Friday , November 24 2017
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Ghazal

‘तुम हमारे किसी तरह ना हुए, वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता’….. मोमिन की ग़ज़ल

असर उसको ज़रा नहीं होता रंज राहत-फिज़ा नहीं होता तुम हमारे किसी तरह न हुए, वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता उसने क्या जाने क्या किया लेकर, दिल किसी काम का नहीं होता नारसाई से दम रुके तो रुके, मैं किसी से खफ़ा नहीं होता तुम मेरे पास होते हो …

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अल्लामा इक़बाल की ग़ज़ल: “अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमाँ तेरा है या मेरा”

अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमाँ तेरा है या मेरा मुझे फ़िक्र-ए-जहाँ क्यूँ हो जहाँ तेरा है या मेरा अगर हँगामा-हा-ए-शौक़ से है ला-मकाँ ख़ाली ख़ता किस की है या रब ला-मकाँ तेरा है या मेरा उसे सुब्ह-ए-अज़ल इंकार की जुरअत हुई क्यूँकर मुझे मालूम क्या वो राज़-दाँ तेरा है या …

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जॉन एलिआ की ग़ज़ल, ‘जीते जी जब से मर गया हूँ मैं’

एक हुनर है जो कर गया हूँ मैं सब के दिल से उतर गया हूँ मैं कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँ सुन रहा हूँ कि घर गया हूँ मैं क्या बताऊँ कि मर नहीं पाता जीते जी जब से मर गया हूँ मैं अब है बस अपना सामना दरपेश …

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‘बिस्मिल हो तो क़ातिल को दुआ क्यों नहीं देते’, अहमद फ़राज़ की ग़ज़ल

ख़ामोश हो क्यों दाद-ए-जफ़ा क्यों नहीं देते बिस्मिल हो तो क़ातिल को दुआ क्यों नहीं देते वहशत का सबब रोहज़ने ज़िन्दाँ तो नहीं है महरो महो अंजुम को बुझा क्यों नहीं देते क्या बीत गयी अब कि ‘फ़राज़’ अहल-ए-चमन पर यारान-ए-क़फ़स मुझको सदा क्यों नहीं देते अहमद फ़राज़

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असग़र गोण्डवी की ग़ज़ल ‘जब तू नज़र आया मुझे तनहा नज़र आया’

फिर मैं नज़र आया ना तमाशा नज़र आया जब तू नज़र आया मुझे तनहा नज़र आया उठ्ठे अजब अंदाज़ से वह जोश-ए-ग़ज़ब में चढ़ता हुआ इक हुस्न का दरिया नज़र आया किस दर्जा तेरा हुस्न भी आशोब-ए-जहां है जिस ज़र्रे को देखा वो तड़पता नज़र आया (असग़र गोण्डवी)

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कैफ़ी आज़मी की ग़ज़ल, ‘तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता’

मैं ढूंढता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता नई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाए नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता वो तेग़ मिल गयी जिससे हुआ है क़त्ल मेरा किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता वो मेरा गांव …

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ग़ालिब की ग़ज़ल: ‘आ के मेरी जान को क़रार नहीं है’

आ के मेरी जान को क़रार नहीं है ताक़त-ए-बेदाद-ए-इन्तिज़ार नहीं है देते हैं जन्नत हयात-ए-दहर के बदले नश्शा ब’अंदाज़ए खुमार नहीं है गिरिया निकाले है तेरी बज़्म से मुझको हाय कि रोने पे इख़्तियार नहीं है हमसे अबस है गुमार-ए-रंजिश-ए-ख़ातिर ख़ाक में उश्शाक़ ग़ुबार नहीं है दिल से उठा लुत्फ़-ए-जलवाहाए …

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साहिर लुधियानवी की ग़ज़ल… ‘इक तरफ़ से गुज़रे थे काफिले बहारों के’

इक तरफ़ से गुज़रे थे काफिले बहारों के आज तक सुलगते हैं, ज़ख़्म रहगुज़ारों के ख़ल्वतों के शैदाई, ख़ल्वतों में खुलते हैं, हम से पूछकर देखो, राज़ परदादारों के पहले हंस के मिलते हैं, फिर नज़र चुराते हैं आश्ना सिफ़्त हैं लोग, अजनबी दियारों के शुग़ल-ए-मै परस्ती गो,जश्ने नामुरादी था …

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मोहसिन नक़वी की ग़ज़ल: “इतनी मुद्दत बाद मिले हो, किन सोचों में गुम रहते हो”

इतनी मुद्दत बाद मिले हो किन सोचों में गुम रहते हो इतने ख़ाएफ़ क्यों रहते हो हर आहट से डर जाते हो तेज़ हवा ने मुझसे पूछा रेत पे क्या लिखते रहते हो काश कोई हमसे भी पूछे रात गए टुक क्यों जागे हो कौन सी बात है तुममें ऐसी …

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‘आँखों में जन्नत ढूंढता है’ – महफ़िल-ए-शायराना

