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देश के सभी धार्मिक समुदायों में से मुसलमान सबसे ज्यादा गरीब क्यों हैं ?

PC: Reuters

रमजान का महीना चल रहा है. मुसलमान बड़े पैमाने पर नमाज और रोजों की पाबंदी कर रहे हैं. मस्जिदें आबाद हैं. नमाजि‍यों से खचाखच भरी हुई हैं. देश में अमन-सुकून के साथ ही मुसलमानों की गुनाहों की माफी के साथ ही उनकी रोजगारी और तरक्की की दुआएं मांगी जा रही हैं.

मुस्लिम बहुल इलाकों में बाजारों की रौनक देखते ही बनती है. रमजान में इन इलाकों में लगभग रातभर ही बाजार खुलते हैं. देशभर से मुस्लिम इलाकों की ऐसी ही तस्वीरें सामने आती हैं. ईद-उल-फितर के मौके पर इन इलाकों की रौनक देखकर कभी-कभी शक होता है कि क्या यह वही कौम है, जिसके बारे में 10 साल पहले सच्चर कमेटी ने कहा था कि देश में मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर है.

देश की जनसंख्या के 2011 के आंकड़े बताते हैं कि मुसलमान रोजगार के मामले में देश के अन्य धार्मिक समुदायों में सबसे पीछे हैं. जहां 33 फीसदी मुसलमानों को ही रोजगार मिला हुआ है, वहीं जैन और सिख समुदायों के 36 फीसदी लोगों को रोजगार मिला हुआ है. हिंदू समुदाय को 41 फीसदी और बौद्ध समुदाय के 43 फीसदी लोगों को रोजगार मिला हुआ है.

  • देश में 33 फीसदी मुसलमानों को ही रोजगार मिला हुआ है
  • शहरी इलाकों में हर 10 में से 3 मुसलमान गरीबी रेखा से नीचे
  • मुस्लिस समुदाय में सबसे ज्यादा 3 फीसदी बाल मजदूर
  • देश में हर साल करीब 30 से 40 हजार करोड़ रुपये की जकात निकलती है
  • जकात की बड़ी रकम माफिया हड़प लेते हैं
  • जकात सही लोगों तक पहुंचाना जकात देने वालों की जिम्मेदारी
  • जकात के मकसद और तरीके का कुरआन में साफ जिक्र

हर 4 में से 1 मुसलमान गरीब

नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया के अध्ययन के मुताबिक, प्रत्येक 4 में से एक मुसलमान गरीब है. देश के सभी धार्मिक समुदायों में मुसलमान सबसे ज्यादा गरीब हैं. उनकी स्थिति दलितों और आदिवासियों के मुकाबले थोड़ा बेहतर है.

नेशनल काउंसिल फॉर अप्‍लायड इकोनॉमिक रिसर्च के अध्ययन के मुताबिक, शहरी इलाकों में हर 10 में से 3 मुसलमान गरीबी रेखा से नीचे हैं. उनकी औसत मासिक आमदनी 550 रुपये है. ग्रामीण इलाकों में हालात और भी बुरे हैं. हर पांचवां मुसलमान गरीबी रेखा से नीचे औसतन 338 रुपये मासिक आमदनी पर गुजर बसर कर रहा है. देश की आबादी में छोटी आबादी वाला सिख जहां 53 रुपये रोज खर्च करता है, वहीं मुसलमान महज 32.7 रुपये ही खर्च कर पाता है.

राष्ट्रीय सैंपल सर्वे ऑफिस के मुताबिक, 2009-10 में मुस्लिम समुदाय का प्रति व्यक्ति मासिक खर्च 980 रुपये था, जबकि सिख समुदाय का सबसे अधिक 1659 रुपये था. बाकी धार्मिक समुदायों का भी इसी के आसपास रहा. ये रिपोर्ट बताती है कि देश में मुस्लिम समुदाय गरीबी और आर्थिक तंगी के बेहद मुश्किल दौर से गुजर रहा है.

