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मजरूह सुल्तानपुरी (01 अक्तूबर 1919 – 24 मई 2000)

मजरूह सुल्तानपुरी (01 अक्तूबर 1919  – 24 मई 2000)

यूनानी हकीम असरारूल हसन खान को शायरी ने मजरूह सुल्तानपुरी बना दिया। सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश पैदा हुए। हकीमी के दौरान शायरी ने शोहरत दिलाई तो प्रैक्टिस बीच में ही छोड़ दी और शेरो-शायरी की दुनिया में मशगूल हो गए। इसी दौरान उनकी मु

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शायद

शायद

जौन इलिया(14 दिसम्बर 1931 -8 नवम्बर 2002) उर्दू शायरी में म़कबूल हस्तियों में से एक हैं। पाकिस्तानी शायरों में उन्हें ख़ास म़ुकाम हासिल है। अमरोहा उत्तर प्रदेश में पैदा हुए जौन इलिया के वालिद शफ़ीक हसन इलिया भी शायर थे। जौन इलिया उर्दू क

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गालिब और आम

गालिब और आम

अल्लाह जानता है मुहब्बत हमीं ने की ग़ालिब के बाद आमों की इज्जत हमीं ने की जैसे भी आम हम को मिले हम ने खा लिये आमों का मान रखा मुरव्वरत हमीं ने की खट्टे भी खाये श़ौक से मीठे भी खाये हैं ]िकस्तम के फैसले से ]िकनायत हमीं ने की

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हसरत मोहानी

हसरत मोहानी

हसरत मोहानी (1875 -1951) रोशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम रोशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम दहका हुआ है आतिश-ए-गुल से चमन तमाम हैरत गुरूर-ए-हुस्न से शोख़ी से इज़तराब दिल ने भी तेरे सीख लिए हैं चलन तमाम

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अमजद हैदराबादी

अमजद हैदराबादी

अमजद हैदराबादी( 7 रजब1305-12 शवाल 1380 )(1878–1961) सय्यद अहमद हुसैन हूँ अमजद हूँ हस्सान उल-हिंद सानी सरमद हूँ क्या पूछते हो हसब ओ नसब को मिरे मैं बंदा लम यलिद वलम यूलद हूँ

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परवीन शाकिर

परवीन शाकिर

परवीन शाकिर (1952 -1994) शायरी में एक ऐसा नाम है, जिसे उर्दू कभी भूल नहीं सकती। ख़ुशबू, सद बर्ग, ख़ुद कलामी, इनकार और माहे तमाम उनके मजमुए कलाम मशहूर हुए। उनकी एक ग़ज़ल और कुछ नज्में यहाँ पेश हैं। ग़ज़ल खुली आँखों में सपना झांकता है

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अज़ीज़ क़ैसी (1931-1992)

अज़ीज़ क़ैसी (1931-1992)

हैदराबाद से फिल्मी दुनिया में नाम कमाने वालों में अज़ीज़ क़ैसी एक बड़ा नाम था। दयावान, कुँवारा बाप और अंकुर जैसी मशहूर फिल्में उन्होंने लिखीं। शायरी में उनकी ग़ज़लें और नज़्में मशहूर रहीं। जगजीत सिंह की आवाज़ में उनकी एक मशहूर ग

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एक पत्थर को जान बना बैठे

एक पत्थर को जान बना बैठे

एक पत्थर को , जान बना बैठे अपना सब कुछ तुझे बना बैठे मेरी हर सांस में, रूह में तुम् हो तुम को अपना जहां बना बैठे किस कदर मेरा दिल ये प्यासा है अपना ज़मज़म तुम्हे बना बैठे रब से मांगा है तुम को मैने सदा सारी दुनिया को हम भुला बैठे

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शाज़ तमकनत

शाज़ तमकनत

शाज़ तमकनत साहब(31 जनवरी 1933- 18 अगस्त 1985) का नाम उर्दू के उन शयरों में शामिल है, जिन्होंने शायरी को ओढना बिछोना बनाया। उनके मजमुए कलाम 'तरशीदा' और 'बयाज़े शाम' मशहूर हुए। कई गुलूकारों ने उनकी ग़ज़लों को अपनी आवाज़ में दुनिया भर में पहुँचाया।

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अहमद फ़राज़

अहमद फ़राज़

अहमद फ़राज़ (1931-2008) की शायरी के बारे में कहा जाता रहा है कि ये निकली तो फ़राज़ की कलम से है, लेकिन लोगों के दिलों में उतर कर उनकी अमानत बन गई है. उनकी एक मशहूर और सब से बड़ी ग़ज़ल यहाँ पेश है। सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं

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