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रवीश कुमार को भी जान को ख़तरा! डॉक्टर भक्त ने दी धमकी

6 सितंबर की शाम, दिल्ली के प्रेस क्लब में गौरी लंकेश की हत्या के ख़िलाफ़ पत्रकारों का ज़बरदस्त जमावड़ा था। इसके बीच रवीश कुमार घूम-घूमकर एनडीटीवी के अपन शो प्राइम टाइम के लिए लोगों से बात कर रहे थे। जिस वक़्त वे दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद से पूछ रहे थे कि हालत (ट्रोलों का रात-दिन हमला) को देखते हुए उन्हें क्या करना चाहिए, ठीक उसी वक़्त इलाहाबाद में बैठा एक हड्डी का डॉक्टर, गौरी लंकेश की हत्या का जश्न मनाता हुआ, अपनी फ़ेसबुक पेज पर रवीश कुमार को धमकी के अंदाज़ में चेता रहा था।

चेतावनी का अंदाज़ बता रहा था कि इस डॉ.त्रिभुवन सिंह के मन में ना सिर्फ़ गौरी लंकेश बल्कि रवीश कुमार के लिए भी बेहद घृणा भरी है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रनेता रहे रामायण राम (अब एक कॉलेज में शिक्षक) जैसे संजीदा लोगों ने तुरंत लिखा कि यह रवीश कुमार को धमकी है और इसकी पुलिस में शिकायत होनी चाहिए।

गौरी लंकेश के मारे जाने के बाद अब यह सिर्फ़ सनसनी फैलाने जैसी बात नहीं रह गई है कि रवीश कुमार की जान ख़तरे में है। पत्रकार संगठनों को इस बाबत गंभीरता से सोचना चाहिए। गौरी लंकेश ने अपने लिए कोई सुरक्षा नहीं माँगी थी, रवीश भी नहीं माँगेंगे, लेकिन क्या यह सिर्फ़ रवीश की इच्छा पर छोड़ा जा सकता है ? क्या पुलिस पर दबाव नहीं डालना चाहिए कि सोशल मीडिया पर तैर रहे ज़हर को देखते हुए रवीश कुमार पर आसन्न ख़तरे का आकलन करे और उन्हें किसी हत्यारे की गोली से बचाने का उपाय करे ?

आख़िर, हिंदी के पास रवीश जैसे हैं ही कितने जिन पर वह गर्व कर सकती है।…. ना, यह अतिरेक नहीं है। ज़रा कारोबारी चैनलों और अख़बारों के ऐंकरों और संपादकों के चेहरो पर नज़र डालिए, वे ख़ुद इस दुखद सत्य पर मुहर लगा देंगे। ऐसा नहीं कि रवीश कुमार कोई महान पत्रकार हैं, लेकिन बाक़ी इतने बौने हो गए हैं कि रवीश महामानव लगते हैं। ( ध्यान रहे, बात ‘कारोबारी’ मीडिया की हो रही ही है। अपवाद हो सकते हैं।)

ध्यान से देखिए तो रवीश जिनके निशाने पर हैं, उनका एक पैटर्न है। वे बीजेपी के समर्थक हैं, मोदी को महामानव मानते हैं, मुस्लिमों, ईसाईयों और कम्युनिस्टों से नफ़रत करते हैं। आमतौर पर सवर्ण हैं और जाति व्यवस्था को सही और मानवीय ठहराने का प्रयास करते हैं। हाँ, कभी-कभी सभ्यता का एक झीना आवरण भी रहता है जो ज़रा सी हवा चलने पर उतर जाता है। जैसे स्वयं त्रिभुवन सिंह ने गौरी लंकेश की हत्या की निंदा की औपचारिकता की और फिर एक बड़े से लेकिन के साथ सारा विष वमन कर दिया।

 

ज़रा इस हड्डी के डॉक्टर की कुछ पोस्ट देखिए। ये कुछ चावल हैं जिससे आपको पूरे पतीले का हाल पता चल जाएगा–

 

 

 

