं। छह करोड़ या दो करोड़ पेड़ लगाने के नाम पर जनता को मूर्ख तो बनाया जा सकता है मगर असल में जंगल के विकल्प के रूप में खड़ा नहीं किया जा सकता।

प्रेरणा सिंह बिंद्रा की यह किताब क्यों पढ़नी चाहिए? आज के दौर में हमारी नागरिकता के बनने के कुछ आधार है। इस आधार में संविधान और सबके प्रति आदर ही मुख्य नहीं है बल्कि यह भी है कि आप पर्यावरण, आबो-हवा के संकट को कितनी प्रमुखता देते हैं। तभी तो दिल्ली में जनवरी के महीने में जब हवा प्रदूषित होती है तो काफी संख्या में लोग इस मसले पर राय रखने लगते हैं।

इसलिए यह किताब उन्हें और बेहतर करेगी और ज़िम्मेदार भी बनाएगी। पाठकों को पता चलेगा कि भारत में कितना कुछ अच्छा होते हुए भी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। कई अभ्यारण्यों और नेशनल पार्कों का बजट कम हुआ है और पैसा भी समय से नहीं पहुंचता है। संरक्षण की दिशा में निवेश कम होता जा रहा है।

मीडिया में वन व पर्यावरण मंत्रालय को विकास विरोधी बताया जाता है कि वहां प्रोजेक्ट को मंज़ूरी नहीं मिलती है। लेकिन अब तो विधि ला सेंटर ने भी रिसर्च कर बता दिया है कि एक प्रोजेक्ट को तो एक ही दिन में मंज़ूरी मिल गई। औसतन 190 दिनों में मंज़ूरी मिल जाती है। देरी होती है मगर बहुत ही कम यानी न के बराबर प्रोजेक्ट को रोका जाता है। सारे प्रोजेक्ट जंगलों में ही क्यों बनते हैं? लूट के इस खेल पर अलग से बात हो सकती है फिलहाल आप विकास के नाम पर इसे नज़रअंदाज़ कर सकते हैं और जंगलों को जला कर अपने मोहल्ले में गौरैया बचाओं आंदोलन चलाकर अख़बार में फोटू खींचा सकते हैं! प्रेरणा बिंद्रा की किताब से गुज़रते हुए आप भारत के वन्य जीवों और उनके प्रशासन की दुनिया को ठीक से समझ सकते हैं। भारत की उपलब्धियां भी कम नहीं है, मगर अब उन पर भी ख़तरा मंडरा रहा है।

प्रेरणा की इस किताब ने मुझे नई जानकारियों से लैस किया है। इससे पहले वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के कामकाज़ को समझने का सूत्र नहीं मिल रहा था। अब एक पृष्ठभूमि बन गई है कि कैसे सबसे पहले प्रोजेक्ट हाथी शुरू हुआ मगर हाथी भी संकट के कगार पर हैं। जंगलों के उजड़ने से हाथियों का घर उजड़ा है। शिकारी अब आसानी से निशाना बना रहे हैं। इससे पहले नेशनल पार्क के बीच से बनी सड़क से गुज़रते हुए अच्छा लगता था कि दोनों तरफ कितने हरे-घने पेड़ हैं। प्रेरणा की किताब दि वैनिशिंग में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि कैसे इन राजमार्गों के कारण तेज़ी से हमारे जानवर ख़त्म हो रहे हैं। हमारे पास इसका तो डेटा है कि एक साल में सवा लाख लोग सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं मगर जानवर कितने मारे जाते हैं, कोई हिसाब नहीं है। सांप से लेकर हाथी, गुलदार, हिरण, चीतल वगैरह सब कुचले जा रहे हैं।

इस किताब को ख़ुद के लिए ही पढ़िये। अक्सर हम पर्यावरण के सवाल को बच्चों के लिए छोड़ देते हैं। पर्यावरण का संकट स्कूलों में कोरियोग्राफी पेश करने का आइटम नहीं है। आप हम सब लगातार बीमार हो रहे हैं। तरह तरह की बीमारियों और अवसादों ने हमें घेर लिया है। बेहतर है कि हम पर्यावरण के सवाल से ख़ुद टकरायें।

 

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