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म्यंमार हिंसा में मारे गए लोगों के बच्चों का ख्याल रखेगी सरकारी सामाजिक कल्याण एजेंसी

ये हालत भयावह ही कही जा सकती है जब करीब 1400 बच्चों ने अपने माता-पिता के बिना क्रूर सेना की दिक्कत से भाग कर किसी दूसरे देश में शरण लेने को मज़बूर हो गए। उनके माता-पिता या तो मारे गए या लापता हैं।

रशीद केवल 10 साल का है, लेकिन उनके छोटे कंधे पर भारी जिम्मेदारी हैं। उन्हें अपनी छह साल की बहन रशिदा की देखभाल करना होगा। वह कहते हैं, म्यांमार सेना ने उसके माता-पिता को मार दिया था। अब वो दोनों भाई-बहन अकेले हैं।

कॉक्स बाजार में कुटुपोलोंग शरणार्थी शिविर में बाल-फ्रेंडली स्पेस (सीएफएस) गतिविधि के साथ 60 से ज्यादा बच्चे खिलौने, रंगाई, ड्राइंग और खेल रहे हैं। इन सभी मासूमों के माता-पिता या परिवार वाले लापता हैं या मारे जा चुकें हैं।

वह अपने माता-पिता और छह भाई-बहनों के साथ 25 अगस्त तक मोंग्डा के शिकडरपारा गांव में रहते थे। जब सेना ने उनके घर पर हमला किया था जिसमें बड़े पैमाने पर हत्याएं और रोहिग्या के गांवों की जवानों को जलाया गया था। उस वक़्त उसने बताया की अपनी बहन के हाथ को पकड़ लिया और पास की पहाड़ी की ओर भाग गया। सेना के जाने के बाद, मैं ने देखा मेरे अपने माता-पिता को मार दिया गया था।

मीडिया सूत्रों के मुताबिक रोहिंग्या बच्चों के माता-पिता हिंसा में गायब हो गए हैं, उनका ख्याल सरकारी सामाजिक कल्याण एजेंसी रखेगी। यूएन के अधिकारी, रोहिंग्या मुसलमानों की तादाद से खासे ताज्जुब में हैं और हालात पर नजर बनाए हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 25 अगस्त को म्यांमार में हिंसा के बाद से करीब 4 लाख रोहिंग्या मुस्लिम बांग्लादेश में पलायन कर गए हैं।

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