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रवीश कुमार: PM मोदी के यह मंत्री मंत्रालय चला रहे हैं या चुटकुला सुना रहे हैं?

100 फ़ीसदी विद्युतीकरण ,1000 डीज़ल इंजन- भाषण, स्लोगन और मनोरंजन

रेल मंत्री पीयूष गोयल ने बयान दिया है कि बिहार के मरहौरा में डीज़ल इंजन बनाने की फैक्ट्री की योजना वापस नहीं ली गई है। सरकार ग्लोबल कंपनी GE से किए गए करार पर अमल करेगी। इस बारे में 28 सितंबर के अपने संपादकीय में बिजनेस स्टैंडर्ड ने लिखा है कि एक तरफ पीयूष गोयल कहते हैं कि भारत की रेल अब सिर्फ बिजली पर चलेगी। इससे इतना उतना पैसा बचेगा।

अखबार ने अपने संपादकीय में लिखा है कि दुनिया के किसी भी रेल ने इस लक्ष्य को हासिल नहीं किया है। सबके यहां डीज़ल इंजन की मात्रा है। भारत ने GE से करार किया है कि अगले दस सालों में 2.6 अरब डॉलर के निवेश से 1000 डीज़ल इंजन बनाकर देगी। अखबार ने संपादकीय में चुटकी ली थी कि जब सौ फीसदी बिजली करनी है तो 1000 डीज़ल इंजन बनाने के करार का क्या होगा।

अब मंत्री जी ने खंडन कर दिया है। कुछ लोगों ने डीज़ल इंजन बनाने के फैसले को रद्द करने के बयान को दूरगामी क्रांतिकारी भी बता दिया था। अब किसी को पूछना चाहिए कि रेल नेटवर्क के सौ फीसदी विद्युतीकरण करने का एलान करने से पहले कुछ सोच विचार भी किया था या यह सोच कर बोल दिया कि मार्केट में नया स्लोगन गिरा देते हैं। 24 घंटे के भीतर रेल मंत्री के बयान का ये हाल है। ट्रेन पहले टाइम पर तो चला दीजिए। इतना आंकड़ा पढ़ते हैं तो यही बता दीजिए कि कितनी रेलगाड़ियां देरी से चल रही हैं। उनका प्रतिशत क्या है?

अब मंत्री जी कह रहे हैं कि डीज़ल इंजन को इलेक्ट्रिक इंजन में बदलना राकेट साइंस नहीं है। तो फिर डीज़ल इंजन बनवा ही क्यों रहे हैं? मतलब आप मंत्रालय चला रहे हैं या चुटकुला सुना रहे हैं? पहले डीज़ल इंजन बनवाओ और फिर उसे इलेक्ट्रिक इंजन में बदलवाओ। फ्री में होता है क्या ये सब। उन्हें बताना चाहिए कि क्या GE कंपनी के दबाव में फैसला पलटा है? अखबार लिखता है कि 7 सितंबर की बैठक में इस प्रोजेक्ट को बंद करने की समीक्षा हुई थी। कुछ अज्ञात हुआ क्या?

बिजनेस स्टैंडर्ड ने एक और ख़बर छापी है कि पावर सेक्टर की कमाई घटती जा रही है जिसके कारण यह सेक्टर भी बैंकों का लोन नहीं चुका पा रहा है। बैंकों के NPA का 30 फीसदी हिस्सा पावर सेक्टर का है। इस सेक्टर की प्राइवेट कंपनियां कह रही हैं कि सही कदम उठाए जाने की ज़रूरत है। ये उस सेक्टर का हाल है जिसमें मंत्री पीयूष गोयल को तारीफ़ों से नवाज़ा जाता है। जिस उदय योजना का इतना प्रचार किया गया है उसका यही नतीजा निकला?

श्रेया जय की रिपोर्य बताती है कि ज़्यादातर पावर कंपनियां इसलिए परेशान हैं कि बिजली की मांग नहीं है। मांग नहीं है? तो ये सौ फीसदी बिजली कहां पहुंच रही है? तार ही पहुंच रही है या बिजली भी है उस तार में? और बिजली की मांग में स्थिरता या कमी क्यों है? क्या यह मांग उद्योगों से नहीं आ रही है, क्या उद्योग अब इस हालत पर पहुंच गए हैं तो अभी तक हो क्या रहा था। भोषण, स्लोगन और मनोरंजन!

इस साल अडवांस टैक्स यानी अग्रिम कर वसूली घटकर 11 प्रतिशत पर आ गई है। पिछले साल की पहली तिमाही में 14 प्रतिशत अग्रिम कर जमा हुआ था। अग्रिम कर के भीतर झांकने पर पता चलता है कि कोरपोरेट से जमा होने वाले करों में भी कमी आई है जो बताता है कि कंपनियां संकट से निकल नहीं पा रही हैं। पर्सनल इंकम अडवांस टैक्स कलेक्शन में भी गिरावट है पिछले साल के इस समय 40 फीसदी था, अब 35 फीसदी हो गया है

सरकार अब सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों से कहने लगी है कि अपना ख़र्चा बढ़ाएं। आज के बिजनेस स्टैंडर्ड की पहली ख़बर है। ख़बरों में लिखा जाने लगा कि सरकार अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित (REVIVE) करने का प्रयास कर रही है। बिजनेस स्टैंडर्ड लिखता है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के पास स्कोप बहुत कम है। सरकार इनके ज़रिये अपना ख़र्चा बढ़ाना चाहती है, जिसका खास नतीजा नहीं निकलेगा। ग़ैर तेल सार्वजनिक कंपनियों की आर्थिक हालत पहले ही ख़राब है।

विदेशी निवेशकों ने 28 सितंबर को बाज़ार से 5300 करोड़ निकाल लिए। पिछले नौ दिनों से विदेशी निवेशक अपना पैसा निकाले जा रहे हैं। अब तक 9,900 करोड़ निकाल चुके हैं। इससे पहले एक दिन में 5000 करोड़ से ज़्यादा की राशि 2013 और 2015 में वापस ली गई है। बाज़ार को बचाने के लिए जीवन बीमा से कहा जा रहा है कि वो शेयर ख़रीदे। बिजनेस स्टैंडर्ड ने लिखा है कि ऐसा बाज़ार में सुनने को मिल रहा है।

भारतीय रिज़र्व बैंक ने पहले ही भारत सरकार को दी जाने वाली रकम आधी सौंपी है। टेलिकाम सेक्टर ने कहा है कि सरकार ने उनसे राजस्व की जो उम्मीद लगाई है उसमें 40 फीसदी की कमी आ सकती है। बजट में कहा गया था कि बांड, सार्वजनिक कंपनियों और संसाधनों को बेचकर 72,000 करोड़ का जुटान किया जाएगा। अभी तक मात्र 19,157 करोड़ ही आया है। आंकड़े बताते हैं कि सरकारें हमेंशा ही विनिवेश के लक्ष्य से पीछे रही हैं। नीति आयोग ने तो सौ से ज़्यादा सरकारी कंपनियों को बेचने का प्रस्ताव दिया है। सरकार अपना हिस्सा बेचकर पैसा जुटाना चाहती है। मौजूदा हालात में ऐसा करना मुमकिन नहीं लगता। अपना हिस्सा बेच क्यों रहे हैं, क्या टैक्स आ नहीं रहा है, दूसरे सोर्स से कमाई नहीं हो रही है?

 

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