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सिर्फ नाहर की खातिर नरेन्द्रो ने इस्लाम कुबूल किया

मैंने अक्सर लोगों से सुना था कि मजहब प्यार को बांट देता है और मैं इस तथ्य से हमेशा परेशान रहता था लेकिन जब मैंने इश्क़जादे फिल्म देखी तो कभी भी ऐसा नहीं माना जो फिल्म के निर्देशक ने बड़ी स्क्रीन पर बताने की कोशिश की थी। जोया और परमा का हकीकी दुनिया के साथ संबंध होने की कोई संभावना नहीं थी। मुझे नहीं लगता था कि यह यथार्थवादी था।

 

 

 

मेरा मानना ​​कभी नहीं था कि यह एक ऐसी फिल्म हो सकती है जिसकी कहानी में मैं अपना अपने किरदार को देख रहा था। चाहे वह अल्लाह, राम या यीशु कोई भी हो, उन्होंने हमें प्रेम के सिद्धांतों को सिखाया है कि जो हकीकत में एक दूसरे को स्वीकार करते हैं ऐसी दो आत्माओं को एकजुट होना होगा। नरेन्द्रो और नाहर की कहानी में भी कुछ ऐसा ही है।

 

 

हिंदू युवक नरेन्द्रो मोंडोल को नाहर नाम की मुस्लिम लड़की से प्यार हो गया। नरेन्द्रो ने कहा, दोनों के घर वालों ने इस प्यार को खत्म करने के लिए बहुत अत्याचार किये। उन्होंने हमें हर दिन परेशान किया। इस से आहत नाहर ने आत्महत्या कर ली। मैंने कम से कम एक बार उसको देखने की उसके परिवार वालों से गुहार लगाई लेकिन उन्होंने नहीं सुनी।

 

 

 

उसकी मौत के बाद नरेन्द्रो ने इस्लाम कुबूल कर लिया और अल्लाह से नियमित रूप से दुआ करता है क्योंकि वह नाहर के चले जाने के बाद उसको दुखी नहीं देखना चाहता। मुझे आश्चर्य है कि नाहर का अल्लाह पर विश्वास उसके अलगाव का कारण क्यों बना? यह उसके प्यार की ताकत थी कि नोरेन्द्र को इस्लाम में आने का मौका मिला।
बकौल नरेन्द्रो मोंडोल (अब्दुर रहमान) पंद्रह साल हर दिन धर्म को लेकर मुश्किलों का सामना करना पड़ा। जब भी मैं सुबह सोकर उठता तो जानना चाहता था कि नाहर जीवित है या नहीं। मेरा परिवार नाहर को मारना चाहता था और उसका परिवार मुझे मारना चाहता था। हर कोई हमें अलग करना चाहता था लेकिन नाहर की दुआएं हमारे प्यार को जिंदा रखने के लिए थीं।

 

 

 

मैं हिंदू था और वह एक मुसलमान थी। बचपन से ही हम एक दूसरे को प्यार करते थे। घर वालों ने हमें हमारे प्यार को खत्म करने के लिए अत्याचार किया। उन्होंने हमें हर रोज परेशान किया। नाहर कहती थी कि वह अल्लाह से दुआ कर रही थी ताकि एक दिन सभी हमारे प्यार को स्वीकार करें। उसके जीवन का एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरा जिसमें उसने दुआ ना की हो।

 

 

 

जब भी मैंने उससे पूछा कि क्या वह हकीकत में अल्लाह से दुआ करती है तो उसने हमेशा कहा कि वह हमारे प्यार को कुबूल करने के लिए दुआ करती है। मैंने चार महीने पहले अपने को गांव छोड़ दिया था। मैं कई अलग-अलग स्थानों पर रहा। मुझे नाहर के मृत शरीर को देखने नहीं दिया।

 

 

 

उन्होंने मुझे उसे एक बार देखने की अनुमति नहीं दी। वे खुश थे क्योंकि उन्होंने सोचा कि हम एक-दूसरे को नहीं मिले लेकिन वे नहीं जानते थे कि मैं उसे लगातार देख रहा हूं। उन्हें यह नहीं पता है कि मृत्यु के बाद से नाहर मेरे साथ रह रही है। उस रात मैं एक पुल के नीचे बैठा नाहर से बात कर रहा था और फिर मैंने देखा कि नाहर बहुत दुखी थी।

 

 

 

मैंने उससे पूछा कि क्या हुआ, उसने मुझसे कहा कि वह बहुत दुखी महसूस कर रही है क्योंकि वह अब हमारे प्यार के लिए दुआ नहीं कर सकती। मैंने उसकी आँखों और चेहरे पर दर्द देखा। उसके अगली सुबह मैंने इस्लाम कुबूल कर लिया। मैं नहीं जानता कि अल्लाह मेरी दुआ कबूल करेगा या नहीं, लेकिन मैं अपने प्यार के लिए दुआ कर रहा हूं।

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