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मेनस्ट्रीम मीडिया क़ब्ज़े में है, सरकार उसके सहारे आराम से इन सवालों को कुचल देगी: रवीश कुमार

the wire पर ख़बर छपी है कि टाइम्स आफ इंडिया के जयपुर संस्करण ने फ़सल बीमा योजना पर अपनी ख़बर हटा ली। सरकार का दबाव? इस ख़बर में संवाददाता ने लिखा है कि फ़सल बीमा योजना से बीमा कंपनियों को कई हज़ार करोड़ का मुनाफ़ा हुआ है। किसानों को कुछ नहीं मिला। जब ये योजना लाँच हो रही थी तभी प्राइम टाइम के दो तीन शो तो किए ही होंगे कि किस तरह यह योजना बीमा कंपनियों को अमीर बनाने के लिए है। आप पुराने शो देख सकते हैं। ख़ैर किसानों के लिए नहीं है। तब लोगों ने सुना नहीं, उल्टा गालियाँ दी कि आप मोदी का विरोध कर रहे हैं।

इस पोस्ट के कमेंट भी यही लोग कहेंगे मगर आप दस बीस किसानों को फोन करके पूछ सकते हैं। अपवाद छोड़ दें तो किसान ठगा ही गया है। हाल ही में मध्य प्रदेश से कई ख़बरें आईं कि बीमा के नाम पर दस रुपये बीस रुपये मिले हैं। जबकि बीमा कंपनियों ने प्रीमियम जमकर वसूला है।

आए दिन ख़बरें आ रही हैं कि कभी दबाव में संपादक को हटाया जा रहा है तो कभी ख़बरें हटाई और दबाई जा रही हैं। वायर पर ही हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक बॉबी घोष को हटाए दिए गए। आप थोड़ी मेहनत कर इन ख़बरों को पढ़िए और समझिए तो। आपकी चुप्पी भी ग़ज़ब है।

हमलोग फेसबुक पर लिख देते हैं, सरकार को पता है कि हम लोग लिखकर कितने लोगों तक पहुँचेंगे। मेनस्ट्रीम मीडिया क़ब्ज़े में है। सरकार उसके सहारे जो चाहे कर लेगी। वो अपना नैरेटिव फैला कर इन सवालों को आराम से कुचल देगी। किसानों के लिए तो जनता बोल सकती है, पत्रकारों के लिए भले न बोले।

टाइम्स आफ इंडिया को ज़्यादा लोग पढ़ते होंगे, शायद इसलिए स्टोरी हटवाई गई होगी। कुछ दिन पहले डाउन टू अर्थ पत्रिका ने फ़सल बीमा के फ़र्ज़ीवाड़े पर विस्तार से रिपोर्ट छापी है।

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