Thursday , February 22 2018

Ghazal

उर्दू हेरिटेज फेस्ट: कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में क़व्वाली ने दर्शकों में बाँधा समां!

नई दिल्ली: आज से कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में आयोजित उर्दू हेरिटेज फेस्ट में आने वाले आगंतुकों को सुखद अनुभव प्राप्त हुआ. वे अपने दोस्तों या परिवार के सदस्यों के साथ नियमित टहलने के लिए गए थे, लेकिन उन्होंने कभी ऐसा माहोल सेंट्रल पार्क में नहीं देखा था, और …

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उर्दू हेरिटेज फेस्टिवल: 15 फरवरी से कनॉट प्लेस में आयोजित किया जाएगा!

नई दिल्ली: क्षेत्रीय बाधा को तोड़कर, पहली बार वालड सिटी के बाहर उर्दू हेरिटेज फेस्टिवल का आयोजन किया जाएगा। प्रसिद्ध उर्दू कवि, सूफी और कव्वाली गायकों सहित 50 से अधिक कलाकार, 15 फरवरी से कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में छह दिवसीय समारोह में प्रदर्शन करेंगे। दिल्ली के साथ भाषा …

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अब नहीं होगी निज़ामुद्दीन की दरगाह में जुमेरात की क़व्वाली!

नई दिल्ली: रात के समां, या संगीत कार्यक्रम के लिए मग़रिब की नमाज़ के बाद हर शाम हजरत निजामुद्दीन की दरगाह में पर्यटकों और भक्तों का हुजूम उमड़ा रहता है। गुरुवार को, हालांकि, उन्होंने पाया कि लोकप्रिय जुमेरात कव्वाली के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई थी, जिसमें ‘छाप तिलक …

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VIDEO: आतिका अहमद फारुक़ी द्वारा “औरत” पर एक दिलचस्प नज़्म!

“उस ख़ुदा ने जहान बनाया अरमानों से उसे सजाया, फिर नीचे इंसान को लाया देख उन्हें फिर वह मुस्काया, आदम हव्वा थे कहलाते मर्द और औरत जाने जाते, खुले असमान में थे गाते हमें ख़ुदा ने एक बनाया दिन बीते और गया वो कहना हम तुम एक दूजे का गहना …

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VIDEO: वह मजहब खूँ बहाने की इजाजत दे नहीं सकता-वजू के वास्ते भी पानी जो कम बहाता है: लता हया

अदब के मंच पर इन्सान से इन्सान मिलता है यहाँ पर राम मिलता है यहाँ रहमान मिलता है यहाँ न कोई हिन्दू है, न मुस्लिम, न सिख इसाई यही वह मंच है कि जहाँ हिंदुस्तान मिलता है कहीं भी जंग हो, दहशत हो, या फिर बम धमाके हों जिसे देखो …

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जश्न-ए-अदब 27, 28 और 29 को होगा आयोजित, सीट बुक करने के लिए यहाँ करें रजिस्टर!

दिल्ली के इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स में 3 दिवसीय जश्न-ए-अदब कविता उत्सव आयोजित होने जा रहा है. बताया जा रहा है कि कला जगत की जानी मानी हस्तियाँ इस उत्सव में अपना जलवा बिखेरेंगी. दिल्ली में 3 दिवसीय जश्न-ए-अदब कविता उत्सव 27 अक्टूबर से शुरू होने जा रहा …

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ग़ज़लों का एक खूबसूरत अहसास है एलबम “देखो तो”

नई दिल्ली: तेज रफ्तार ज़िंदगी की जद्दोजहद में तेजी से सब कुछ बदल रहा है। फैशन से लेकर जीवन-शैली, रहन-सहन, सोच, संस्कार, कला-संस्कृति, गीत-संगीत और आत्मीय मंथन जैसे सब बदल गया है। मॉडर्न दुनिया के बदले अहसास में मॉडर्न होने की चाह में हमने खुद को अलग ही रंगढंग में ढाल दिया …

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पढ़िए! मुसलमानों की हत्याओं के ख़िलाफ़ ईद के दिन लिखी गयी कविता हुई वायरल

जब बहेंगी ख़ून की नदियाँ तो उन्हें स्वच्छ भारत याद आयेगा स्वछता के नाम पे ली जायेंगी शौच करती महिलाओं की तस्वीरें और इसे रोकते सरेआम एक ज़फर मारा जायेगा ख़ैर मारने के लिये  भला वजह  कोई ज़रूरी है  पहलू ख़ान, अख़लाक़, जुनैद  गिनती अभी अधूरी है देखते चलो,  क़ातिल …

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राहत इन्दौरी की ग़ज़ल: “मोम के पास कभी आग को लाकर देखूँ”

मोम के पास कभी आग को लाकर देखूँ सोचता हूँ के तुझे हाथ लगा कर देखूँ कभी चुपके से चला आऊँ तेरी खिलवत में और तुझे तेरी निगाहों से बचा कर देखूँ मैने देखा है ज़माने को शराबें पी कर दम निकल जाये अगर होश में आकर देखूँ दिल का …

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निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल: “मस्जिदें हैं नमाज़ियों के लिये”

जब किसी से कोई गिला रखना सामने अपने आईना रखना यूँ उजालों से वास्ता रखना शम्मा के पास ही हवा रखना घर की तामीर चाहे जैसी हो इस में रोने की जगह रखना मस्जिदें हैं नमाज़ियों के लिये अपने घर में कहीं ख़ुदा रखना मिलना जुलना जहाँ ज़रूरी हो मिलने-जुलने …

