Wednesday , November 22 2017
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Ghazal

साहिर लुधियानवी की नज़्म: “कहने को तो सब कुछ है, मगर कुछ भी नहीं है”

हर चीज़ ज़माने की जहाँ पर थी वहीं है, एक तू ही नहीं है नज़रें भी वही और नज़ारे भी वही हैं ख़ामोश फ़ज़ाओं के इशारे भी वही हैं कहने को तो सब कुछ है, मगर कुछ भी नहीं है हर अश्क में खोई हुई ख़ुशियों की झलक है हर …

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राहत इन्दौरी की ग़ज़ल: “इंसानों से इंसानों तक एक सदा… अल्लाह बोल”

किसका नारा, कैसा कौल, अल्लाह बोल अभी बदलता है माहौल, अल्लाह बोल कैसे साथी, कैसे यार, सब मक्कार सबकी नीयत डांवाडोल, अल्लाह बोल जैसा गाहक, वैसा माल, देकर ताल कागज़ में अंगारे तोल, अल्लाह बोल हर पत्थर के सामने रख दे आइना नोच ले हर चेहरे का खोल, अल्लाह बोल …

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कैफ़ी आज़मी की नज़्म “अंदेशे”: “हर तरफ़ मुझ को तड़पता हुआ पाया होगा”

रूह बेचैन है इक दिल की अज़ीयत क्या है दिल ही शोला है तो ये सोज़-ए-मोहब्बत क्या है वो मुझे भूल गई इसकी शिकायत क्या है रंज तो ये है कि रो-रो के भुलाया होगा वो कहाँ और कहाँ काहिफ़-ए-ग़म सोज़िश-ए-जाँ उस की रंगीन नज़र और नुक़ूश-ए-हिरमा उस का एहसास-ए-लतीफ़ …

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बशीर बद्र की ग़ज़ल: उसे किसी की मुहब्बत का ऐतबार नहीं

वो चांदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है बहुत अज़ीज़ हमें है मगर पराया है उतर भी आओ कभी आसमाँ के ज़ीने से तुम्हें ख़ुदा ने हमारे लिये बनाया है महक रही है ज़मीं चांदनी के फूलों से ख़ुदा किसी की मुहब्बत पे मुस्कुराया है उसे किसी की मुहब्बत का …

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अहमद फ़राज़ की ग़ज़ल: सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते-जाते

सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते-जाते वरना इतने तो मरासिम थे कि आते-जाते शिकवा-ए-जुल्मते-शब से तो कहीं बेहतर था अपने हिस्से की कोई शम’अ जलाते जाते कितना आसाँ था तेरे हिज्र में मरना जाना फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते-जाते जश्न-ए-मक़्तल ही न बरपा हुआ वरना हम भी …

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दाग़ देहलवी की ग़ज़ल: कि आती है उर्दू ज़ुबां आते आते

फिरे राह से वो यहाँ आते आते अजल मेरी रही तू कहाँ आते आते मुझे याद करने से ये मुद्दा था निकल जाए दम हिचकियां आते आते कलेजा मेरे मुंह को आएगा इक दिन यूं ही लब पे आह-ओ-फ़ुगां आते आते नतीजा न निकला थके सब पयामी वहाँ जाते जाते …

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जाँ निसार अख़तर की ग़ज़ल: कुछ शे’र फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं..

अश्आर मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं कुछ शे’र फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं आँखों में जो भर लोगे, तो काँटे-से चुभेंगे ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए …

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परवीन शाकिर की ग़ज़ल: इश्क़ के बाद में सब जुर्म हमारे निकले

शाम आयी तेरी यादों के सितारे निकले रंग ही ग़म के नहीं नक़्श भी प्यारे निकले रक्स जिनका हमें साहिल से बहा लाया था वो भँवर आँख तक आये तो क़िनारे निकले वो तो जाँ ले के भी वैसा ही सुबक-नाम रहा इश्क़ के बाद में सब जुर्म हमारे निकले …

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गुजरात में पत्रकार की हत्या, बीजेपी नेता पर आरोप

जूनागढ़। जयहिंद-सांझ समाचार के लिए काम करने वाले पत्रकार किशोर दवे की हत्या उनके वंजारी चौक स्थित ऑफिस में हो गयी। परिजनों ने हत्या का आरोप पूर्व कृषि मंत्री व भाजपा के वरिष्ठ नेता रतिलाल सूरज के बेटे डॉ. भावेश सूरज पर लगाया है। पुलिस के अनुसार, जूनागढ़ में सोमवार …

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मोहसिन नक़वी की ग़ज़ल: “ये कह गए हैं मुसाफ़िर लुटे घरों वाले”

ये कह गए हैं मुसाफ़िर लुटे घरों वाले डरें हवा से परिंदे खुले परों वाले ये मेरे दिल की हवस दश्त-ए-बे-कराँ जैसी वो तेरी आँख के तेवर समंदरों वाले कहाँ मिलेंगे वो अगले दिनों के शहज़ादे पहन के तन पे लिबादे गदा-गरों वाले पहाड़ियों में घिरे ये बुझे बुझे रस्ते …

