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गुजरात टिफ़िन ब्लास्ट केस: जवाबदेह कौन ?

सीमा मुस्तफ़ा

नयी दिल्ली: “मत पूछिए यह 14 साल हमारे ऊपर कैसे गुज़रे और हमे कैसे अपराधियों की तरह महसूस कराया गया था,” अहमदाबाद टिफ़िन ब्लास्ट मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बरी किये गए हबीब हवा की बीवी ने कहा। वह बेहद मुश्किल से उस राहत को ज़बान देती है कि उसका पति जल्द ही उसके साथ होगा और कहा, “कृपया दुआ कीजिये कि अब हम आगे एक सामान्य जीवन जी सकें”।

अगर सुप्रीम कोर्ट न होता और जमीअत उलेमा-ए-हिन्द (अरशद मदनी) जैसे संगठन और उन वकीलों के समूह जिन्होंने हार नहीं मानी, अगर ये न होते तो पुलिस, प्रशासन और निचली अदालतों ने सैकड़ों मुस्लिम नौजवानों को फांसी के फंदे पर लटका दिया होता।

एक पैटर्न उभर रहा है: पहले एक आतंकी विस्फोट, इसके बाद पुलिस शहर के मुस्लिम इलाकों से सैकड़ों नौजवानों को उठाती है, फिर कुछ को छोड़ देती है और बाकि पर आतंक और अन्य मामलों के तहत मुकदमा दर्ज करती है। सालों तक जेल में रखने के बाद कुछ को बरी कर दिया जाता है और कुछ को निचली अदालतें फांसी तक की सज़ा देती हैं, किस्मत साथ रहती है तो सज़ा उम्रकैद की होती है। एक लम्बे अरसे बाद उच्च न्यायालय उन्हें बरी कर देते हैं।

उनकी ज़िन्दगीयां बर्बाद हो जाती हैं, उनके परिवार जो आमतौर पर मध्यम वर्गीय होते हैं वे बेसहारा हो जाते हैं, और जब वे जेल से बाहर आते हैं तब उनको कोई नौकरी नहीं देता। इसके लिए किसी को भी जवाबदेह नहीं ठहराया जाता। पुलिसकर्मी, जो  उन्हें गिरफ्तार करते हैं वे दंड मुक्त रहते हैं। उनको बेगुनाह होने के बावजूद जेल में रखने और उन पर हुए अत्याचार के लिए कोई मुआवज़ा नहीं दिया जाता। कोई पुनर्वास नहीं होता। उनको बरी कर दिया जाना ही उनके लिए सबसे बड़ा मुआवज़ा माना जाता है, और ज़्यादातर समय वे बहुत आभारी रहते हैं और अन्दर से टूटे रहते हैं। ज़्यादातर समय वे चाहते हैं कि चुप रहे हैं और जितना हो सके पुलिस और कानून से दूर रहे अगर उन्हें अनुमति मिले।

बुधवार को, सुप्रीम कोर्ट ने चार मुस्लिम आदमियों को बरी किया – इन लोगों को अहमदाबाद टिफ़िन बम ब्लास्ट केस में 14 साल से जेल में रखा गया था। 29 मई 2002 में, म्युनिसिपल कारपोरेशन की बसों में पांच बम रखे गए थे। इनमें से दो फटे नहीं और तीन के फटने से अलग अलग बसों में 11 लोगों को मामूली चोटें आई थी। यह उस व्यापक हिंसा के बाद हुयी जिसमें 2000 से ज़्यादा लोगों की मौत हुयी थी।

शुरुआत में कोई कार्यवाई नहीं की गयी थी। इस केस को बाद में क्राइम ब्रांच को स्थानांतरित कर दिया गया जिसने 21 मुस्लिम लड़कों को गिरफ्तार किया। चार को शुरुआत में ही छोड़ दिया गया था। 12 मई, 2006 को 12 और लड़कों को स्पेशल पोटा कोर्ट ने बरी कर दिया। निचली अदालत ने उनमें से पांच को 10 साल की कैद की सज़ा सुनाई। 24 जनवरी 2011 को उच्च न्यायालय ने उनमें से एक लड़के को बरी कर दिया और बाकि चार की सज़ा को दस साल से बढ़ा कर उम्र कैद कर दिया।

यह सभी लोग गरीब थे और कानूनी सहायता लेने के काबिल नहीं थे। अरशद मदनी जो लम्बे समय से देश भर में जेलों में बंद ऐसे लोगों को कानूनी सहायता प्रदान करने का काम कर रहे हैं, उन्होंने इन लोगों के लिए केटीएस तुलसी, कामिनी जायसवाल, गौरव अग्रवाल, एजाज़ मकबूल और कुछ दूसरे वकीलों को सुप्रीम कोर्ट में लगाया। बुधवार को उनकी कोशिशें रंग लायी, जब जस्टिस पिंकी घोष और आर ऍफ़ नरीमन की सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने दो लोग – हनीफ पाकिटवाला और हबीब हवा को बिना किसी चार्ज के बरी कर दिया और दो अन्य कलीम करीमी और अनस माचिसवाला की सजा घटा कर उनको भी रिहा करने का आदेश जारी किया।