सर्वे के मुताबिक, देश में एक औसत मुस्लिम परिवार की सालाना आमदनी 28,500 रुपये थी, जो कि दलित और आदिवासियों के मुकाबले बस थोड़ी-सी ही ज्यादा है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक, देश में गरीबी धीरे-धीरे कम हो रही है, लेकिन अफसोस की बात है कि मुस्लिम समुदाय में गरीबी कम होने की रफ्तार बहुत धीमी है.

2004-05 के मुकाबले 2009-10 के सर्वे में जहां हिंदू समुदाय में गरीबी 52 फीसदी की रफ्तार से कम हुई है, वहीं मुस्लिम समुदाय में इसकी रफ्तार सिर्फ 39 फीसदी है.

तमाम सरकारी आंकड़े बताते है कि गरीबी की वजह से पूरे मुस्लिम समुदाय के विकास पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है. मुस्लिस समुदाय में सबसे ज्यादा 3 फीसदी बाल मजदूर पाए जाते हैं. इस समुदाय के 6 से 17 साल की उम्र के 28.8 फीसदी बच्चे स्कूल का मुंह तक नहीं देख पाते.

सच्‍चर कमेटी की सिफारिशों का क्‍या हुआ?

10 साल पहले आई सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने देश में मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक हालत सुधारने के लिए 76 सिफारिशें की थीं. इनमें से तत्कालीन यूपीए सरकार ने 2008 में 43 सिफारिशें मंजूर करते हुए देशभर में इन्हें लागू करने के लिए 3800 करोड़ रुपये का बजट दिया था.

पहले इन सिफारिशों को देश के 90 मुस्लिम बहुल आबादी वाले जिलों में लागू करने के लिए मल्टी सेक्टोरियल डेवेलपमेंट प्लान (एमएसडीपी) तैयार किया गया. बाद में इसे ब्‍लॉक स्तर लागू कराने की कोशिश की गई. नौ साल में ये प्लान ढाई कदम भी नहीं चल पाया है.

अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय का सालान बजट 3700 करोड़ रुपये है. इसमें मंत्रालय देश के 6 अल्पसंख्यक समुदायों के विकास के लिए काम करता है. इनमें ज्यादातर स्कूली छात्रों को मिलने वाली स्‍कॉलरशिप पर ही खर्च होता है. केंद्र सरकार ने पिछले साल मदरसों के आधुनिकीकरण के लिए 100 करोड़ रुपये का बजट रखा था. मुसलमानों के विकास के लिए सरकार के पास किसी भी मद में 1000 करोड़ रुपये से ज्यादा का बजट नहीं होगा. मुसलमान हर केंद्र सरकार और हर राज्य सरकार के खिलाफ रोना रोते रहते हैं कि वो उनके लिए कुछ नहीं कर रहीं.

अपने लिए क्‍या कर रहा है मुस्‍ल‍िम समुदाय?

अब हम बात करते हैं मुसलमान खुद अपने लिए क्या कर रहे हैं. मुस्लिम समाज में हर साल अल्लाह के नाम पर दिए जाने वाले हजारों करोड़ रुपये का दान निकलता है. अगर समाज में गरीबी जस की तस बनी हुई है, तो सवाल पैसा होता है कि अमीर मुसलमानों की तिजोरियों से जकात, खैरात, फितरे और सदके के नाम पर निकलने वाला हजारों करोंड़ रुपये का दान कहां जा रहा है? ये पैसा मुस्लिम समाज को आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक रूप से मजबूत बनाने के लिए क्यों इस्तेमाल नहीं हो पा रहा?

मुंबई में ऑल इंडिया काउंसिल ऑफ मुस्‍ल‍िम इकोनॉमिक अपलिफ्टमेंट से जुड़े डॉ. रहमतुल्ला के मुताबिक, देशभर में हर साल करीब 30 से 40 हजार करोड़ रुपये की जकात निकलती है. लेकिन जकात की बड़ी रकम गरीब मुसलमानों तक पहुंचने की बजाय जकात माफियाओं के पेट में चली जाती है. जकात निकालने वाले अमीर मुसलमान खुश होते हैं कि उन्होंने ऐसा करके अपना फर्ज पूरा कर दिया. लेकिन हकीकत ये है कि देशभर में मदरसों से जुड़े लोग यतीम बच्चों के नाम जकात इकट्ठा करके ले जाते हैं. बाद में यही पैसे यतीम बच्चों से अपने नाम कराकर उसे अपनी निजी संपत्ति में जोड़ लेते हैं.

