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धर्मयुद्ध में फंसे शिवपाल यादव

Uttar Pradesh Chief Minister Akhilesh Yadav along with his Uncle and PWD Minister Shivpal Singh Yadav at various scheems launch for Labours progrramme at his official residence in Lucknow on friday. Express photo by Vishal Srivastav 19.09.2014

सियासत संवाददाता लखनऊ: हर चुनाव में सभी राजनितिक पार्टियों को विरोध झेलना पड़ता हैं. कहीं कम या कहीं ज्यादा. भाजपा को इतना विरोध देखना पड़ा की उसके नेता प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्या की गाडी के आगे लेट तक गए, वाराणसी में उनसे धक्का मुक्की भी हुई. सपा में कल लोगो ने अखिलेश यादव और आज़म खान के आवास के बाहर प्रदर्शन किया.

लेकिन सबसे ज्यादा चिंता का विषय अखिलेश यादव के लिए हैं जिन्हें अपने घर से ही चुनौती मिल रही हैं. अखिलेश ने एटा में रैली में कहा भी उन्हें पता नहीं था कि कुर्सी के लिए अपनों से इतना लड़ना पड़ेगा. उन्होंने भीतरघातियो से सावधान रहने को भी कहा.

अखिलेश के सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं उनके चाचा शिवपाल यादव का विरोध. शिवपाल परसों अपने नामांकन के दौरान चुनाव बाद नयी पार्टी बनाने को कह चुके हैं. वहीँ अखिलेश ने लखनऊ में कह दिया की बहुत लड़ चुके अपनों से अब नहीं लड़ेंगे.

लेकिन शिवपाल के बयान ने सपा में हलचल पैदा कर दी हैं. शिवपाल का एलान अपने आप में महत्वपूर्ण हो जाता हैं क्योंकि वो यादव परिवार से हैं लेकिन आजकल हाशिये पर हैं. ऐसे हालात में चुनाव को वो रोज़ धर्मयुद्ध कह रहे हैं जिसमे अंत में अच्छाई की बुरे पर विजय होती है.

बहरहाल शिवपाल के बयान के बाद सपा में अखिलेश विरोधियों को एक नया ठिकाना मिल गया हैं. पिछली 17 जनवरी को अखिलेश के गृह जनपद इटावा में एक नया संगठन बना–मुलायम के लोग. ऐसे संगठन पहले भी बनते रहे हैं. समाजवादी चिन्तक जनेश्वर मिश्र ने दिल्ली में अपने घर पर लोहिया के लोग का बोर्ड टांग रखा था. वहीँ अभी अखिलेश ने जनेश्वर मिश्र-लोहिया के लोग नमक ट्रस्ट रजिस्टर्ड करवा ली हैं और बोर्ड पर लिख कर कार्यालय भी खोला हैं जहाँ से उनका चुनाव संचालित होता हैं. लखनऊ में माल एवेन्यू में राजनारायण की जमात का भी दफ्तर हैं.

लेकिन मुलायम के लोग जिसका दफ्तर इटावा में खुला वो अखिलेश विरोधियो के लिए नया ठिकाना बन गया. खुद शिवपाल वह जा चुके हैं. सपा विधायक रघुराज शाक्य भी पार्टी छोड़ कर वह जाते हैं. रोज़ संख्या बढ़ रही है.

अखिलेश की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई हैं लेकिन रामगोपाल ने इस डेवलपमेंट को कोई महत्व नहीं दिया हैं. ऐसा क्या ज़रूरी हो गया था, कि शिवपाल को नयी पार्टी बनाने का एलान चुनाव के दौरान करना पड़ा. ऐसा भी नहीं हैं कि वो अपना फैसला बदल नहीं सकते. शायद ऐसा इसीलिए हुआ की शिवपाल को खुद तो सपा ने टिकट दे दिया लेकिन उनके बहुत समर्थको का टिकट काट दिया. कई विधायक और मंत्री इस बार पैदल हो गए. ऐसे में अपने समर्थको को टॉनिक देना ज़रूरी हो गया था. ऐसे में नयी पार्टी का शगूफा ही उनको जोड़े रख सकता था वरना वो इधर उधर छिटक सकते थे.

दूसरी बात ये भी हैं की ऐसे लोग जो अखिलेश के फैसले से नाखुश हैं और उनकी संख्या काफी हो गयी हैं वो अगर किसी विपक्षी पार्टी से जुड़ गए तो नुक्सान सीधा सपा का होगा. इस लिए उनको नयी पार्टी का झुनझुना देकर फिलहाल रोक लिया गया हैं.

शिवपाल के लिए अब संघर्ष ही दिख रहा है. अगर अखिलेश फिर सरकार बनाते हैं तो उन्हें ओहिर संघर्ष करना और नए सिरे से अपने आप को स्थापित करना होगा. अगर अखिलेश की सरकार नहीं बनती हैं तो भी उनको अपने आपको प्रासंगिक रखना होगा. मतलब संघर्ष दोनों हाल में हैं. अब बेहतर होगा की यही संघर्ष अपने साथियो को लेकर अपनी पार्टी से किया जाये.

शिवपाल के पास अब विकल्प कम बचे हैं. पार्टी, सरकार्, संगठन सब से वो बेदखल हो चुके हैं. मामला अब आसान नहीं हैं. उनको जीत कर फिर से अपना साम्राज्य खड़ा करना होगा, जो आसान नहीं हैं. इधर उधर जाने से बेहतर नयी पार्टी बना ली और अगर ज़रुरत पड़े तो फिर सब एक हो जाये

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