इस दौरान उनके परिवारों ने  – तयशुदा पैटर्न के मुताबिक – बदतरीन मुश्किलों को झेला। पाकिटवाला का एक छोटा सा स्कूल बैग बनाने का कारखाना था, जो अब लगभग ख़तम हो चुका है। इस 14 सालों में उसकी माँ की मौत हो गयी। उसकी बीवी, चीज़ों को नहीं संभाल पाई और उसकी भी मौत हो गयी। उसकी बहन ने उसके तीन छोटे बच्चों को अपने पास रख लिया और उनकी देखभाल करने लगी, लेकिन कुछ दिन पहले उसकी भी मौत हो गयी। उसे अब जेल की बाकि कार्यवाई पूरी करने के बाद अन्य लोगों के साथ रिहा कर दिया जायेगा, जिसमें लगभग एक हफ्ता लगेगा।

पुलिस कस्टडी में जो यातनाएं दी जाती हैं वे अब स्थापित हो चुकी हैं, कौन सरकार सत्ता में इससे फर्क नहीं पड़ता। मुस्लिम युवा जिन्हें गिरफ्तार किया गया और सालों बाद बरी कर दिया गया, वे इन सब अत्याचारों और उत्पीड़न से महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और कर्नाटका में भी उस वक़्त दो-चार हुए जब वहां कांग्रेस की सरकार थी। आतंकी हमलों के बाद जल्द कार्यवाई के प्रेशर में, पुलिस बिना कुछ सोचे मुस्लिम लड़कों को उठा लेती है। उनका उत्पीड़न करने के बाद, और जेल में बंद करके छोड़ने के बाद उन्हें उन्ही के भरोसे खुद को बरी कराने के लिए छोड़ देते हैं। जो ज़्यादातर नहीं करा सकते।

वरिष्ठ वकीलों ने इस लेखिका को बताया कि पहले अनपढ़, गरीब मुसलमान लड़कों से शुरू कर पुलिस ने अब पढ़े लिखे प्रोफेशनल लड़कों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। टिफ़िन ब्लास्ट केस में बरी हुए लोगों में से एक हनीफ हवा पेशे से इलेक्ट्रीशियन है, उसके पिता को रिटायरमेंट छोड़ कर ज़रूरी खर्चों को पूरा करने के लिए फिर से नौकरी करनी पड़ी। जैसा वकील कहते हैं,”ये लड़के अब नौकरी के लायक नहीं रहे, कोई इन्हें नौकरी नहीं देगा, और कई बार उनके परिवारों को अपने घर भी छोड़ने पड़ते हैं।”

2007 में हैदराबाद में मक्का बम ब्लास्ट के बाद, पुलिस ने 100 से ज़्यादा लड़कों को उठाया था। कुछ दिनों की पूछताछ और उत्पीड़न के बाद बैच बनाकर लड़कों को छोड़ा गया जब तक 20-25 लड़के नहीं रह गए। इन लड़कों पर अत्यधिक अत्याचार किया गया। इनके शरीर पर रोलर चलाये गए, उनके तलवे पीटे गए जब तक उनसे खून नहीं निकला और वे फटे नहीं, उनके गुप्तांगों पर बिजली के झटके दिए गए – इन सब अत्याचारों का विवरण इस लेखिका ने और हैदराबाद के नागरिक अधिकार निकायों द्वारा दर्ज किये गए थे। इस लेखिका ने इन युवाओं और उनके परिवारों, जो बेहद तनाव में थे, उनके साक्षात्कार लिए थे। बाद में तत्कालीन गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे अधिकारिक तौर पर इस आतंकी घटना आरएसएस के कार्यकर्ताओं का कारनामा बताया था।

लेकिन इन लड़कों की ज़िन्दगी तबाह हो चुकी है। इन्हें इनकी ज़िन्दगी आसानी वापस नहीं मिल पायेगी। एक जो ऑटोरिक्शा चलाता था उसे उसकी नौकरी नहीं मिल पायेगी। जो एक सेल्समेन की तरह काम करता था वह अब सालों से बिना किसी काम के है। उसने यह भी बताया कि उसे हर हफ्ते पुलिस थाने में पेश होना पड़ता है और पुलिस वाले इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि उसका वह दिन अच्छा न जाए।

“मुझे हर हफ्ते इसके लिए छुट्टी कौन देगा,” उसने कहा। उसने यह भी कहा कि जैसे किसी भी काम देने वाले को पता चलेगा की वह जेल जा चुका है तब वह उसके लिए अपने दरवाज़े बंद कर देगा। परिवारों को भी कई बार आस-पड़ोस के लोगों के तानों से बचने के लिए घर बदलने पड़ते हैं।

हवा की पत्नी ने दा सिटीजन से बातचीत में बताया, “मैं क्या उदाहरण दूँ। यह बताना बेहद मुश्किल है कि हमने किन हालातों का सामना किया है। यह हम ही जानते हैं कि हमने कैसे वक़्त गुज़ारा है।”

मुआवज़ा? जिन परिवारों से हमने बात की वे इसके बारे में सोच भी नहीं रहे हैं, वे सिर्फ चाहते हैं कि उन्हें फिर से एक सामान्य ज़िन्दगी गुज़ारने दी जाए।

 

साभार – “The Citizen”

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