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जब चाहे मुझ पे वार करो सीरिया हूँ मैं,

माहौल सौगवार करो सीरिया हूँ मैं . जब चाहे मुझ पे वार करो सीरिया हूँ मैं . किलकारियां थी बच्चों की इस घर मैं भी कभी . खुशहालियाँ थी मेरे मुक़द्दर मैं भी कभी . आगे थे सबसे दौर-औ-ज़मन मैं भी दोस्तों खिलते थे फूल मेरे चमन मैं भी दोस्तों …

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शिवसेना ने फाड़े ग़ज़ल गायक राहत फतेह अली खान के शो के पोस्टर

अहमदाबाद: आने वाले दिनों में अहमदाबाद में ग़ज़ल गायक राहत फ़तेह अली खान के शो को लेकर शिवसेना ने अपना विरोध दर्ज किया है। पाकिस्तानी गायक रहत फ़तेह अली खान के शो के बारे में बताते पोस्टर्स को सेना वर्करों ने फाड़ डाला है और कहा है कि देश में …

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“मंज़िल के लिए दो-गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए”, पढ़िए बहज़ाद लखनवी की ग़ज़ल

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए मंज़िल के लिए दो-गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए ऐ दिल की ख़लिश चल यूँ ही सही चलता तो हूँ उनकी महफ़िल में उस वक़्त मुझे चौंका देना जब रंग मे महफ़िल आ जाए ऐ रहबर-ए-कामिल चल देखो तय्यार …

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“वो हमको देखता रहता था, हम तरसते थे”, कृष्ण बिहारी ‘नूर’ की ग़ज़ल

तमाम जिस्म ही घायल था, घाव ऐसा था कोई न जान सका, रख-रखाव ऐसा था बस इक कहानी हुई ये पड़ाव ऐसा था मेरी चिता का भी मंज़र अलाव ऐसा था वो हमको देखता रहता था, हम तरसते थे हमारी छत से वहाँ तक दिखाव ऐसा था ख़रीदते तो ख़रीदार …

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“शिकायतों से भरी टहनियाँ न छू लेना”, इरफ़ान सिद्दीक़ी की ग़ज़ल

चराग़ देने लगेगा धुआँ न छू लेना तू मेरा जिस्म कहीं मेरी जाँ न छु लेना ज़मीं छुटी तो भटक जाओगे ख़लाओं में तुम उड़ते उड़ते कहीं आसमाँ न छू लेना नहीं तो बर्फ़ सा पानी तुम्हें जला देगा गिलास लेते हुए उँगलियाँ न छू लेना हमारे लहजे की शाइस्तगी …

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“चले भी आओ कि गुलशन का करोबार चले”, फै़ज़ की ग़ज़ल

गुलों में रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले चले भी आओ कि गुलशन का करोबार चले क़फ़स उदास है यारो, सबा से कुछ तो कहो कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले कभी तो सुब्ह तेरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़ कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्क-ए-बार चले

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“सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा, हम बुलबुले हैं इसकी ये गुलसिताँ हमारा”

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा हम बुलबुलें हैं इसकी यह गुलसिताँ हमारा ग़ुर्बत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में समझो वहीं हमें भी दिल हो जहाँ हमारा परबत वह सबसे ऊँचा, हमसाया आसमाँ का वह संतरी हमारा, वह पासबाँ हमारा गोदी में खेलती हैं इसकी हज़ारों …

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“तुझ से भी दिल-फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के”, ‘फै़ज़’ की ग़ज़ल

दोनों जहान तेरी मोहब्बत मे हार के वो जा रहा है कोई शबे-ग़म गुज़ार के वीराँ है मयकदा ख़ुमो-साग़र उदास हैं तुम क्या गये कि रूठ गए दिन बहार के इक फ़ुर्सते-गुनाह मिली, वो भी चार दिन देखें हैं हमने हौसले परवरदिगार के दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर …

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“हर एक आवाज़ अब उर्दू को फ़रियादी बताती है” – मुनव्वर राना

हर एक आवाज़ अब उर्दू को फ़रियादी बताती है यह पगली फिर भी अब तक ख़ुद को शहज़ादी बताती है कई बातें मुहब्‍बत सबको बुनियादी बताती है जो परदादी बताती थी वही दादी बताती है जहाँ पिछले कई बरसों से काले नाग रहते हैं वहाँ एक घोंसला चि‍ड़‍ियों का था …

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”मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझसे”,, साहिर की नज़्म ‘ताजमहल’

“ताजमहल” ताज तेरे लिये इक मज़हर-ए-उल्फ़त ही सही तुझको इस वादी-ए-रंगीं से अक़ीदत ही सही मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से! बज़्म-ए-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्या मानी सब्त जिस राह में हों सतवत-ए-शाही के निशाँ उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मानी मेरी महबूब! पस-ए-पर्दा-ए-तशहीर-ए-वफ़ा …

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