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PM मोदी ने ट्रंप के सामने क्यों नहीं कहा- अमेरिका के इस नियम से भारतीय IT सेक्टर बर्बाद हो जाएगा

जिस डिजिटल क्रांति की कसमें खा-खा कर पीएम नरेंद्र मोदी का गला सूख जाता है। उसकी बेहतरी के लिए कदम उठाने से ऐन वक्त पर उन्होंने पांव वापस खींच लिए। पीएम के लिए अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान एच वन-बी वीजा मुद्दा उठाने का अच्छा मौका था।

लेकिन ट्रंप नाराज न हो जाएं इसलिए उन्होंने इसका जिक्र ही नहीं किया। पिछली अमेरिकी यात्रा में मोदी ने भारतीय आईटी पेशेवरों की खूब तारीफ की थी और कहा था कि भारत ही नहीं अमेरिका की तरक्की में भी इनका जबरदस्त योगदान है।

जुकरबर्ग से लेकर सुंदर पिचई और सत्या नडेला का उदाहरण देकर और उनकी शोकेसिंग कर पीएम यह बताने में लगे थे- देखो भारत की आईटी क्रांति। देखो भारत की डिजिटल ताकत।

लेकिन इस बार की यात्रा में उनके मुंह से भारत की इस क्रांति की तारीफ में बोल नहीं फूटे। और तो और वह अपने सबसे अच्छे दोस्त कहे जाने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति के सामने यह सवाल भी नहीं उठा पाए कि अगर एच1बी वीजा से जुड़े नियम कड़े कर दिए गए तो भारतीय आईटी इंडस्ट्री का क्या होगा। क्योंकि भारतीय आईटी सेवाओं का सबसे बड़ा ग्राहक तो वही है।

जबकि हर किसी को पता है कि भारतीय आईटी उद्योग इस वक्त गहरे संकट से जूझ रहा है। भारतीय आईटी कंपनियां तमाम तरह की चुनौतियों से घिरी है और उनका मुनाफा घट रहा है। साथ ही लाखों नौकरियां पैदा करने की क्षमता वाले इस उद्योग की रौनक घटने की वजह से देश में पहले से ही बढ़े हुए बेरोजगारी के संकट के और गहरा होने की आशंका पैदा हो गई है।

इस बीच, अमेरिकी श्रम मंत्री अलेक्जेंडर एकोस्टा ने एच1बी वीजा धारक विदेशी पेशेवरों का न्यूनतम वेतन बढ़ा कर 60,000 से 80,000 डॉलर करने को कहा है।

अमेरिका में रह रहे भारतीयों के लिए यह एक बड़ा झटका होगा क्योंकि वेतन बढ़ने के साथ ही अमेरिका से ऐसे कई भारतीय पेशेवर बाहर हो जाएंगे जिनकी सैलरी इस सीमा से नीचे होगी।

एकोस्टा ने संसदीय समिति से कहा है कि वेतन बढ़ाने से एच1बी वीजा पर अमेरीकियों कर्मचारियों के स्थान पर विदेश से आने वाले कर्मचारियों की नियुक्ति की समस्या काफी हद तक हल हो जाएगी।

साफ है कि अमेरिकी प्रशासन एच1बी वीजा से जुड़े नियमों को और सख्त बनाने की ताक है। और अमेरिका को अपना सबसे अच्छा दोस्त बताने वाले भारत के पीएम मोदी इस मामले को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के सामने रखने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे हैं। वह भी तब जब भारत में वह रात-दिन डिजिटल क्रांति का सपना देख रहे हैं।

साभार-सबरंग

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