Monday , March 27 2017
Home / Editorial / टीवी एंकर हमारे समय का गुंडा है, बाहुबली है: रवीश कुमार

टीवी एंकर हमारे समय का गुंडा है, बाहुबली है: रवीश कुमार

“एक ऐसे वक्त में जब राजनीति तमाम मर्यादाओं को ध्वस्त कर रही है, सहनशीलता को कुचल रही है, अपमान का संस्कार स्थापित कर रही है, उसी वक्त में ख़ुद को सम्मानित होते देखना उस घड़ी को देखना है जो अभी भी टिक-टिक करती है। दशकों पहले दीवारों पर टिक टिक करने वाली घड़ियां ख़ामोश हो गई। हमने आहट से वक्त को पहचानना छोड़ दिया। इसलिए पता नहीं चलता कि कब कौन सा वक्त बगल में आकर बैठ गया है। हम सब आंधियों के उपभोक्ता है। लोग अब आंधियों से मुकाबला नहीं करते हैं। उनका उपभोग करते हैं। आंधियां बैरोमीटर हैं, जिससे पता चलता है कि सिस्टम और समाज में यथास्थिति बरकरार है। …

असली डिग्री बनाम फ़र्ज़ी डिग्री के इस दौर में थर्ड डिग्री नए नए रूपों में वापस आ गई है। न्यूज़ एकंर हमारे समय का थानेदार है। टीवी की हर शाम एक लॉक अप की शाम है। एंकर हाजत में लोगों को बंद कर धुलाई करता है। एंकर हमारे समय का गुंडा है। बाहुबली है। हुज़ूर के ख़िलाफ़ बोलने वाला बाग़ी है। हुज़ूर ही धर्म हैं, हुज़ूर ही राष्ट्र हैं, हुज़ूर ही विकास हैं। प्राइम टाइम के लॉक अप में विपक्ष होना अपराध है। विकल्प होना घोर अपराध है। तथ्य होना दुराचार है। सत्य होना पाप है। इसके बाद भी आप सभी ने एक न्यूज़ एंकर को पहले पुरस्कार के लिए चुना है यह इस बात का प्रमाण है कि दुनिया में (पुरस्कार देने का) जोखिम उठाने वाले अब भी बचे हुए हैं। हम आपके आभारी हैं। …

गांधीवादी, अंबेडकरवादी, समाजवादी और वामपंथी। आंधियां जब भी आती हैं तब इन्हीं के पेड़ जड़ से क्यों उखड़ जाते हैं। बोन्साई का बाग़ीचा बनने से बचिये। आप सभी के राजनीतिक दलों को छोड़कर बाहर आने से राजनीतिक दलों का ज़्यादा पतन हुआ है। वहां परिवारवाद हावी हुआ है। वहां कोरपोरेटवाद हावी हुआ है। उनमें सांप्रदायिकता स लड़ने की शक्ति न पहले थी न अब है। फिर उनके लिए अफसोस क्यों हैं। अगर ख़ुद के लिए है तो सभी को यह चुनौती स्वीकार करनी चाहिए। मैंने राजनीति को कभी अपना रास्ता नहीं माना लेकिन जो लोग इस रास्ते पर आते हैं उनसे यही कहता हूं कि राजनीतिक दलों की तरफ लौटिये। सेमिनारों और सम्मेलनों से बाहर निकलना चाहिए। सेमिनार अकादमिक विमर्श की जगह है। राजनीतिक विकल्प की जगह नहीं है। राजनीतिक दलों में फिर से प्रवेश का आंदोलन होना चाहिए। …

न्यूज़ रूम रिपोर्टरों से ख़ाली हैं। न्यूयार्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट में अच्छे पत्रकारों को भर्ती करने की जंग छिड़ी है जो वाशिंगटन के तहखानों से सरकार के ख़िलाफ़ ख़बरों को खोज लाएं। मैं न्यूयार्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट की बदमाशियों से भी अवगत हूं, लेकिन उसी ख़राबे में यह भी देखने को मिल रहा है। भारत के न्यूज़ रूम में पत्रकार विदा हो रहे हैं। सूचना की आमद के रास्ते बंद है। ज़ाहिर है धारणा ही हमारे समय की सबसे बड़ी सूचना है। एंकर पार्टी प्रवक्ता में ढलने और बदलने के लिए अभिशप्त है। वो पत्रकार नहीं है। सरकार का सेल्समैन है। .. प्रेस रिलीज तो पहले भी छाप रहे थे। फर्क यही आया है कि अब छाप ही नहीं रहे हैं बल्कि गा भी रहे हैं। यह कोई मुंबई वाला ही कर सकता है। चाटुकारिता का भी इंडियन आइडल होना चाहिए। पत्रकारों को बुलाना चाहिए कि कौन किस हुकूमत के बारे में सबसे बढ़िया गा सकता है। …

न्यूज़ चैनल और अख़बार राजनीतिक दल की नई शाखाएं हैं। एंकर किसी राजनीतिक दल में उसके महासचिव से ज़्यादा प्रभावशाली है। राजनीतिक विकल्प बनाने के लिए इन नए राजनीतिक दलों से भी लड़ना पड़ेगा। नहीं लड़ सकते तो कोई बात नहीं। जनता की भी ऐसी ट्रेनिंग हो गई है कि कई लोग कहने आ जाते हैं कि आप सवाल क्यों करते हैं। स्याही फेंकने वाले प्रवक्ता बन रहे हैं और स्याही से लिखने वाले प्रोपेगैंडा कर रहे हैं। पत्रकारिता का वर्तमान प्रोपेगैंडा का वर्तमान है। …”

(यह बातें वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने कुलदीप नैय्यर पुरस्कार समारोह में कही हैं)

Top Stories

TOPPOPULARRECENT