जकात माफिया का जाल देशभर में फैला हुआ है. इनकी नजर मजहबी तौर पर जज्‍बाती लोगों पर होती है. खासकर ऐसे लोगों पर, जिनके पास गलत तरीके से कमाया हुआ पैसा भी होता है. आमतौर पर इन्हें इस बारे में जानकारी नहीं होती कि जकात को लेकर इस्लामी नियम क्या हैं.

इस बारे में कुरआन क्या कहता है. जकात किसे देनी चाहिए और कितनी देनी चाहिए. सही जानकारी के अभाव में उन्हें जकात माफियाओं की बताई बातों पर ही यकीन करना होता है.

जकात माफिया बिगाड़ रहे हैं सिस्‍टम

ऐसे अमीर मुसलमानों को जन्नत के सब्जबाग दिखा कर ये जकात माफिया और उनके कमीशन एजेंट उनसे यतीम बच्चों के नाम पर सालाना चंदा वसूलते हैं. इस चंदे को मदरसों में यतीम बच्चों को दिया जाता है और बाद में उनसे उन्हीं पर खर्च करने के लिए ले लिया जाता है. हालांकि इस्लाम में यतीमों का माल गलत तरीके से खाने की सख्त मनाही है, लेकिन मजहब की आड़ में ही जकात हड़पने का ये गोरखधंधा देशभर में चल रहा है. आम मुसलमान भी इससे वाकिफ हैं, लेकिन समाज और मजहब की बदनामी के डर से आवाज उठाने से डरते हैं.

मुंबई, हैदराबाद और बेंगलुरु में कई मुस्लिम संगठन जकात फंड इकट्ठा करके जरूरतमंद गरीब मुस्लिम स्टूडेंट्स को उनकी मेडिकल कॉलेज या फिर इंजीनियरिंग कॉलेज की फीस मुहैया कराने का काम कर रहे हैं. लेकिन इन्हें जकात फंड जुटाने में काफी दिक्‍कतों का सामना करना पड़ता है. दिल्ली में जकात फाउंडेशन ऑफ इंडिया नाम का संगठन चलाने वाले पूर्व आईआरएस अधिकारी जफर महमूद भी कहते हैं कि लोग उन्हें जकात का पैसा देने में आनाकानी करते हैं. हालांकि उनका संगठन एक अंग्रेजी माध्यम का स्कूल चलाता है और यतीम बच्चों के लिए उन्होंने हैप्पी होम भी खोला हुआ है.

दरअसल मजहबी रहनुमाओं ने मुसलमानों के दिमाग में ये बात कूट-कूटकर भर दी है कि जकात के पैसे का इस्तेमाल सिर्फ दीनी तालीम हासिल करने वाले यतीम बच्चों की परवरिश और उनकी तालीम पर ही होना चाहिए.

यही वजह है कि ज्यादातर मुसलमान मदरसे चलाने वालों को ही अपनी जकात का पैसा देना बेहतर समझते हैं. ऐसे में वो तमाम यतीम बच्चे, विधवा औरतें, मोहताज और ऐसे लोग महरूम रह जाते हैं, जिन्हें प्राथमिकता के तौर पर जकात का पैसा मिलना चाहिए.

जकात का मकसद क्‍या है?

यहां ये जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर जकात है क्या और इसका मकसद क्या है. कुरआन मुसलमानों को समाज के कमजोर तबकों की मदद का आदेश देता है.