गंवाकर फिर से इज़्ज़त ढूंढता है, ज़माना कैसी शोहरत ढूंढता है। जो सूरत सामने आती है उसके, उसी में मेरी सूरत ढूंढता है। बना दी ज़िन्दगी जिसने जहन्नम, मेरे आँखों में जन्नत ढूंढता है। सजा कर नफरतों का ताज सर पर, जहाँ भर में वो उल्फ़त ढूँढता है। सुनाकर मुझको …

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जिगर मुरादाबादी के अश’आर: “नज़र हटी थी कि फिर मुस्कुरा के लूट लिया”

नज़र मिला के मेरे पास आ के लूट लिया नज़र हटी थी कि फिर मुस्कुरा के लूट लिया बड़े वो आये दिल-ओ-जाँ के लूटने वाले नज़र से छेड़ दिया गुदगुदा के लूट लिया जिगर मुरादाबादी

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फ़ैज़ की नज़्म: “बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे”

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे बोल ज़बां अब तक तेरी है तेरा सुतवां जिस्म है तेरा बोल कि जाँ अब तक तेरी है देख कि आहन गर की दुकाँ में तुन्द हैं शोले सुर्ख़ है आहन खुलने लगे क़ुफ़्लों के दहाने फैला हर इक ज़ंजीर का दामन बोल ये …

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अहमद कमाल परवाज़ी की ग़ज़ल: “मैं कुछ कहूं तो तराज़ू निकाल लेता है”

वो अब तिजारती पहलू निकाल लेता है मैं कुछ कहूं तो तराज़ू निकाल लेता है वो फूल तोड़े हमें कोई ऐतराज़ नहीं मगर वो तोड़ के ख़ुशबू निकाल लेता है अँधेरे चीर के जुगनू निकालने का हुनर बहुत कठिन है मगर तू निकाल लेता है मैं इसलिए भी तेरे फ़न …

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राहत इन्दोरी की ग़ज़ल: “दोस्ती जब किसी से की जाए, दुश्मनों की भी राय ली जाए”

दोस्ती जब किसी से की जाए, दुश्मनों की भी राय ली जाए मौत का ज़हर है फ़िज़ाओं में अब कहाँ जा के सांस ली जाए बस इसी सोच में हूँ डूबा हुआ ये नदी कैसे पार की जाए बोतलें खोल के तो पी बरसों आज दिल खोल कर के पी …

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वसीम बरेलवी की ग़ज़ल: “किस क़दर आइना अकेला था”

अपने अंदाज़ का अकेला था इसलिए मैं बड़ा अकेला था प्यार तो जन्म का अकेला था क्या मेरा तजरिबा अकेला था साथ तेरा ना कुछ बदल पाया मेरा ही रास्ता अकेला था जो भी मिलता गले लगा लेता किस क़दर आइना अकेला था (वसीम बरेलवी)

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क्यूं ना तुझको कोई तेरी ही अदा पेश करूं … (साहिर)

अपना दिल पेश करूं अपनी वफ़ा पेश करूं कुछ समझ में नहीं आता तुझे क्या पेश करूं तेरे मिलने की ख़ुशी में कोई नग़मा छेडूं या तिरे दर्द-ए-जुदाई का गिला पेश करूं मेरे ख़्वाबों में भी तू,मेरे ख़यालों में भी तू कौन सी चीज़ तुझे तुझ से जुदा पेश करूं …

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अब वही हर्फ़-ए-जुनूं सबकी ज़बां ठहरी है… (फ़ैज़)

अब वही हर्फ़-ए-जुनूं सबकी ज़बां ठहरी है जो भी चल निकली है वो बात कहाँ ठहरी है आते आते यूं ही दम भर को रुकी होगी बयार जाते जाते यूं ही पल भर को ख़िज़ाँ ठहरी है वस्ल की शब् थी तो किस दर्जा सुबुक़ गुज़री थी, हिज्र की शब् …

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“कुछ ख़ार कम तो कर गए, गुज़रे जिधर से हम”- साहिर लुधियानवी

भड़का रहे हैं आग लैब-ए-नग़मा गर से हम ख़ामोश क्या रहेंगे ज़माने के डर से हम? कुछ और बढ़ गए जो अँधेरे तो क्या हुआ, मायूस तो नहीं हैं तुलू एक सहर से हम ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है, क्यूँ देखें ज़िन्दगी को किसी की …

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महफ़िल-ए-शायराना #2

क्यूँ शाख पे बैठे हो उड़ क्यूँ नहीं जाते, ऐ वादा फरामोश सुधर क्युँ नहीं जाते।   कब से बैठे हो मेरी घर की चोखट पे, किस नगरी से आये हो घर क्युँ नहीं जाते।   मैं तो ग़म-ए-तन्हाई में हूँ खामोश बैठा, ऐ बादलो गरजते क्युँ हो बरस क्युँ …

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महफ़िल-ए-शायराना।

इस गली में  वो भूखा किसान रहता है, ये वह ज़मीन है जहाँ आसमान रहता है।   मैं डर रहा हूँ हवा से ये पेड़ गिर न पड़े, कि इस पे चिड़ियों का एक खानदान रहता है।   सड़क पे घुमते पागल की तरह दिल है मेरा, हमेशा चोट का …

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