ग़ौर से देखिए, यह डॉ़ाक्टर अस्पृश्यता को भी वैज्ञानिक आधार दे रहा है और जिन प्रो.कलबुर्गी की हत्या से पूरा देश आंदोलित हुआ, उन्हें ‘वनमुर्गी’ से जोड़ रहा है। सोशल मीडिया में ना जाने कितने लोग रात-दिन इसी तरह कोरे दिमाग़ में ज़हर भरने का अभियान चला रहे हैं। मोबाइल की मुफ़्तिया जियो क्रांति ने उनकी गति को हज़ार गुना बढ़ा दिया है। आदमी को सोचने के लिए सूचनाएँ और तर्क चाहिए। सारा खेल इसी का छद्म (फ़ेक) संसार खड़ा करने का है। फिर अच्छा भला आदमी देखते ही देखते पहले ट्रोल और फिर संभावित हत्यारे में बदल जाता है। उसका मेडिकल की पढ़ाई करना भी काम नहीं आता।

बहरहाल, प्रो.अपूर्वानंद ने रवीश के सवाल के जवाब में जो याद दिलाया, वह महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यह सवाल गौरी लंकेश से भी पूछा गया था, जब उन्होंने कन्हैया कुमार और उमर ख़ालिद को अपना बेटा बताया था। उनसे पूछा गया था कि क्या उन्हें कन्हैया जैसे लोगों के लिए डर नहीं लगता ? उन पर कभी भी हमला हो सकता है। जवाब में गौरी ने कहा था कि मैं कितनी भी चिंतित होऊँ, यह नहीं कह सकती कि ये लोग अपना रास्ता बदल दें।

ज़ाहिर है, अपूर्वानंद ही नहीं, देश के लिए चिंतित कोई भी शख्श  नहीं चाहेगा कि रवीश कुमार अपना रास्ता बदल दें। यूँ भी, यह किसी पत्रकार का आम रास्ता होना चाहिए-सवाल पूछने का रास्ता !

वैेसे भी, रवीश का अंदाज़ देखकर कौन कहेगा कि वे अपना रास्ता बदल सकते हैं, ऐसे में शायद वक़्त आ गया है कि रवीश कुमार की जान की परवाह की जाए। इस गोदी पत्रकारिता के युग में अकेले रवीश ही हैं जिनके ख़िलाफ़ मुसलसल इतना ज़हरीला अभियान चलता है। यह हैरानी की बात है कि एनडीटीवी जैसे टीआरपी की रेस में एक फ़िसड्डी चैनल का ऐंकर, सत्ताधीशों और उनके भक्तों के लिए इतना ख़तरनाक़ हो गया है ! क्या इसलिए कि रवीश अपने सवालों से सिंहासन की मुहर वाले झूठ के घोड़ों को पकड़ लेते हैं और चक्रवर्ती होने की सम्राट की अभिलाषा में व्यवधान पड़ जाता है।

ऐसा नहीं कि रवीश को ख़तरे का अंदाज़ा नहीं है। उन्होंने प्रेस क्लब की सभा में भाषण देते हुए कहा कि ‘गौरी लंकेश की हत्या के बाद लग रहा है कि जैसे मैं ज़िंदा लाश हूँ, मुझे गोली मार दी गई है और लोग मेरी लाश ढो रहे हैं।’

ये कोई काल्पनिक ख़तरा नहीं है। ग़ौर से देखिए, चारो तरफ़ हत्यारे नज़र आएँगे।

आम समय में रवीश की पत्रकारिता बेहद सामान्य और स्वाभाविक मानी जाती, लेकिन जैसा कि जॉर्ज ऑरवेल ने कहा था- ‘इन ए टाइम ऑफ यूनीवर्सल डिसीट, टेलिंग दि ट्रुथ इज ए रिवोल्यूशनरी ऐक्ट।’ यानी जिस समय चारों तरफ धेखाधड़ी का साम्राज्य हो सच कहना ही क्रांतिकारी कर्म है।

इसलिए सवाल रवीश कुमार को नहीं, सच कहने की बेहद ज़रूरी परंपरा को बचाने का है जो लगातार कमज़ोर पड़ती जा रही है !

  • पंकज श्रीवास्तव (साभार- मीडिया विजिल)

 

 

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