सूराः अल-बकर की आयत नं. 177 में कहा गया है, ‘‘नेकी यह नहीं है कि तुम अपने मुंह पूरब या पश्चिम की तरफ कर लो. बल्कि नेकी तो यह है कि ईमान लाओ अल्लाह पर और कयामत के दिन पर और फरिश्तों पर, किताबों पर और पैगंबरों पर. अपने कमाए हुए धन से स्वाभाविक मोह होते हुए भी उसमें से अल्लाह के प्रेम में, रिश्तेदारों, अनाथों, मुहताजों और मुसाफिरों को और मांगने वालों को दो और गर्दन छुड़ाने में खर्च करो. नमाज स्थापित करो और जकात दो. जब कोई वादा करो, तो पूरा करो. मुश्किल समय, कष्ट, विपत्ति और युद्ध के समय में सब्र करें. यही लोग हैं, जो सच्चे निकले और यही लोग डर रखने वाले हैं.’’

यहां गर्दन छुड़ाने से तात्‍पर्य लोगों को गुलामी से आजाद कराने और कर्ज में डूबे हुए ऐसे लोगों को कर्ज चुकाने में मदद करने से है, जो अपनी सीमित आमदनी में कर्ज चुका पाने में सक्षम नहीं हैं. कुरआन में कई और भी जगहों पर ऐसी नसीहतें दी गई हैं. इसका मकसद समाज में अमीरी-गरीबी के फर्क को मिटाना है.

दरअसल, इस्लाम ने अमीर लोगों की आमदनी में एक हिस्से पर पर समाज के गरीब, मजबूर, लाचार, मोहताज और समाज के सबसे निचले पायदान पर जिंदगी गुजर-बसर करने वालों का हक तय कर दिया है. सदका, फितरा खैरात और जकात के जरिए ये हक अदा करने का हुक्म दिया है.

हुक्‍म ये भी दिया है कि मदद इस अंदाज में की जाए कि मदद करने वाला अहसान न जताए और मदद लेने वाले के आत्म सम्मान को भी ठेस न पहुंचे. साहिब-ए-निसाब पर जकात फर्ज है.

कैसे करें जरूरतमंदों की मदद

साहिब-ए-निसाब ऐसा व्यक्ति होगा, जिसकी सालाना बचत 75 ग्राम सोने की कीमत के बराबर हो. उसे अपनी कुल बचत का 2.5 फीसदी जकात के तौर पर देना होता है. इसका सही तरीका यह है कि अमीर लोग सबसे पहले अपने गरीब रिश्तेदारों की तरफ मदद का हाथ बढ़ाएं, फिर अपने पड़ोसियों और दोस्तों में उन लोगों की मदद करें, जो आपकी मदद के मुस्तहिक हैं.

ऐसे लोगों की भी जकात और सदके से मदद की जा सकती है, जो कभी अमीर थे, लेकिन बुरे वक्त की मार ने उन्हें आर्थिक तंगी में धकेल दिया है. ऐसे लोग शर्म के मारे हाथ नहीं फैलाते. मांगने वालों और समाज में कमजोर तबकों के उत्थान के लिए काम करने वाले संगठनों को भी मदद की जा सकती है.

 जकात का पैसा सही लोगों तक पहुंचाना भी जकात देने वालों की ही जिम्मेदारी है. ऐसे में मुसलमानों को जकात माफिया के चंगुल से निकलकर अपनी मेहनत की कमाई की जकात कुरआन के आदेशों का पालन करते हुए अपने नजदीकी रिश्तेदारों, दोस्तों, पड़ोसियों और ऐसे परिचितों की मदद में खर्च करना चाहिए, जिनके हालात से वो अच्छी तरह वाकिफ हैं.

भारत के अमीर मुसलमान अगर अपनी जकात को ईमानदारी से सही लोगों तक पहुंचाएं, तो कुछ दशकों में ही मुस्लिम समाज की गरीबी दूर हो सकती है. इससे देश में गरीबी का ग्राफ नीचे लाने में भी मदद मिलेगी.

साभार: द क्विंट

  • Dr M Ismaeel Khan

    Zakat is may be one reason. But main reason is not getting govt jobs.
    The youths who drop outs from school just after high school or 12th if got job in clerical or police or army. It will help in an effective way.

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