Tuesday , July 25 2017
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VIDEO: शब-ए-बरात की मनगढ़ंत बातें

याद रहे बिदअत गुनाहे कबीरा (सबसे बडा गुनाह) है। बिदअत से शैतान खुश होता है और अल्लाह की नाराज़गी हासिल होती है। बिदअत का रास्ता जहन्नुम की तरफ़ जाता है। लिहाज़ा तमाम मुसलमानों को बिदआत से बचना चाहिये।

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पन्द्र्ह शाबान को लोग “शब-ए-बारात” मान कर जगह-जगह, चौराहों, गली-कूचों में मजलिसें जमातें और झूठी रिवायात ब्यान करके पन्द्र्ह शाबान की बडी अहमियत और फ़ज़ीलत बताते हैं।

मस्जिदों, खानकाहों वगैरह में जमा होकर या आमतौर से सलातुल उमरी सौ रकआत (उमरी सौ रकआत), नमाज़ सलाते रगाइब (रगाइब की नमाज़), सलातुल अलफ़िआ (हज़ारी नमाज़) सलाते गोसिया (शेख अब्दुल कादिर जिलानी रह०) के नाम की नमाज़ अदा करते हैं।

पन्द्रह शअबान की रात को “ईदुल अम्वात” (मुर्दों की ईद) समझ कर मुर्दों की रुहों का ज़मीन पर आने का इन्तिज़ार करते हैं। कहते है कि जंगे उहद में अल्लाह के नबी PBUH का दांत टूट गया था तो आपने हलवा खाया था इसलिये शब-ए-बरात के दिन हलवा खाना सुन्नत है।

अल्लाह के नबी PBUH का दांत टूटना जिहाद में, और लोगों का हलवा खाना अपने घरों में, जिहाद और जंग की सुन्नत रसूल PBUH अदा करें और हलवा खाने की सुन्नत हम अदा करें???

कहा जाता है कि एक बुज़ुर्ग उवैस करनी को जब मालुम हुआ कि आप सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का दांत-ए-मुबारक शहीद हो गया तो उन्होने अपने दातों को पत्थर से तोड डाला और फ़िर उन्होने हलवा खाया लिहाज़ा ये उनकी सुन्नत है। दांत तोडने का झूठा वाकया उनसे मन्सूब करके नकल कर दिया गया। फ़िर अपने दांतों को तोडना खुदकुशी की तरह है। आप सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने मुंह पर तमाचें मारने से मना फ़रमाया है (इब्ने माज़ा) तो मुंह पर पत्थर मारना कैसे जायज़ होगा???

कहा जाता है कि जिसका अज़ीज़ इस साल मर गया हो तो “अरफ़ा” करे यानी शबे-बारात से एक रोज़ पहले हलवा पकाकर नियाज़ फ़ातिहा दिला दें इस तरह इसका साल का नया मुर्दा बरसों पुराने मुर्दों में शामिल हो जायेगा। ये बात भी मनगढंत है।

एक हदीस में नबी PBUH ने फ़रमाया कि “दीन के अंदर नई नई चीजें दाखिल करने से दूर रहो, नि संदेह हर नई चीज़ बिदअत है और हर बिदअत गुमराह है” (अबू दाउद, किताब अल सुन्नह-7064)

एक और हदीस की रिवायत है कि किसी भी बिदअत को छोटा न समझो नब़ी PBUH ने बिदअत करने वालों के बारे में कहा है कि वह हम में से नहीं, फ़रमाया “जिसने हमारे दीन में कोई नई चीज़ इजाद की जिसका दीन से कोई संबंध नहीं वह मरदूद है” (सही बुखारी-2697)

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