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संदीप सिंह: यह कैसी गोरक्षा है भाड़े के देशभक्तों?

तुम कहते हो गाय हमारी माता है। और माता को खूँटे से बाँध कर रखते हो! कौन निर्दयी पुत्र है जो अपनी माँ को रस्से से बाँधकर रखता है?

माता दिन-रात गोबर और मूत्र में लटपटायी छटपटाती रहती है और तुम्हें तरस नहीं आता कि गौमाता को कम से कम दिन में एक बार स्नान तो करवा दो। गौ-माता का सारा दूध अपने लिए या बाज़ार में बेचने के लिए निकाल लेते हो! रिश्ते की नज़र से देखो तो बछड़ा या बछिया तुम्हारी ‘गौ-बहन और गौ-भाई’ ठहरे! पर तुम अपने भाई-बहन के हिस्से का दूध छीन लेते हो?

अरे ओ, निष्ठुर और ढोंगी हृदय, यह कैसा गौ-प्रेम है भाई?

बच्चा जन्मने के तीन महीनों बाद गौ-माता का दूध कम और ज़्यादा पतला होने लगता है। पर तुम उन्हें इंजेक्शन देकर ज़बरदस्ती उनका दूध निकालते हो! गाय को मारते हो, पीटते हो, एंटी-बायोटिक दवाइयों देते हो और किसी भी तरह से उनका दूध अपने फ़ायदे और इस्तेमाल के लिए निकाल ही लेते हो!

यह कैसी गौ-रक्षा है भाई?

आजकल खेती-किसानी में बैलों का रोल लगभग ख़त्म हो चुका है। सब काम मशीन और ट्रैक्टर से हो रहा है। बैलों और बछड़ों की कोई क़ीमत न रही। ज़्यादातर गौ-पालक बछड़ों को छः-आठ महीने का होते-होते बेच देते हैं। अपने रिश्ते के ‘गौ-भाई’ को कौन बेचता है जी? अपने बछड़ा ‘गौ-भाई’ को किस चीज़ के लिए बेचते हो? अश्वमेघ यज्ञ के लिए!

यह जो चमकती हुई चमड़े की जैकेट और लीकूपर का बढ़िया चमड़े का जूता दिखाकर दोस्तों में ऐंठ भरते हो कहीं इसमें तुम्हारे ‘गौ-भाई’ की खाल तो नहीं लगी? औ, चमड़े वाला बटुआ! ये कैसा गौ-प्रेम है भाई? कहते हो गौ-सेवा में तुम्हारी आस्था और श्रद्धा है।

ज़रा यह बताओं, जब ‘गौ-माता’ बूढ़ी हो चलती हैं। बच्चे देना, दूध देना सब बंद हो जाता है। तब उनके साथ तुम क्या करते हो? शहर में प्लास्टिक खाने के लिए छोड़ देते हो? या कूड़ा खाने के लिए? वानप्रस्थ आश्रम समझकर घर निकाला दे देते हो क्या? कहीं यह समझकर घर-निकाला तो नहीं देते हो कि माता अब चारों धामों की यात्रा पर निकली हैं! अपने बूढ़े माँ-बाप को इस तरह घर से कौन निकालता है ? यह कैसी आस्था और श्रद्धा है भाई?

तुम्हारे साबुन में पशुओं की चर्बी, जिसमें गाय भी शामिल है। तुम्हारे दवाई, कपड़े, जूते, बैग, टोपी, घड़ी और न जाने किस किस चीज़ में पशुओं का कुछ न कुछ शामिल है पर ऐसे भक्त बनोगे जैसे रंगा सियार भी न बनता होगा। लोगों को सड़क पर मार दोगे। घर में घुसकर मार दोगे। दुकाने बंद करवा दोगे, जला दोगे। ये अधिकार तुम्हें किसने दिया? अगर तुम मुस्लिमों से, ईसाइयों से, सिक्खों से, दलितों से, आदिवासियों से नफ़रत करते हो तो खुल कर करो। उनकी आर्थिक स्थिति बर्बाद करना चाहते हो। तो आओ, आमने-सामने आकर लड़ लो। लोग तुमसे निपट लेंगे।

क्योंकि तुम गीदड़ हो, एक तमाचे में चीं बोल दोगे। बीच में हमारी गाय को मत ले आओ। गाय तुम्हारी बपौती नहीं है। हुआं-हुआं बंद करो और हिम्मत है तो खुलकर बहस करो।

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