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साहिर की ग़ज़ल: “ख़ुद्दारियों के ख़ून को अर्ज़ां ना कर सके”

ख़ुद्दारियों के ख़ून को अर्ज़ां ना कर सके हम अपने जौहरों को नुमायाँ ना कर सके होकर ख़राब-ए-मै तेरे ग़म तो भुला दिए लेकिन ग़म-ए-हयात को दरमाँ ना कर सके टूटा तिलिस्म-ए-अहद-ए-मोहब्बत कुछ इस तरह फिर आरज़ू की शम्म’आ फ़रोज़ाँ ना कर सके हर शै क़रीब आके कशिश अपनी खो …

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बशीर बद्र की ग़ज़ल: “आ चाँदनी भी मेरी तरह जाग रही है”

आ चाँदनी भी मेरी तरह जाग रही है पलकों पे सितारों को लिये रात खड़ी है ये बात कि सूरत के भले दिल के बुरे हों अल्लाह करे झूठ हो बहुतों से सुनी है वो माथे का मतला हो कि होंठों के दो मिसरे बचपन की ग़ज़ल ही मेरी महबूब …

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इरफ़ान सत्तार की ग़ज़ल: “ख़ुश-मिज़ाजी मुझ पे मेरी बे-दिली का जब्र है”

ख़ुश-मिज़ाजी मुझ पे मेरी बे-दिली का जब्र है शौक़-ए-बज़्म-आराई भी तेरी कमी का जब्र है कौन बनता है किसी की ख़ुद-सताई का सबब अक्स तो बस आईने पर रौशनी का जब्र है ख़्वाब ख़्वाहिश का अदम इस बात का ग़म विसाल का ज़िंदगी में जो भी कुछ है सब किसी …

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आतिश की ग़ज़ल: “सनम की याद में हर-दम ख़ुदा को याद करते हैं”

तड़पते हैं न रोते हैं न हम फ़रियाद करते हैं सनम की याद में हर-दम ख़ुदा को याद करते हैं उन्हीं के इश्क़ में हम नाला-ओ-फ़रियाद करते हैं इलाही देखिये किस दिन हमें वो याद करते हैं शब-ए-फ़ुर्क़त में क्या-क्या साँप लहराते हैं सीने पर तुम्हारी काकुल-ए-पेचाँ को जब हम …

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पुण्यतिथि विशेष: साहिर की ज़िन्दगी भी एक शा’इरी ही तो है..

भारतीय सिने इतिहास की मशहूर फ़िल्म प्यासा का जब जब ज़िक्र आता है तो साहिर लुधियानवी का ख़याल अपने आप ज़हन में आ जाता है. साहिर की नज्मों के बिना गुरु दत्त की प्यासा अधूरी है. सिर्फ़ प्यासा ही नहीं ना जाने कितनी शानदार फ़िल्में.वैसे साहिर की शाइरी के बारे …

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जामिया मुशायरा: झारखंड से मैं मिन्हाज अंसारी बोल रहा हूं

दिल्ली: शहीद अशफाक उल्ला खान की स्मृति में जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी दिल्ली में शनिवार को ‘कुल हिंद मुशायरा’ का आयोजन किया गया। ‘एक शाम शहीद अशफाक उल्ला खान के नाम’ से आयोजित इस मुशायरे में दूर-दूर से आए शायरों ने भाग लिया। इसके अलावा मुशायरे में दिल्ली सरकार के …

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वसीम बरेलवी की ग़ज़ल: “तेरी मर्ज़ी के मुताबिक नज़र आयें कैसे”

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे तेरी मर्ज़ी के मुताबिक नज़र आयें कैसे घर सजाने का तस्सवुर तो बहुत बाद का है पहले ये तय हो कि इस घर को बचायें कैसे क़हक़हा आँख का बर्ताव बदल देता है हँसने वाले तुझे आँसू नज़र आयें कैसे कोई अपनी …

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साहिर लुधियानवी की नज़्म: “जिंदगी मय्यतों पे रोती है, ख़ून फिर ख़ून है”

ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है,बढ़ता है तो मिट जाता है ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा तुमने जिस ख़ून को मक़तल में दबाना चाहा आज वह कूचा-ओ-बाज़ार में आ निकला है कहीं शोला, कहीं नारा, कहीं पत्थर बनकर ख़ून चलता है तो रूकता नहीं संगीनों से सर उठाता है …

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साहिर लुधियानवी की नज़्म: नाकामी

मैने हरचन्द गमे-इश्क को खोना चाहा, गमे-उल्फ़त गमे-दुनिया मे समोना चाहा! वही अफ़साने मेरी सिम्त रवां हैं अब तक, वही शोले मेरे सीने में निहां हैं अब तक। वही बेसूद खलिश है मेरे सीने मे हनोज़, वही बेकार तमन्नायें जवां हैं अब तक। वही गेसू मेरी रातो पे है बिखरे-बिखरे, …

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वसीम बरेलवी की ग़ज़ल: “कैसे माँ-बाप के होंठों से हँसी जाती है”

कौन-सी बात कहाँ, कैसे कही जाती है ये सलीक़ा हो, तो हर बात सुनी जाती है जैसा चाहा था तुझे, देख न पाये दुनिया दिल में बस एक ये हसरत ही रही जाती है एक बिगड़ी हुई औलाद भला क्या जाने कैसे माँ-बाप के होंठों से हँसी जाती है कर्ज़ …

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